Garuḍa–Śakra Saṃvāda and the Retrieval of Amṛta (गरुड–शक्र संवादः अमृत-अपहरण-प्रसङ्गः)
चर्माण्यपि च गात्रेषु भानुमन्ति दृढानि च । विविधानि च शस्त्राणि घोररूपाण्यनेकश:,उन्होंने अपने अंगोंमें यथास्थान मजबूत और चमकीले चमड़ेके बने हुए हाथके मोजे आदि धारण किये। नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र-शस्त्र भी ले लिये। उन सब आयुधोंकी धार बहुत तीखी थी। वे श्रेष्ठ देवता सब प्रकारके आयुध लेकर युद्धके लिये उद्यत हो गये। उनके पास ऐसे-ऐसे चक्र थे, जिनसे सब ओर आगकी चिनगारियाँ और धूमसहित लपटें प्रकट होती थीं। उनके सिवा परिघ, त्रिशूल, फरसे, भाँति-भाँतिकी तीखी शक्तियाँ चमकीले खड्ग और भयंकर दिखायी देनेवाली गदाएँ भी थीं। अपने शरीरके अनुरूप इन अस्त्र-शस्त्रोंको लेकर देवता डट गये
carmāṇy api ca gātreṣu bhānumanti dṛḍhāni ca | vividhāni ca śastrāṇi ghorarūpāṇy anekaśaḥ ||
Kaśyapa dit : «Ils revêtirent aussi sur leurs membres des protections de cuir, solides et éclatantes, ajustées au corps. Et ils saisirent maintes sortes d’armes — nombreuses, diverses, d’une apparence redoutable.»
कश्यप उवाच