गङ्गाधारणम् (Gaṅgādhāraṇa) — Śiva Bears the Descent of Gaṅgā
राजन! उनके ऐसा कहनेपर राजा भगीरथने हिमालयनन्दिनी गंगाको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा--“वरदायिनी महानदी! मेरे पितामह यज्ञसम्बन्धी अश्वका पता लगाते हुए कपिलके कोपसे यमलोकको जा पहुँचे हैं। वे सब महात्मा सगरके पुत्र थे और उनकी संख्या साठ हजार थी। भगवान् कपिलके निकट जाकर वे सब-के-सब क्षणभरमें भस्म हो गये। इस प्रकार दुर्मुत्युसे मरनेके कारण उन्हें स्वर्गमें निवास नहीं प्राप्त हुआ है। महानदी! जबतक तुम अपने जलसे उनके भस्म हुए शरीरोंको सींच न दोगी तबतक उन सगरपुत्रोंकी सदगति नहीं हो सकती। महाभागे! मेरे पितामह सगरकुमारोंको स्वर्गमें पहुँचा दो। महानदी! मैं उन्हींके उद्धारके लिये तुमसे याचना करता हूँ || १६-- २० || लोगश उवाच एतच्छुत्वा वचो राज्ञो गड़्ा लोकनमस्कृता । भगीरथमिदं वाक्य सुप्रीता समभाषत,लोमशजी कहते हैं--राजन्! राजा भगीरथकी यह बात सुनकर विश्ववन्दिता गंगा अत्यन्त प्रसन्न हुईं और उनसे इस प्रकार बोलीं--
lomasha uvāca | etac chrutvā vaco rājño gaṅgā lokanamaskṛtā | bhagīratham idaṃ vākyaṃ suprītā samabhāṣata ||
Lomasha said: Hearing the king’s words, the Gaṅgā—revered by all the worlds—became greatly pleased. She then addressed Bhagiratha with these words. (The episode frames Bhagiratha’s plea as an act of filial duty and compassionate responsibility: the liberation of the ancestors depends upon a righteous effort joined to sacred means.)
लोगश उवाच