सहदेव-दक्षिण-दिग्विजयः — Sahadeva’s Southern Conquest and the Māhiṣmatī–Agni Encounter
(हेमकूटमथासाद्य न्यविशत् फाल्गुनस्तथा । त॑ हेमकूटं राजेन्द्र समतिक्रम्य पाण्डव: ।। हरिवर्ष विवेशाथ सैन्येन महता55वृतः । तत्र पार्थो दरदर्शाथ बहूनिह मनोरमान् ।। नगरांश्ष वनांश्वैव नदीश्ष विमलोदका: । तत्पश्चात् अर्जुनने हेमकूट पर्वतपर जाकर पड़ाव डाला। राजेन्द्र! फिर हेमकूटको भी लाँघकर वे पाण्डुनन्दन पार्थ अपनी विशाल सेनाके साथ हरिवर्षमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने बहुत-से मनोरम नगर, सुन्दर वन तथा निर्मल जलसे भरी हुई नदियाँ देखीं। पुरुषान् देवकल्पांश्व नारीश्व प्रियदर्शना: ।। तान् सर्वस्तित्र दृष्टवाथ मुदा युक्तो धनंजय: । वहाँके पुरुष देवताओंके समान तेजस्वी थे। स्त्रियाँ भी परम सुन्दरी थीं। उन सबका अवलोकन करके अर्जुनको वहाँ बड़ी प्रसन्नता हुई। वशे चक्रेडथ रत्नानि लेभे च सुबहूनि च ।। ततो निषधमासाद्य गिरिस्थानजयत प्रभु: । अथ राजजन्नतिक्रम्य निषधं शैलमायतम् ।। विवेश मध्यमं वर्ष पार्थो दिव्यमिलावृतम् । उन्होंने हरिवर्षको अपने अधीन कर लिया और वहाँसे बहुतेरे रत्न प्राप्त किये। इसके बाद निषधपर्वतपर जाकर शक्तिशाली अर्जुनने वहाँके निवासियोंको पराजित किया। तदनन्तर विशाल निषधपर्वतको लाँघकर वे दिव्य इलावृतवर्षमें पहुँचे, जो जम्बूद्वीपका मध्यवर्ती भूभाग है। तत्र देवोपमान् दिव्यान् पुरुषान् देवदर्शनान् ।। अदृष्टपूर्वान् सुभगान् स ददर्श धनंजय: । वहाँ अर्जुनने देवताओं-जैसे दिखायी देनेवाले देवोपम शक्तिशाली दिव्य पुरुष देखे। वे सब-के-सब अत्यन्त सौभाग्यशाली और अद्भुत थे। उससे पहले अर्जुनने कभी वैसे दिव्य पुरुष नहीं देखे थे। सदनानि च शुभ्राणि नारी क्षाप्सरसंनिभा: ।। दृष्टवा तानजयद्ू रम्यान् स तैश्न ददृशे तदा । वहाँके भवन अत्यन्त उज्ज्वल और भव्य थे तथा नारियाँ अप्सराओंके समान प्रतीत होती थीं। अर्जुनने वहाँके रमणीय स्त्री-पुरुषोंको देखा। इनपर भी वहाँके लोगोंकी दृष्टि पड़ी। जित्वा च तान् महाभागान् करे च विनिवेश्य सः ।। रत्नान्यादाय दिव्यानि भूषणैर्वसनै: सह । उदीचीमथ राजेन्द्र ययौ पार्थो मुदान्वित: ।। तत्पश्चात् उस देशके निवासियोंको अर्जुनने युद्धमें जीत लिया, जीतकर उनपर कर लगाया और फिर उन्हीं बड़भागियोंको वहाँके राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया। फिर वस्त्रों और आभूषणोंके साथ दिव्य रत्नोंकी भेंट लेकर अर्जुन बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँसे उत्तर दिशाकी ओर बढ़ गये। स ददर्श महामेरुं शिखराणां प्रभुं महत् । त॑ काज्चनमयं दिव्यं चतुर्वर्ण दुरासदम् ।। आयतं शतसाहस्रं योजनानां तु सुस्थितम् । ज्वलन्तमचल मेरुं तेजोराशिमनुत्तमम् ।। आक्षिपन्तं प्रभां भानो: स्वशृद्जैः काज्जनोज्ज्वलै: । काउ्चनाभरणं दिव्यं देवगन्धर्वसेवितम् ।। नित्यपुष्पफलोपेतं