Adhyaya 24
Anushasana ParvaAdhyaya 242 Verses

Adhyaya 24

Śrāddha-kāla, Pātratā (Eligibility), and Phala (Consequences) — श्राद्धकाल-पात्रता-फलनिर्णयः

Upa-parva: Dāna–Śrāddha-vidhi (Ritual Protocols for Offerings and Ancestral Rites)

Chapter 24 is a technical dialogue in which Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to specify the rule-set established by authoritative tradition for offerings at śrāddha and daiva occasions. Bhīṣma first defines temporal sequencing: daiva rites in the forenoon and ancestral rites in the afternoon, with human feeding placed appropriately at midday. He then enumerates conditions that render food/offerings ritually compromised—being time-inappropriate, contaminated, disrespected, or handled in ways that negate sanctity—stating that such portions are understood as diverted to rākṣasa-share (i.e., non-meritorious consumption). The chapter next lists categories of brāhmaṇas deemed ineligible to be invited/installed for śrāddha/daiva (due to ethical, ritual, or livelihood disqualifications), followed by positive qualifications for eligible recipients (discipline, Savitrī-recitation, correct conduct, non-harm, and proper livelihood). It also restricts certain sources of wealth as unfit for offerings. Finally, it contrasts actions leading to negative posthumous outcomes with those aligned to svarga-gati: truthfulness, restraint, generosity, protection of dependents, and support of social welfare. The chapter closes by framing these as established dharma/adharma criteria for daiva and paitṛka giving.

Chapter Arc: युधिष्ठिर धर्म के सूक्ष्म प्रश्नों के साथ भीष्म के समक्ष उपस्थित होते हैं—विशेषतः श्राद्ध और दान के ऐसे नियम जिनसे पितरों की तृप्ति और जीवितों का कल्याण दोनों साधे जा सकें। → प्रश्नों की परतें खुलती हैं: किसे दान देना श्रेष्ठ है, किस समय और किस भाव से श्राद्ध करना फलदायी है, और कौन-से दान ‘अल्प’ होकर भी ‘अक्षय’ फल देते हैं। युधिष्ठिर की जिज्ञासा धर्म के बाह्य कर्मकाण्ड और आन्तरिक नीयत के बीच के तनाव को उभारती है। → भीष्म निर्णायक स्वर में श्राद्ध-दान की ‘उत्तम पात्रता’ और ‘शुद्ध भाव’ का प्रतिपादन करते हैं—दान का मूल्य वस्तु से अधिक दाता की श्रद्धा, शुचिता, और उचित पात्र-चयन में है; श्राद्ध में भी विधि के साथ सत्य-भाव ही पितृ-तृप्ति का मूल है। → युधिष्ठिर को श्राद्ध और दान के श्रेष्ठ आचरण का संक्षिप्त, व्यवहार-योग्य