Chapter 43: Tumult of Battle-Sounds and the Proliferation of Dvandva
Paired Engagements
सम्बन्ध-- पहलेसे छठे श्लोकतक वृक्षरूपसे संसारका; दृढ़ वैराग्यके द्वारा उसके छेदनका, परमेश्वरकी शरणमें जानेका; परमात्माको प्राप्त होनेवाले पुरुषोंके लक्षणोंका और परमधामस्वरूप परमेश्वरकी मह्िमाका वर्णन करते हुए अश्वत्थवृक्षरूप क्षर पुरुषका प्रकरण पूरा किया गया। तदनन्तर सातवें श्लोकसे 'जीव' शब्दवाच्य उपासक अक्षर पुरुषका प्रकरण आरम्भ करके उसके स्वरूप, शक्ति, स्वभाव और व्यवह्ारका वर्णन करनेके बाद उसे जाननेवालोंकी महिमा कहते हुए ग्यारहवें "्लीकतक उस प्रकरणको पूरा किया। फिर बारहवें श*लोकसे उपास्यदेव (पुरुषोत्तम” का प्रकरण आरम्भ करके पंद्रहवें *लोकतक उसके गुण, प्रभाव और स्वरूपका वर्णन करते हुए उस प्रकरणको भी पूरा किया। अब अध्यायकी समाप्तितक पूर्वीक्त तीनों प्रकरणोंका सार संक्षेपर्में बतलानेके लिये अगले शलोकोंमें क्षर अक्षर और पुरुषोत्तमका वर्णन करते हैं-- द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्नाक्षर एव च । क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थो$क्षर उच्यते5ं,इस संसारमें नाशवान् और अविनाशी भी, ये दो प्रकारके पुरुष हैं। इनमें सम्पूर्ण भूतप्राणियोंके शरीर तो नाशवान् और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है
dvāv imau puruṣau loke kṣaraś cākṣara eva ca | kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭastho 'kṣara ucyate ||
Arjuna dijo: «En este mundo se han de comprender dos clases de ‘persona’: la perecedera y la imperecedera. Todos los seres encarnados, en cuanto cuerpos sujetos a cambio y ruina, son llamados perecederos; pero el Sí mismo interior, inconmovible y testigo, es llamado imperecedero».
अजुन उवाच