Uccaiḥśravas and the Counsel to Churn the Ocean (उच्चैःश्रवसः प्रादुर्भावः — समुद्रमन्थन-परामर्शः)
जरत्कारुर्गत: स्वर्ग सहित: स्वै: पितामहै: । आस्तीकं च सुतं प्राप्य धर्म चानुत्तमं मुनि:,ब्रह्मन! भाँति-भाँतिके व्रतों और स्वाध्यायोंका अनुष्ठान करके वे सब प्रकारके ऋणोंसे उऋण हो गये। अनेक प्रकारकी दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करके उन्होंने देवताओं, ब्रह्मचर्यव्रतके पालनसे ऋषियों और संतानकी उत्पत्तिद्वारा पितरोंको तृप्त किया। कठोर व्रतका पालन करनेवाले जरत्कारु मुनि पितरोंकी चिन्ताका भारी भार उतारकर अपने उन पितामहोंके साथ स्वर्गलोकको चले गये। आस्तीक-जैसे पुत्र तथा परम धर्मकी प्राप्ति करके मुनिवर जरत्कारने दीर्घकालके पश्चात् स्वर्गलोककी यात्रा की। भूगुकुलशिरोमणे! इस प्रकार मैंने आस्तीकके उपाख्यानका यथावत् वर्णन किया है। बताइये, अब और क्या कहा जाय?
śaunaka uvāca | jaratkārur gataḥ svargaṃ sahitaḥ svaiḥ pitāmahaiḥ | āstīkaṃ ca sutaṃ prāpya dharmaṃ cānuttamaṃ muniḥ ||
Śaunaka dit : «Le sage Jaratkāru, ayant obtenu un fils — Āstīka — et ayant atteint le dharma sans égal, partit pour le ciel avec ses propres ancêtres.»
शौनक उवाच