मार्ग मिलता है—धर्म का सार ‘उचित पात्र, उचित काल, उचित विधि, और करुणा-युक्त नीयत’ में प्रतिष्ठित है। → अगले अध्याय हेतु संकेत: दानधर्म के और सूक्ष्म भेद—विशेष दानों के फल, निषिद्ध पात्र, तथा श्राद्ध के विशिष्ट विधान—पर चर्चा आगे बढ़ती है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २० श्लोक हैं) द्ाविशोद्ध्याय: युधिष्ठटिरके विविध धर्मयुक्त प्रश्नोंका उत्तर तथा श्राद्ध और दानके उत्तम पात्रोंका लक्षण [मार्कण्डेयजीके द्वारा विविध प्रश्न और नारदजीके द्वारा उनका उत्तर] (युधिष्टिर उवाच पुत्र: कं महाराज पुरुषस्तरितो भवेत्‌ | यावन्न लब्धवान्‌ पुत्रमफल: पुरुषो नूप ।। युधिष्ठिरने पूछा--नरेश्वर! महाराज! पुत्रोंद्वारा पुरुषका कैसे उद्धार होता है? जबतक पुत्रकी प्राप्तिन हो तबतक पुरुषका जीवन निष्फल क्‍यों माना जाता है? ।। भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । नारदेन पुरा गीत मार्कण्डेयाय पृच्छते ।। भीष्मजीने कहा--राजन्‌! इस विषयमें इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है। पूर्वकालमें मार्कण्डेयके पूछनेपर देवर्षि नारदने जो उपदेश दिया था, उसीका इस इतिहासमें उल्लेख हुआ है ।। पर्वतं नारदं चैवमसितं देवलं च तम्‌ । आरुणेयं च रैभ्यं च एतानत्रागतान्‌ पुरा ।। गड़्गायमुनयोर्म ध्ये भोगवत्या: समागमे । दृष्टवा पूर्वसमासीनान्‌ मार्कण्डेयो5भ्यगच्छत ।। पहलेकी बात है, गंगा-यमुनाके मध्यभागमें जहाँ भोगवतीका समागम हुआ है वहीं पर्वत, नारद, असित, देवल, आरुणेय और रैभ्य--ये ऋषि एकत्र हुए थे। इन सब ऋषियोंको वहाँ पहलेसे विराजमान देख मार्कण्डेयजी भी गये ।। ऋषयस्तु मुनि दृष्टवा समुत्थायोन्मुखा: स्थिता: । अर्चयित्वाहतो विप्रं कि कुर्म इति चाब्रुवन्‌ ।। ऋषियोंने जब मुनिको आते देखा, तब वे सब-के-सब उठकर उनकी ओर मुख करके खड़े हो गये और उन ब्रह्मर्षिकी उनके योग्य पूजा करके सबने पूछा--“हम आपकी क्‍या सेवा करें?” ।। मार्कण्डेय उदाच अयं समागम: सद्धिर्यत्नेनासादितो मया । अत्र प्राप्स्यामि धर्माणामाचारस्य च निश्चयम्‌ ।। मार्कण्डेयजीने कहा--मैंने बड़े यत्नसे सत्पुरुषोंका यह संग प्राप्त किया है। मुझे आशा है, यहाँ धर्म और आचारका निर्णय प्राप्त होगा ।। ऋजु: कृतयुगे धर्मस्तस्मिन्‌ क्षीणे विमुहति । युगे युगे महर्षिभ्यो धर्ममिच्छामि वेदितुम्‌ ।। सत्ययुगमें धर्मका अनुष्ठान सरल होता है। उस युगके समाप्त हो जानेपर धर्मका स्वरूप मनुष्योंके मोहसे आच्छन्न हो जाता है; अतः प्रत्येक युगके धर्मका क्या स्वरूप है? इसे मैं आप सब महर्षियोंसे जानना चाहता हूँ ।। भीष्म उवाच ऋषिभिनरिद: प्रोक्तो ब्रूहि यत्रास्य संशय: । धर्माधर्मेषु तत्त्वज्ञ त्वं विच्छेत्तासि संशयान्‌ ।। भीष्मजी कहते हैं--राजन! तब सब