तस्माद् देवात् समुद्धूतः स्पर्शस्तु पुरुषोत्तमात् । येन सम युज्यते वायुस्ततो लोकान् विवात्यसौ,उन्हीं भगवान् पुरुषोत्तमसे स्पर्शकी उत्पत्ति हुई है, जिससे वायुदेव संयुक्त होते हैं और उससे संयुक्त होनेके कारण ही वे सम्पूर्ण लोकोंमें प्रवाहित होते हैं
De ese Dios—Purushottama, el Ser Supremo—surgió el ‘sparśa’, el principio del tacto. Unido a él, el Viento sopla; y por esa unión recorre todos los mundos.
नारद उवाच