एकैकशश्लोघबलानिमान् पुरुषसत्तमान् | को<न्य: प्रतिसमासेत कालान्तकयमादृते,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “मेरे इन पुरुषरत्न भाइयोंमेंसे प्रत्येकके शरीरमें बलका अगाध सिन्धु लहराता था। आयु पूर्ण होनेपर सबका अन्त कर देनेवाले यमराजके सिवा दूसरा कौन इनसे भिड़ सकता था?”
vaiśaṃpāyana uvāca |
ekaikaśaḥ śloka-balān imān puruṣa-sattamān |
ko 'nyaḥ prati-samāseta kālāntaka-yamād ṛte ||
dharmaputro mahābāhur vilalāpa suvistaram ||
Vaiśaṃpāyana said: “Each of these best of men possessed strength beyond measure; who else could ever stand against them, except Yama—the Ender appointed by Time?” Seeing his brothers fallen, the mighty-armed Dharmaputra Yudhiṣṭhira sank into deep grief and lamented at length.
वैशग्पायन उवाच