ऋषियोंने मिलकर नारदजीसे कहा--“तत्त्वज्ञ देवर्षे! मार्कण्डेयजीको जिस विषयमें संदेह है उसका आप निरूपण कीजिये। क्योंकि धर्म और अधर्मके विषयमें होनेवाले समस्त संशयोंका निवारण करनेमें आप समर्थ हैं” ।। ऋषिभ्यो5नुमतो वाक्य नियोगान्नारदो5ब्रवीत्‌ | सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञं मार्कण्डेयं ततो<ब्रवीत्‌ ।। ऋषियोंकी यह अनुमति और आदेश पाकर नारदजीने सम्पूर्ण धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले मार्कण्डेयजीसे पूछा ।। नारद उवाच दीर्घायो तपसा दीप्त वेदवेदाड़्तत्त्ववित्‌ यत्र ते संशयो ब्रह्मन्‌ समुत्पन्न: स उच्यताम्‌ ।। नारदजी बोले--तपस्यासे प्रकाशित होनेवाले दीर्घायु मार्कण्डेयजी! आप तो स्वयं ही वेदों और वेदांगोंके तत्त्वको जाननेवाले हैं, तथापि ब्रह्मन! जहाँ आपको संशय उत्पन्न हुआ हो वह विषय उपस्थित कीजिये ।। धर्म लोकोपकारं वा यच्चान्यच्छोतुमिच्छसि । तदहं कथयिष्यामि ब्रूहि त्वं सुमहातपा: ।। महातपस्वी महर्षे! धर्म, लोकोपकार अथवा और जिस किसी विषयमें आप सुनना चाहते हों उसे कहिये। मैं उस विषयका निरूपण करूँगा ।। मार्कण्डेय उवाच युगे युगे व्यतीतेडस्मिन्‌ धर्मसेतु: प्रणश्यति । कथं धर्मच्छलेनाहूं प्राप्रुयामिति मे मतिः ।। मार्कण्डेयजी बोले--प्रत्येक युगके बीत जानेपर धर्मकी मर्यादा नष्ट हो जाती है। फिर धर्मके बहानेसे अधर्म करनेपर मैं उस धर्मका फल कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरे मनमें यही प्रश्न उठता है ।। नारद उवाच आसीदू्‌ धर्म: पुरा विप्र चतुष्पाद: कृते युगे । ततो हााधर्म: कालेन प्रवृत्त: किज्चिदुन्नत: ।। नारदजीने कहा--विप्रवर! पहले सत्ययुगमें धर्म अपने चारों पैरोंसे युक्त होकर सबके द्वारा पालित होता था। तदनन्तर समयानुसार अधर्मकी प्रवृत्ति हुई और उसने अपना सिर कुछ ऊँचा किया ।। ततस्त्रेतायुगं नाम प्रवृत्तं धर्मदूषणम्‌ । तस्मिन्‌ व्यतीते सम्प्राप्तं तृतीयं द्वापरं युगम्‌ ।। तदा धर्मस्य द्वौ पादावरधर्मो नाशयिष्यति । तदनन्तर धर्मको अंशतः दूषित करनेवाले त्रेतानामक दूसरे युगकी प्रवृत्ति हुई। जब वह भी बीत गया तब तीसरे युग द्वापरका पदार्पण हुआ। उस समय धर्मके दो पैरोंको अधर्म नष्ट कर देता है ।। द्वापरे तु परिक्षीणे नन्दिके समुपस्थिते ।। लोकवृत्तं च धर्म च उच्यमानं निबोध मे । द्वापरके नष्ट होनेपर जब नन्दिक (कलियुग) उपस्थित होता है उस समय लोकाचार और धर्मका जैसा स्वरूप रह जाता है, उसे बताता हूँ, सुनिये ।। चतुर्थ नन्दिकं नाम धर्म: पादावशेषित: ।। ततः प्रभृति जायन्ते क्षीणप्रज्ञायुषो नरा: । क्षीणप्राणधना लोके धर्माचारबहिष्कृता: ।। चौथे युगका नाम है नन्दिक। उस समय धर्मका एक ही पाद (अंश) शेष रह जाता है। तभीसे मन्दबुद्धि और अल्पायु मनुष्य