सिद्धचारणसेवितम् । अप्रमेयमनाधृष्यमधर्मबहुलैर्जनै: ।। आगे जाकर उन्हें पर्वतोंके स्वामी गिरिप्रवर महामेरुका दर्शन हुआ, जो दिव्य तथा सुवर्णमय है। उसमें चार प्रकारके रंग दिखायी पड़ते हैं। वहाँतक पहुँचना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है। उसकी लम्बाई एक लाख योजन है। वह परम उत्तम मेरुपर्वत महान् तेजके पुंज-सा जगमगाता रहता है और अपने सुवर्णमय कान्तिमान् शिखरोंद्वारा सूर्यकी प्रभाको तिरस्कृत करता है। वह सुवर्णभूषित दिव्य पर्वत देवताओं तथा गन्धर्वोंसे सेवित है। सिद्ध और चारण भी वहाँ नित्य निवास करते हैं। उस पर्वतपर सदा फल और फूलोंकी बहुतायत रहती है। उसकी ऊँचाईका कोई माप नहीं है। अधर्मपरायण मनुष्य उस पर्वतका स्पर्श नहीं कर सकते। व्यालैराचरितं घोरैर्दिव्यौषधिविदीपितम् । स्वर्गमावृत्य तिष्ठन्तमुच्छायेण महागिरिम् ।। अगम्यं मनसाप्यन्यैर्नदीवृक्षसमन्वितम् | नानाविहगसड्घैश्न नादितं सुमनोहरै: ।। त॑ दृष्टवा फाल्गुनो मेरुं प्रीतिमानभवत् तदा | बड़े भयंकर सर्प वहाँ विचरण करते हैं। दिव्य ओषधियाँ उस पर्वतको प्रकाशित करती रहती हैं। महागिरि मेरु ऊँचाईद्वारा स्वर्गलोकको भी घेरकर खड़ा है। दूसरे मनुष्य मनसे भी वहाँ नहीं पहुँच सकते। कितनी ही नदियाँ और वृक्ष उस शैल-शिखरकी शोभा बढ़ाते हैं। भाँति-भाँतिके मनोहर पक्षी वहाँ कलरव करते रहते हैं। ऐसे मनोहर मेरुगिरिको देखकर उस समय अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई। मेरोरिलावृतं वर्ष सर्वतः परिमण्डलम् ।। मेरोस्तु दक्षिणे पाश्वे जम्बूर्नाम वनस्पति: । नित्यपुष्पफलोपेत: सिद्धचारणसेवित: ।। मेरुके चारों ओर मण्डलाकार इलावृतवर्ष बसा हुआ है। मेरुके दक्षिण पार्श्वमें जम्बू नामका एक वृक्ष है, जो सदा फल और फूलोंसे भरा रहता है। सिद्ध और चारण उस वृक्षका सेवन करते हैं। आस्वर्गमुच्छिता राजन् तस्य शाखा वनस्पते: । यस्य नाम्ना व्विदं द्वीपं जम्बूद्वीपमिति श्रुतम् ।। राजन! उक्त जम्बूवृक्षकी शाखा ऊँचाईमें स्वर्गगलोकतक फैली हुई है। उसीके नामपर इस द्वीपको जम्बूद्वीप कहते हैं। तां च जम्बूं दरदर्शाथ सव्यसाची परंतप: । तौ दृष्टवाप्रतिमौ लोके जम्बूं मेरुं च संस्थितौ ।। प्रीतिमानभवद् राजन् सर्वतः स विलोकयन् । तत्र लेभे ततो जिष्णु: सिद्धीर्दिव्यैश्न चारणै: ।। रत्नानि बहुसाहसंत्र॑ वस्त्राण्याभरणानि च । अन्यानि च महाहणि तत्र लब्ध्वार्जुनस्तदा ।। आमन्त्रयित्वा तान् सर्वान् यज्ञमुद्दिश्य वै गुरो: । अथादाय बहून् रत्नान् गमनायोपचक्रमे ।। शत्रुओंको संताप देनेवाले सव्यसाची अर्जुनने उस जम्बूवृक्षको देखा। जम्बू और मेरुगिरि दोनों ही इस जगतमें अनुपम हैं। उन्हें देखकर अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई। राजन! वहाँ सब ओर दृष्टिपात करते हुए अर्जुनने सिद्धों और दिव्य चारणोंसे कई सहस्र रत्न, वस्त्र, आभूषण तथा अन्य बहुत-सी