Sāvitrī–Satyavān Vivāha: Kanyāpradāna and Āśrama-Śīla (सावित्री-सत्यवान्विवाहः)
मुहूर्ताद् द्रक्ष्यसे राम॑ भर्तरं त्वं शुचिस्मिते । विदेहनन्दिनी सीताने भी उसकी वह करुणाभरी पुकार सुनी। उसकी पुकार सुनते ही जिस ओरसे वह आवाज आयी थी, उसी ओर वे दौड़ पड़ीं। तब लक्ष्मणने उनसे कहा --'भीरु! डरनेकी कोई बात नहीं है। भला, कौन ऐसा है, जो भगवान् रामको मार सकेगा? शुचिस्मिते! तुम दो ही घड़ीमें अपने पति भगवान् श्रीरामको यहाँ उपस्थित देखोगी ।। २३-२४ $ ।। इत्युक्ता सा प्ररुदती पर्यशड्कत लक्ष्मणम्,लक्ष्मणकी यह बात सुनकर रोती हुई सीताने उन्हें संदेहकी दृष्टिसे देखा। यद्यपि शुद्ध सदाचार ही उनका आभूषण था। वे साध्वी और पतिव्रता थीं; तथापि स्त्री स््वभाववश उस समय उनकी बुद्धि मारी गयी। उन्होंने लक्ष्मणको कठोर बातें सुनानी आरम्भ कीं --
muhūrtād drakṣyase rāma bhartaraṁ tvaṁ śucismite | videhanandinī sītā ||
“En muy poco tiempo, oh Sītā—hija de Videha, de sonrisa pura—verás a tu esposo Rāma.” Esta palabra de consuelo subraya la confianza firme en la invencibilidad de Rāma y busca aquietar el temor con una seguridad arraigada en el dharma y la devoción.
मार्कण्डेय उवाच