Keśava-tattva-kathana
On the Principle of Keśava: Cosmogony and Divine Epithets
तपांसि संयोगविधिवेंदा: सतो भा: सरस्वती । नारद: पर्वतश्चैव विश्वावसुर्हहाहुहू:,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! उन दोनोंका वहाँ ऐसा निश्चय जानकर सम्पूर्ण देवताओं तथा लोकपालोंके साथ देवराज इन्द्र उस स्थानपर आये। उनके साथ साध्यगण, विश्वेदेवषण और मरुद्गण भी थे। बड़े-बड़े वाद्य बज रहे थे। नदियाँ, पर्वत, समुद्र, नाना प्रकारके तीर्थ, तपस्या, संयोगविधि, वेद, स्तोभ (साम-गानकी पूर्तिके लिये बोले जानेवाले अक्षर हाई हावु इत्यादि), सरस्वती, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, परिवारसहित चित्रसेन गन्धर्व, नाग, सिद्ध, मुनि, देवाधिदेव प्रजापति ब्रह्मा, सहस्रों मस्तकवाले शेषनाग तथा अचिन्त्य देव भगवान् विष्णु भी वहाँ पधारे। प्रभो! उस समय आकाशमें भेरियाँ और तुरही आदि बाजे बज रहे थे
bhīṣma uvāca | tapāṁsi saṁyogavidhir vedāḥ stobhāḥ sarasvatī | nāradaḥ parvataś caiva viśvāvasur hahā hūhūś ca ||
Bhishma dijo: «Oh rey, allí estaban las austeridades, las ordenanzas que rigen las conjunciones y ritos sagrados, los Vedas, las sílabas stobha que completan los cantos Sāman, Sarasvatī, Nārada, Parvata, y los Gandharvas Viśvāvasu, Hahā y Hūhū: todos se hallaban presentes.»
भीष्य उवाच