बहुमूल्य वस्तुएँ प्राप्त कीं। तदनन्तर उन सबसे विदा ले बड़े भाईके यज्ञके उद्देश्यसे बहुत-से रत्नोंका संग्रह करके वे वहाँसे जानेको उद्यत हुए। मेरुं प्रदक्षिणं कृत्वा पर्वतप्रवरं प्रभु: ययौ जम्बूनदीतीरे नदीं श्रेष्ठां विलोकयन् ।। सतां मनोरमां दिव्यां जम्बूस्वादुरसावहाम् | पर्वतश्रेष्ठ मेरको अपने दाहिने करके अर्जुन जम्बूनदीके तटपर गये। वे उस श्रेष्ठ सरिताकी शोभा देखना चाहते थे। वह मनोरम दिव्य नदी जलके रूपमें जम्बूवृक्षके फलोंका स्वादिष्ट रस बहाती थी ।। हैमपक्षिगणैर्जुष्टां सीवर्णजनलजाकुलाम् ।। हैमपड़कां हैमजलां शुभां सौवर्णवालुकाम् । सुनहरे पंखोंवाले पक्षी उसका सेवन करते थे। वह नदी सुवर्णमय कमलोंसे भरी हुई थी। उसकी कीचड़ भी स्वर्णमय थी। उसके जलसे भी सुवर्णमयी आभा छिटक रही थी। उस मंगलमयी नदीकी बालुका भी सुवर्णके चूर्ण-सी शोभा पाती थी। क्वचित् सौवर्णपद्मैश्व संकुलां हेमपुष्पकै: ।। क्वचित सुपुष्पितै: कीर्णा सुवर्णकुमुदोत्पलै: । क्वचित् तीररुहै: कीर्णा हैमवृक्षै: सुपुष्पितै: ।। कहीं-कहीं सुवर्णमय कमलों तथा स्वर्णमय पुष्पोंसे वह व्याप्त थी। कहीं सुन्दर खिले हुए सुवर्णमय कुमुद और उत्पल छाये हुए थे। कहीं उस नदीके तटपर सुन्दर फूलोंसे भरे हुए स्वर्णमय वृक्ष सब ओर फैले हुए थे। तीर्थश्व रुक्मसोपानै: सर्वतः संकुलां शुभाम् । विमलैर्मणिजालैश्व नृत्यगीतरवैर्युताम् ।। उस सुन्दर सरिताके घाटोंपर सब ओर सोनेकी सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। निर्मल मणियोंके समूह उसकी शोभा बढ़ाते थे। नृत्य और गीतके मधुर शब्द उस प्रदेशको मुखरित कर रहे थे। दीप्तैहेमवितानैश्न समन्ताच्छोभितां शुभाम् तथाविधां नदी दृष्टवा पार्थस्तां प्रशशंस ह ।। अदृष्टपूर्वा राजेन्द्र दृष्टवा हर्षमवाप च । उसके दोनों तटोंपर सुनहरे और चमकीले चँदोवे तने थे, जिनके कारण जम्बूनदीकी बड़ी शोभा हो रही थी। राजेन्द्र! ऐसी अदृष्टपूर्व नदीका दर्शन करके अर्जुनने उसकी भूरि- भूरि प्रशंसा की और वे मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। दर्शनीयान् नदीतीरे पुरुषान् सुमनोहरान् ।। तान् नदीसलिलाहारान् सदारानमरोपमान् | नित्यं सुखमुदा युक्तान् सर्वालंकारशोभितान् ।। उस नदीके तटपर बहुत-से देवोपम पुरुष अपनी स्त्रियोंके साथ विचर रहे थे। उनका सौन्दर्य देखने ही योग्य था। वे सबके मनको मोह लेते थे। जम्बूनदीका जल ही उनका आहार था। वे सदा सुख और आनन्दमें निमग्न रहनेवाले तथा सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थे। तेभ्यो बहूनि रत्नानि तदा लेभे धनंजय: । दिव्यजाम्बूनदं हेमभूषणानि च पेशलम् ।। लब्ध्वा तान् दुर्लभान् पार्थ: प्रतीचीं प्रययौं दिशम् । उस समय अर्जुनने उनसे भी नाना प्रकारके रत्न प्राप्त किये। दिव्य जाम्बूनद नामक सुवर्ण और भाँति-भाँतिके आभूषण आदि दुर्लभ वस्तुएँ पाकर अर्जुन वहाँसे पश्चिम दिशाकी