उत्पन्न होने लगते हैं। लोकमें उनकी प्राणशक्ति बहुत कम हो जाती है। वे निर्धन तथा धर्म और सदाचारसे बहिष्कृत होते हैं ।। मार्कण्डेय उवाच एवं विलुलिते धर्मे लोके चाधर्मसंयुते । कि चतुर्वर्णनियतं हव्यं कव्यं न नश्यति ।। मार्कण्डेयजीने पूछा--जब इस प्रकार धर्मका लोप होकर जगत्‌में अधर्म छा जाता है तब चारों वर्णोके लिये नियत हव्य और कव्यका नाश क्‍यों नहीं हो जाता है? ।। नारद उवाच मन्त्रपूतं सदा हव्यं कव्यं चैव न नश्यति । प्रतिगृह्नन्ति तद्‌ देवा दातुर्न्यायात्‌ प्रयच्छत: ।। नारदजीने कहा--वेदमन्त्रसे सदा पवित्र होनेके कारण हव्य और कव्य नहीं नष्ट होते हैं। यदि दाता न्यायपूर्वक उनका दान करते हैं तो देवता और पितर उन्हें सादर ग्रहण करते हैं।। सत्त्वयुक्तश्न॒ दाता च सर्वान्‌ कामानवाप्रुयात्‌ । अवाप्तकाम: स्वर्गे च महीयेत यथेप्सितम्‌ ।। जो दाता सात्विक भावसे युक्त होता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। यहाँ आप्तकाम होकर वह स्वर्गमें भी अपनी इच्छाके अनुसार सम्मानित होता है ।। मार्कण्डेय उवाच चत्वारो हाथ ये वर्णा हव्यं कव्यं प्रदास्यते । मन्त्रहीनमवज्ञातं तेषां दत्त क्व गच्छति ।। मार्कण्डेयजीने पूछा--यहाँ जो चार वर्णके लोग हैं, उनके द्वारा यदि मन्त्ररहित और अवहेलना-पूर्वक हव्य-कव्यका दान दिया जाय तो उनका वह दान कहाँ जाता है? ।। नारद उवाच असुरान्‌ गच्छते दत्तं विप्रै रक्षांसि क्षत्रियै: वैश्यै: प्रेतानि वै दत्तं शूद्रैर्भूतानि गच्छति ।। नारदजीने कहा--यदि ब्राह्मणोंने वैसा दान किया है तो वह असुरोंको प्राप्त होता है, क्षत्रियोंने किया है तो उसे राक्षस ले जाते हैं, वैश्योंद्वारा किये गये वैसे दानको प्रेत ग्रहण करते हैं और शूद्रोंद्वारा किया गया अवज्ञापूर्वक दान भूतोंको प्राप्त होता है ।। मार्कण्डेय उवाच अथ वर्णावरे जाताश्षातुर्व्ण्योपदेशिन: । दास्यन्ति हव्यकव्यानि तेषां दत्तं क्व गच्छति ।। मार्कण्डेयजीने पूछा--जो नीच वर्णमें उत्पन्न होकर चारों वर्णोको उपदेश देते और हव्य-कव्यका दान देते हैं, उनका दिया हुआ दान कहाँ जाता है? ।। नारद उवाच वर्णावराणां भूतानां हव्यकव्यप्रदातृणाम्‌ । नैव देवा न पितर:ः प्रतिगृह्नन्ति तत्‌ स्वयम्‌ ।। नारदजीने कहा--जब नीच वर्णके लोग हव्य-कव्यका दान करते हैं, तब उनके उस दानको न देवता ग्रहण करते हैं न पितर ।। यातुधाना: पिशाचाश्न भूता ये चापि नैऋता: । तेषां सा विहिता वृत्ति: पितृदेवतनिर्गता ।। जो यातुधान, पिशाच, भूत और राक्षस हैं, उन्हींके लिये उस वृत्तिका विधान किया गया है। पितरों और देवताओंने वैसी वृत्तिका परित्याग कर दिया है ।। तेषां सर्वप्रदातृणां हव्यकव्यं समाहिता: । यत्‌ प्रयच्छन्ति विधिवत्‌ तद्‌ वै भुञ्जन्ति देवता: ।। जो सब कुछ देनेवाले