वैचित्रवीर्य राजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् | अभिगम्य त्वरायुक्ता: श्लक्ष्णं वचनमन्रुवन्,यह सुनकर दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि, जो बड़े ही अभिमानी थे, पाण्डवोंसे बदला लेनेके लिये परस्पर मिलकर सलाह करने लगे। फिर उन सबने बड़ी उतावलीके साथ विचित्रवीर्यनन्दन मनीषी राजा धृतराष्ट्रके पास जाकर मधुर वाणीमें कहा
vaicitravīrya-rājānaṁ dhṛtarāṣṭraṁ manīṣiṇam | abhigamya tvarāyuktāḥ ślakṣṇaṁ vacanam abruvan |
Hastening to King Dhṛtarāṣṭra—the wise son of Vicitravīrya—they approached him and spoke in smooth, flattering words.
दुःशासन उवाच