ओर चल दिये। नागानां रक्षितं देशमजयच्चार्जुनस्तत: ।। ततो गत्वा महाराज वारुणीं पाकशासनि: । गन्धमादनमासाद्य तत्रस्थानजयत् प्रभु: ।। त॑ गन्धमादन राजन्नतिक्रम्य ततोडर्जुन: । केतुमालं विवेशाथ वर्ष रत्नसमन्वितम् । सेवितं देवकल्पैश्न नारीभि: प्रियदर्शनै: ।। उधर जाकर अर्जुनने नागोंद्वारा सुरक्षित प्रदेशपर विजय पायी। महाराज! वहाँसे और पश्चिम जाकर शक्तिशाली अर्जुन गन्धमादन पर्वतपर पहुँच गये और वहाँके रहनेवालोंको जीतकर अपने अधीन बना लिया। राजन! इस प्रकार गन्धमादन पर्वतको लाँधघकर अर्जुन रत्नोंसे सम्पन्न केतुमालवर्षमें गये, जो देवोपम पुरुषों और सुन्दरी स्त्रियोंकी निवासभूमि है। त॑ जित्वा चार्जुनो राजन् करे च विनिवेश्य च । आह्त्य तत्र रत्नानि दुर्लभानि तथार्जुन: ।। पुनश्न परिवृत्याथ मध्यं देशमिलावृतम् । राजन्! उस वर्षको जीतकर अर्जुनने उसे कर देनेवाला बना दिया और वहाँसे दुर्लभ रत्न लेकर वे पुनः मध्यवर्ती इलावृतवर्षमें लौट आये। गत्वा प्राचीं दिशं राजन् सव्यसाची परंतप: ।। मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् । ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते ।। खशाज्झपषांश्व नद्योतान् प्रधघसान् दीर्घवेणिकान् | पशुपांश्व कुलिन्दांश्व तड़णान् परतड्रणान् ।। रत्नान्यादाय सर्वेभ्यो माल्यवन्तं ततो ययौ । त॑ माल्यवन्तं शैलेन्द्रे समतिक्रम्य पाण्डव: ।। भद्राश्व॑ प्रविवेशाथ वर्ष स्वर्गोपमं शुभम् | तदनन्तर शत्रुदमन सव्यसाची अर्जुनने पूर्व दिशामें प्रस्थान किया। मेरे और मन्दराचलके बीच शैलोदा नदीके दोनों तटोंपर जो लोग कीचक और वेणु नामक बाँसोंकी रमणीय छायाका आश्रय लेकर रहते हैं, उन खश, झष, नद्योत, प्रघस, दीर्घवेणिक, पशुप, कुलिन्द, तंगण तथा परतंगण आदि जातियोंको हराकर उन सबसे रत्नोंकी भेंट ले अर्जुन माल्यवान् पर्वतपर गये। तत्पश्चात् गिरिराज माल्यवानको भी लाँधकर उन पाण्डुकुमारने भद्राश्ववर्षमें प्रवेश किया, जो स्वर्गके समान सुन्दर है। तत्रामरोपमान् रम्यान् पुरुषान् सुखसंयुतान् ।। जित्वा तान् स्ववशे कृत्वा करे च विनिवेश्य च | आद्त्य सर्वरत्नानि असंख्यानि ततस्तत: ।। नील॑ नाम गिरिं गत्वा तत्रस्थानजयत प्रभु: । उस देशमें देवताओंके समान सुन्दर और सुखी पुरुष निवास करते थे। अर्जुनने उन सबको जीतकर अपने अधीन कर लिया और उनपर कर लगा दिया। इस प्रकार इधर- उधरसे असंख्य रत्नोंका संग्रह करके शक्तिशाली अर्जुनने नीलगिरिकी यात्रा की और वहाँके निवासियोंको पराजित किया। ततो जिष्णुरतिक्रम्य पर्वत॑ं नीलमायतम् ।। विवेश रम्यकं वर्ष संकीर्ण मिथुनै: शुभै: । त॑ देशमथ जित्वा च करे च विनिवेश्य च ।। अजयच्चापि बीभत्सुर्देशं गुह्मुकरक्षितम् । तत्र लेभे च राजेन्द्र सौवर्णान् मृगपक्षिण: ।। अगृह्लवाद् यज्ञभूत्यर्थ रमणीयान् मनोरमान् | तदनन्तर विशाल नीलगिरिको भी लाँघकर सुन्दर नर-नारियोंसे भरे हुए रम्यकवर्षमें