और उस कर्मके अधिकारी हैं, वे एकाग्रचित्त होकर विधिपूर्वक जो हव्य और कव्य समर्पित करते हैं, उसे देवता और पितर ग्रहण करते हैं ।। मार्कण्डेय उवाच श्रुतं वर्णावरैर्दत्त हव्यं कव्यं च नारद | सम्प्रयोगे च पुत्राणां कन्यानां च ब्रवीहि मे ।। मार्कण्डेयजीने पूछा--नारदजी! नीच वर्णके दिये हुए हव्य और कव्योंकी जो दशा होती है, उसे मैंने सुन ली। अब पुत्रों और कनन्‍्याओंके विषयमें एवं इनके संयोगके विषयमें मुझे कुछ बातें बताइये ।। नारद उवाच कन्याप्रदान पुत्राणां स्त्रीणां संयोगमेव च । आनुपूर्व्यान्मया सम्यगुच्यमानं निबोध मे ।। नारदजीने कहा--अब मैं कन्या-विवाहके और पुत्रोंके विषयमें एवं स्त्रियोंके संयोगके विषयमें क्रमश: बता रहा हूँ, उसे सुनो ।। जातमात्रा तु दातव्या कन्यका सदृशे वरे । काले दत्तासु कन्यासु पिता धर्मेण युज्यते ।। जो कन्या उत्पन्न हो जाती है, उसे किसी योग्य वरको सौंप देना आवश्यक होता है। यदि ठीक समयपर कन्याओंका दान हो गया तो पिता धर्मफलका भागी होता है ।। यस्तु पुष्पवर्तीं कन्यां बान्धवो न प्रयच्छति । मासि मासि गते बन्धुस्तस्या भ्रौणघ्न्यमाप्तुते ।। जो भाई-बन्धु रजस्वलावस्थामें पहुँच जानेपर भी कनन्‍्याका किसी योग्य वरके साथ विवाह नहीं कर देता, वह उसके एक-एक मास बीतनेपर भ्रूणहत्याके फलका भागी होता है ।। यस्तु कन्यां गृहे रुन्ध्याद्‌ ग्राम्यैभोगिर्विवर्जिताम्‌ । अवध्यात: स कन्याया बन्धुः प्राप्रोति भ्रूणहाम्‌ ।। जो भाई-बन्धु कन्याको विषय-भोगोंसे वंचित करके घरमें रोके रखता है, वह उस कनन्‍्याके द्वारा अनिष्ट चिन्तन किये जानेके कारण भ्रूणहत्याके पापका भागी होता है ।। मार्कण्डेय उदाच केन मड़्लकृत्येषु विनियुज्यन्ति कन्यका: । एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वेनेह महामुने ।। मार्कण्डेयजीने पूछा--महामुने! किस कारणसे कन्याओंको मांगलिक कर्मामें नियुक्त किया जाता है? मैं इस बातको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ ।। नारद उवाच नित्यं निवसते लक्ष्मी: कन्यकासु प्रतिष्िता । शोभना शुभयोग्या च पूज्या मड़लकर्मसु ।। नारदजीने कहा--कन्याओंमें सदा लक्ष्मी निवास करती हैं। वे उनमें नित्य प्रतिष्ठित होती हैं; इसलिये प्रत्येक कन्या शोभासम्पन्न, शुभ कर्मके योग्य तथा मंगल कर्मोमें पूजनीय होती है ।। आकरस्थं॑ यथा रत्नं सर्वकामफलोपगम्‌ | तथा कन्या महालक्ष्मी: सर्वलोकस्य मड्नलम्‌ ।। जैसे खानमें स्थित हुआ रत्न सम्पूर्ण कामनाओं एवं फलोंकी प्राप्ति करानेवाला होता है, उसी प्रकार महालक्ष्मीस्वरूपा कन्या सम्पूर्ण जगत्‌के लिये मंगल-कारिणी होती है ।। एवं कन्या परा लक्ष्मी रतिस्तोषश्न देहिनाम्‌ महाकुलानां चारित्र॑ वृत्तेन निकषोपलम्‌ ।। इस तरह कन्याको लक्ष्मीका