Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
आसीत् सख्य॑ द्विजश्रेष्ठ त्वया मे5र्थनिबन्धनम् । न हानाढ्य: सखाढ्यस्य नाविद्वान् विदुष: सखा,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्का, मूर्ख विद्वान्कां और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है
āsīt sakhyaṁ dvijaśreṣṭha tvayā me 'rthanibandhanam | na hānāḍhyaḥ sakhāḍhyasya nāvidvān viduṣaḥ sakhā ||
Dijo Vaiśampāyana: «¡Oh, el mejor de los nacidos dos veces! La amistad que una vez tuve contigo estaba atada al interés propio. Porque un pobre no puede ser en verdad amigo de un rico, ni un ignorante amigo de un sabio».
वैशम्पायन उवाच