उन्होंने प्रवेश किया। उस देशको भी जीतकर अर्जुनने वहाँके निवासियोंपर कर लगा दिया। तत्पश्चात् गुह्ुकोंद्वारा सुरक्षित प्रदेशको जीतकर अपने अधिकारमें कर लिया। राजेन्द्र! वहाँ उन्हें सोनेके मृणग और पक्षी उपलब्ध हुए, जो देखनेमें बड़े ही रमणीय और मनोरम थे। उन्होंने यज्ञ-वैभवकी समृद्धिके लिये उन मृगों और पक्षियोंको ग्रहण कर लिया। अन्यानि लब्ध्वा रत्नानि पाण्डवो5थ महाबल: ।। गन्धर्वरक्षितं देशमजयत् सगणं तदा । तत्र रत्नानि दिव्यानि लब्ध्वा राजन्नथार्जुन: ।। श्वेतपर्वतमासाद्य जित्वा पर्वतवासिन: । स श्वेतं पर्वत॑ं राजन् समतिक्रम्य पाण्डव: ।। वर्ष हिरण्यकं॑ नाम विवेशाथ महीपते । तदनन्तर महाबली पाण्डुनन्दन अन्य बहुत-से रत्न लेकर गन्धर्वोद्वारा सुरक्षित प्रदेशमें गये और गन्धर्वगणोंसहित उस देशपर अधिकार जमा लिया। राजन! वहाँ भी अर्जुनको बहुत-से दिव्य रत्न प्राप्त हुए। तदनन्तर उन्होंने श्वेत पर्वतपर जाकर वहाँके निवासियोंको जीता। फिर उस पर्वतको लाँघकर पाण्डुकुमार अर्जुनने हिरण्यकवर्षमें प्रवेश किया। स तु देशेषु रम्येषु गन्तुं तत्रोपचक्रमे ।। मध्ये प्रासादवृन्देषु नक्षत्राणां शशी यथा । महाराज! वहाँ पहुँचकर वे उस देशके रमणीय प्रदेशोंमें विचरने लगे। बड़े-बड़े महलोंकी पंक्तियोंमें भ्रमण करते हुए श्वेताश्व अर्जुन नक्षत्रोंक बीच चन्द्रमाके समान सुशोभित होते थे। महापथेषु राजेन्द्र सर्वतो यान्तमर्जुनम् ।। प्रासादवरशूड्रस्था: परया वीर्यशो भया । ददृशुस्ता: स्त्रिय: सर्वा: पार्थमात्मयशस्करम् ।। त॑ं कलापधरं शूरं सरथं सानुगं प्रभुम् । सवर्मसुकिरीटं वै संनद्धं सपरिच्छदम् ।। सुकुमारं महासत्त्वं तेजोराशिमनुत्तमम् | शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम् ।। पश्यन्तः स्त्रीगणास्तत्र शक्तिपार्णिं सम मेनिरे राजेन्द्र! जब अर्जुन उत्तम बल और शोभासे सम्पन्न हो हिरण्यकवर्षकी विशाल सड़कोंपर चलते थे, उस समय प्रासादशिखरोंपर खड़ी हुई वहाँकी सुन्दरी स्त्रियाँ उनका दर्शन करती थीं। कुन्तीनन्दन अर्जुन अपने यशको बढ़ानेवाले थे। उन्होंने आभूषण धारण कर रखा था। वे शूरवीर, रथयुक्त, सेवकोंसे सम्पन्न और शक्तिशाली थे। उनके अंगोंमें कवच और मस्तकपर सुन्दर किरीट शोभा दे रहा था। वे कमर कसकर युद्धके लिये तैयार थे और सब प्रकारकी आवश्यक सामग्री उनके साथ थी। वे सुकुमार, अत्यन्त धैर्यवान्, तेजके पुंज परम उत्तम, इन्द्र-तुल्य पराक्रमी, शत्रुहन्ता तथा शत्रुओंके गजराजोंकी गतिको रोक देनेवाले थे। उन्हें देखकर वहाँकी स्त्रियोंने यही अनुमान लगाया कि इस वीर पुरुषके रूपमें साक्षात् शक्तिधारी कार्तिकेय पधारे हैं। अयं स पुरुषव्याप्रो रणे5द्भुतपराक्रम: ।। अस्य बाहुबलं प्राप्य न भवन्त्यसुहृदूगणा: । वे आपसमें इस प्रकार बातें करने लगीं--'सखियो! ये जो पुरुषसिंह दिखायी दे रहे हैं, संग्राममें इनका पराक्रम अद्भुत है। इनके