गङ्गाधारणम् (Gaṅgādhāraṇa) — Śiva Bears the Descent of Gaṅgā
स तु तत्र नरश्रेष्स्तपो घोरं समाश्रितः । फलमूलाम्बुसम्भक्ष: सहस्रपरिवत्सरान्,वहाँके रमणीय जलाशयोंमें पद्मसमूह भरे हुए हैं। सारसोंके मधुर कलरव उस पर्वतीय प्रदेशको सुशोभित कर रहे हैं। हिमालयकी शिलाओंपर किन्नर और अप्सराएँ बैठी हैं। वहाँके वृक्षोंपर चारों ओरसे दिग्गजोंके दाँतोंकी रगड़ दिखायी देती है। हिमालयके इन शिखरोंपर विद्याधरगण विचर रहे हैं। नाना प्रकारके रत्न सब ओर व्याप्त हैं। प्रज्वलित जिह्वावाले भयंकर विषधर सर्प इस गिरिप्रदेशका सेवन करते हैं। यह शैलराज कहीं तो सुवर्णके समान उद्धासित होता है, कहीं चाँदीके समान चमकता है और कहीं कज्जलराशिके समान काला दिखायी देता है। नरश्रेष्ठ भगीरथ उस हिमवान् पर्वतपर गये और घोर तपस्यामें लग गये। उन्होंने सहस्र वर्षोतक फल, मूल और जलका आहार किया। एक हजार दिव्य वर्ष बीत जानेपर महानदी गंगाने स्वयं साकार होकर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया
sa tu tatra naraśreṣṭhas tapo ghoraṃ samāśritaḥ | phalamūlāmbu-sambhakṣaḥ sahasra-parivatsarān ||
Then that best of men, having reached that place, undertook a severe austerity. Living only on fruits, roots, and water, he sustained this discipline for a thousand years.
लोगश उवाच