Udyoga Parva Adhyāya 103: Garuḍa’s Protest, Viṣṇu’s Demonstration, and Counsel Toward Śama
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें मातलिके द्वारा वरका खोजविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १०३ ॥। ऑपन-माज बछ। अकाल चतुर्राधिकशततमो< ध्याय: नारदजीका नागराज आर्यकके सम्मुख सुमुखके साथ मातलिकी कन्याके विवाहका प्रस्ताव एवं मातलिका नारदजी, सुमुख एवं आर्यकके साथ इन्द्रके पास आकर उनके द्वारा सुमुखको दीर्घायु प्रदान कराना तथा सुमुख- गुणकेशी-विवाह (कण्व उवाच माललेव॑चन श्रुत्वा नारदो मुनिसत्तम: । अब्रवीन्नागराजानमार्यक॑ कुरुनन्दन ।।) कण्व मुनि कहते हैं--कुरुनन्दन! मातलिकी बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारदने नागराज आर्यकसे कहा। नारद उवाच सूतो5यं मातलिननम शक्रस्य दयित: सुहृत् । शुचि: शीलगुणोपेतस्तेजस्वी वीर्यवान् बली,नारदजी बोले--नागराज! ये इन्द्रके प्रिय सखा और सारथि मातलि हैं। इनमें पवित्रता, सुशीलता और समस्त सदगुण भरे हुए हैं। ये तेजस्वी होनेके साथ ही बल- पराक्रमसे सम्पन्न हैं
nārada uvāca | sūto 'yaṃ mātaliḥ nāma śakrasya dayitaḥ suhṛt | śuciḥ śīla-guṇopetas tejasvī vīryavān balī ||
Dijo Nārada: «Oh rey de los Nāgas, este es Mātali por nombre: auriga de Śakra (Indra), amado por él y su amigo de confianza. Es puro, dotado de buena conducta y virtudes; resplandeciente en presencia, valiente y fuerte».
नारद उवाच