सर्वोत्कृष्ट रूप जानना चाहिये। उससे देहधारियोंको सुख और संतोषकी प्राप्ति होती है। वह अपने सदाचारके द्वारा उच्च कुलोंके चरित्रकी कसौटी समझी जाती है ।। आनयित्वा स्वकाद्‌ वर्णात्‌ कन्यकां यो भजेन्नर: । दातारं हव्यकव्यानां पुत्रकं॑ या प्रसूयते ।। जो मनुष्य अपने ही वर्णकी कन्याको विवाहके द्वारा लाकर उसे पत्नीके स्थानपर प्रतिष्ठित करता है, उसकी वह साध्वी पत्नी हव्य-कव्य प्रदान करनेवाले पुत्रको जन्म देती है।। साध्वी कुल॑ वर्धयति साध्वी पुष्टिर्गहि परा । साध्वी लक्ष्मी रति: साक्षात्‌ प्रतिष्ठा संततिस्तथा ।। साध्वी स्त्री कुलकी वृद्धि करती है। साध्वी स्त्री घरमें परम पुष्टिरूप है तथा साध्वी स्त्री घरकी लक्ष्मी है, रति है, मूर्तिमती प्रतिष्ठा है तथा संतान-परम्पराकी आधार है ।। मार्कण्डेय उवाच कानि तीर्थानि भगवन्‌ नृणां देहाश्रितानि वै । तानि वै शंस भगवन्‌ याथातथ्येन पृच्छत: ।। मार्कण्डेयजीने पूछा--भगवन्‌! मनुष्योंके शरीरमें कौन-कौन-से तीर्थ हैं? मैं यह जानना चाहता हूँ। अतः आप यथार्थरूपसे मुझे बताइये ।। नारद उवाच देवर्षिपितृतीर्थानि बाह्मूं मध्येडथ वैष्णवम्‌ । नृणां तीर्थानि पज्चाहु: पाणौ संनिहितानि वै ।। नारदजीने कहा--मनीषी पुरुष कहते हैं, मनुष्योंके हाथमें ही पाँच तीर्थ हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं--देवतीर्थ, ऋषितीर्थ, पितृतीर्थ, ब्राह्मतीर्थ और वैष्णवतीर्थ। (अंगुलियोंके अग्रभागमें देवतीर्थ है। कनिष्ठा और अनामिका अंगुलिके मूलभागमें आर्षतीर्थ है। इसीको कायतीर्थ और प्राजापत्यतीर्थ भी कहते हैं। अंगुष्ठ और तर्जनीके मध्यभागमें पितृतीर्थ है। अंगुष्ठके मूलभागमें ब्राह्मतीर्थ है और हथेलीके मध्यभागमें वैष्णवतीर्थ है।) ।। आद्यतीर्थ तु तीर्थानां वैष्णवो भाग उच्यते । यत्रोपस्पृश्य वर्णानां चतुर्णा वर्धते कुलम्‌ ।। पितृदैवतकार्याणि वर्धन्ते प्रेत्य चेह च । हाथमें जो वैष्णवतीर्थका भाग है, उसे सब तीर्थोंमें प्रधान कहा जाता है। जहाँ जल रखकर आचमन करनेसे चारों वर्णोके कुलकी वृद्धि होती है, तथा देवता और पितरोंके कार्यकी इहलोक और परलोकमें वृद्धि होती है ।। मार्कण्डेय उवाच धर्मेष्वधिकृतानां तु नराणां मुहते मन: । कथं न विघ्नं भवति एतदिच्छामि वेदितुम्‌ ।। मार्कण्डेयजीने पूछा--जो धर्मके अधिकारी हैं, ऐसे मनुष्योंका मन कभी-कभी धर्मके विषयमें संशयापन्न हो जाता है। क्या करनेसे उनके धर्माचरणमें विघ्न न पड़े? यह मैं जानना चाहता हूँ ।। नारद उवाच अर्थाश्ष नार्यक्ष॒ समानमेत- च्छेयांसि पुंसामिह मोहयन्ति । रतिप्रमोदात्‌ प्रमदा हरन्ति भोगैर्धनं चाप्युपहन्ति धर्मान्‌ ।। नारदजीने कहा--धन और नारी दोनोंकी अवस्था एक-सी है। दोनों ही मनुष्योंको कल्याणके पथपर जानेमें बाधा देते हैं--उन्हें मोहित