युधिष्ठिर बोले--अपने धर्ममें स्थिर रहना ही स्थिरता है, इन्द्रियनिग्रह धैर्य है, मानसिक मलोंका त्याग करना परम स्नान है और प्राणियोंकी रक्षा करना ही दान है ।। यक्ष उवाच कः: पण्डित:ः पुमान् ज्ञेयो नास्तिक: कश्न उच्यते । को मूर्ख: कश्न काम: स्यात् को मत्सर इति स्मृतः,यक्षने पूछा--किस पुरुषको पण्डित समझना चाहिये, नास्तिक कौन कहलाता है? मूर्ख कौन है? काम क्या है? तथा मत्सर किसे कहते हैं?
yakṣa uvāca: kaḥ paṇḍitaḥ pumān jñeyo nāstikaḥ kaś ca ucyate | ko mūrkhaḥ kaś ca kāmaḥ syāt ko matsara iti smṛtaḥ ||
The Yakṣa said: “Which man should be recognized as truly learned? Who is called an unbeliever (nāstika)? Who is a fool (mūrkha)? What is desire (kāma)? And what is meant by envy (matsara)?”
यक्ष उवाच