बाहुबलका आक्रमण होनेपर शत्रुओंके समुदाय अपना अस्तित्व खो बैठते हैं।' इति वाचो ब्रुवन्त्यस्ता: स्त्रिय: प्रेमणा धनंजयम् ।। तुष्टवुः पुष्पवृष्टिं च ससृजुस्तस्य मूर्थनि । इस प्रकारकी बातें करती हुई स्त्रियाँ बड़े प्रेमसे अर्जुनकी ओर देखकर उनके गुण गातीं और उनके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा करती थीं। दृष्टवा ते तु मुदा युक्ता: कौतूहलसमन्विता: ।। रल्नैविभूषणैश्वैव अभ्यवर्षन्त पाण्डवम् । वहाँके सभी निवासी बड़ी प्रसन्नताके साथ कौतूहलवश उन्हें देखते और उनके निकट रत्नों तथा आभूषणोंकी वर्षा करते थे। अथ जित्वा समस्तांस््तान् करे च विनिवेश्य च ।। मणिहेमप्रवालानि रत्नान्याभरणानि च । एतानि लब्ध्वा पार्थोडपि शृज्भवन्तं गिरिं ययौ ।। शुज्भवन्तं च कौन्तेय: समतिक्रम्य फाल्गुन: ।।) उत्तरं कुरुवर्ष तु स समासाद्य पाण्डव: । इयेष जेतुं तं देश पाकशासननन्दन:,उन सबको जीतकर तथा उनके ऊपर कर लगाकर वहाँसे मणि, सुवर्ण, मूँगे, रत्न तथा आभूषण ले अर्जुन शुंगवान् पर्वतपर चले गये। वहाँसे आगे बढ़कर पाकशासनपुत्र पाण्डव अर्जुनने उत्तर कुरुवर्षमें पहुँचकर उस देशको जीतनेका विचार किया
haimakūṭam athāsādya nyaviśat phālgunaḥ tathā | taṃ haimakūṭaṃ rājendra samatikramya pāṇḍavaḥ || harivarṣaṃ viveśātha sainyena mahatā vṛtaḥ | tatra pārtho dadarśātha bahūn iha manoramān || nagarāṃś ca vanāṃś caiva nadīś ca vimalodakāḥ |
Vaiśaṃpāyana said: Arjuna (Phālguna) reached Mount Haimakūṭa and made camp there. Then, O king, the Pāṇḍava crossed beyond Haimakūṭa and entered Harivarṣa, surrounded by a great army. In that region Pārtha beheld many delightful sights—pleasant cities, beautiful forests, and rivers whose waters were clear and pure. The passage frames Arjuna’s digvijaya not as mere conquest but as a disciplined, goal-oriented expedition undertaken to gather resources and secure submission for a larger royal-sacrificial purpose, where the splendor of lands is observed even as they are brought under political order.
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights disciplined kingship: a ruler’s agent moves with organized force, observes the prosperity of lands, and brings them under order for a larger dharmic-political aim (the wider campaign connected with royal authority and sacrificial preparation), rather than conquest as mere plunder.
Arjuna reaches Mount Haimakūṭa and camps, then crosses it and enters Harivarṣa with a large army. There he sees charming cities, forests, and clear-watered rivers—signs of a prosperous, well-ordered region encountered during his campaign.