कर लेते हैं। रतिजनित आमोद- प्रमोदसे स्त्रियाँ मनको हर लेती हैं और धन भोगोंके द्वारा धर्मको चौपट कर देता है ।। हव्यं कव्यं च धर्मात्मा सर्व तच्छोत्रियो5हति । दत्त हि श्रोत्रिये साधौ ज्वलिताग्नाविवाहुति: ।। धर्मात्मा श्रोत्रिय ब्राह्मण समस्त हव्य और कव्यको पानेका अधिकारी है। श्रेष्ठ श्रोत्रियको दिया हुआ हव्य-कव्य प्रज्वलित अग्निमें डाली हुई आहुतिके समान सफल होता है।। भीष्म उवाच इति सम्भाष्य ऋषिभिर्मार्कण्डेयो महातपा: । नारदं चापि सत्कृत्य तेन चैवाभिसत्कृत: ।। भीष्मजी कहते हैं-इस प्रकार ऋषियोंके साथ बात-चीत करके महातपस्वी मार्कण्डेयने नारदजीका सत्कार किया और स्वयं भी वे उनके द्वारा सम्मानित हुए ।। आमन्त्रयित्वा ऋषिश्रि: प्रययावाश्रमं मुनि: । ऋषयश्चापि तीर्थानां परिचर्या प्रचक्रमु: ।।) तत्पश्चात्‌ ऋषियोंसे विदा लेकर मार्कण्डेय मुनि अपने आश्रमको चले गये तथा वे ऋषि भी तीर्थोमें भ्रमण करने लगे ।। [दाक्षिणात्य अध्याय समाप्त] युधिछिर उवाच किमाहुर्भरतश्रेष्ठ पात्र विप्रा: सनातना: । ब्राह्मणं लिड्वडिनं चैव ब्राह्मणं वाप्पलिड्विनम्‌

Yudhiṣṭhira dit : «Ô roi, par quel moyen un homme obtient-il la délivrance grâce à ses fils ? Et pourquoi la vie d’un homme est-elle tenue pour stérile tant qu’il n’a pas obtenu de fils ?»

Verse 21

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अष्टावक्र और उत्तरदिशाका संवादविषयक इकक्‍्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Ainsi s’achève le vingt et unième chapitre de la section Dāna-dharma de l’Anuśāsana Parva du Śrī Mahābhārata, consacré au dialogue entre Aṣṭāvakra et la Direction du Nord. Ce colophon final marque l’achèvement de ce chapitre dans l’enseignement sur le dharma du don.

Frequently Asked Questions

Bhīṣma specifies a time-order: daiva offerings are to be performed in the forenoon, ancestral (paitṛka/śrāddha) in the afternoon, with feeding aligned to appropriate midday placement, emphasizing that timing is part of ritual validity.

Ritual efficacy depends on disciplined conduct: cleanliness, respectful handling, correct recitation/acts, and qualified recipients; negligence, contamination, or improper intent converts a rite into a non-meritorious act.

Yes. It explicitly contrasts outcomes: improper acts and exploitative behaviors are categorized as leading toward negative posthumous destinations, while truth, restraint, generosity, and protection of others are presented as determinants of svarga-oriented merit.