अध्याय ३४ — एलापत्रस्योपदेशः
Elāpatra’s Counsel on the Nāgas’ Deliverance
अदासी चैव मातेयमद्यप्रभृति चास्तु मे । यथोक्त भवतामेतद् वचो मे प्रतिपादितम्,तदनन्तर अत्यन्त प्रसन्न-से होकर वे समस्त सर्पोंसे इस प्रकार बोले--'पन्नगो! मैंने तुम्हारे लिये यह अमृत ला दिया है। इसे कुशोंपर रख देता हूँ। तुम सब लोग स्नान और मंगल-कर्म (स्वस्ति-वाचन आदि) करके इस अमृतका पान करो। अमृतके लिये भेजते समय तुमने यहाँ बैठकर मुझसे जो बातें कही थीं, उनके अनुसार आजसे मेरी ये माता दासीपनसे मुक्त हो जाये; क्योंकि तुमने मेरे लिये जो काम बताया था, उसे मैंने पूर्ण कर दिया है”
śakra uvāca | adāsī caiva māteyam adyaprabhṛti cāstu me | yathoktaṁ bhavatām etad vaco me pratipāditam ||
«Dès aujourd’hui, que ma mère ne soit plus esclave. Conformément à ce que vous aviez déclaré, j’ai exécuté votre injonction et accompli ce qui m’était demandé.»
शक्र उवाच