अध्याय १५२: लोभः पापस्य मूलम् — Greed as the Root of Wrongdoing
धिककार्य मां धिक््कुरुते तस्मात् त्वाहं प्रसादये । भीष्मजी कहते हैं--राजन्! मुनिवर इन्दोतके ऐसा कहनेपर जनमेजयने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया--'मुने! मैं घृणा और तिरस्कारके योग्य हूँ; इसीलिये आप मेरा तिरस्कार करते हैं। मैं निनन््दाका पात्र हूँ; इसीलिये बार-बार मेरी निन््दा करते हैं। मैं धिक्कारने और दुतकारनेके ही योग्य हूँ; इसीलिये आपकी ओरसे मुझे धिक्कार मिल रहा है और इसीलिये मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ,शौनक उवाच छित्त्वां दम्भं च मानं॑ च प्रीतिमिच्छामि ते नूप । सर्वभूतहितं तिष्ठ धर्म चैव प्रतिस्मरन् शौनक बोले--नरेश्वर! मैं तुम्हें तुम्हारे दम्भ और अभिमानका नाश करके तुम्हारा प्रिय करना चाहता हूँ। तुम धर्मका निरन्तर स्मरण रखते हुए समस्त प्राणियोंके हितका साधन करो
dhik-kārya māṁ dhik-kurute tasmāt tvāhaṁ prasādaye |
Dijo Bhīṣma: «Oh rey: cuando el gran asceta Indota habló así, Janamejaya le respondió de este modo: “¡Oh muni! Soy digno de odio y desprecio; por eso me desprecias. Merezco reproche; por eso me reprochas una y otra vez. Sólo soy digno de ser reprendido y expulsado; por eso recibo tu reprensión. Y precisamente por ello deseo complacerte.”»
भीष्म उवाच