अर्जुनस्य रथाश्वमोचनं कृष्णस्याश्वसेवा च
Arjuna’s Horses Freed; Krishna’s Equine Service
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ ३ श्लोक मिलाकर कुल ५७३ श्लोक हैं।) नशा (0) आज अत >> चतु:ःसप्ततितमो< ध्याय: जयद्रथका भय तथा दुर्योधन और द्रोणाचार्यका उसे आश्वासन देना संजय उवाच श्रुत्वा तु तं महाशब्दं पाण्डूनां जयगृद्धिनाम् चारै: प्रवेदिते तत्र समुत्थाय जयद्रथ:,संजय कहते हैं--राजन्! सिंधुराज जयद्रथने जब विजयाभिलाषी पाण्डवोंका वह महान् शब्द सुना और गुप्तचरोंने आकर जब अर्जुनकी प्रतिज्ञाका समाचार निवेदन किया, तब वह सहसा उठकर खड़ा हो गया, उसका हृदय शोकसे व्याकुल हो गया। वह दुःखसे व्याप्त हो शोकके विशाल एवं अगाध महासागरमें ड्ूबता हुआ-सा बहुत सोच-विचारकर राजाओंकी सभामें गया और उन नरदेवोंके समीप रोने-बिलखने लगा इस प्रकार श्रीमह्ा भारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापवमें जयद्रथको आश्वासनविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७४ ॥ ऑपनआक्राा छा अ-क्ाञ > यद्यपि अब दुर्योधनके पास पूरी ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ नहीं रह गयी थीं; तथापि ग्यारह भागोंमें विभक्त उन सेनाओंमेंसे जो लोग शेष बचे थे, उन्हींको लेकर यहाँ “ग्यारह अक्षौहिणी” का उल्लेख किया गया है। पञ्चसप्ततितमोब ध्याय: श्रीकृष्णका अर्जुनको कौरवोंके जयद्रथकी रक्षाविषयक उद्योगका समाचार बताना संजय उवाच प्रतिज्ञाते तु पार्थेन सिन्धुराजवधे तदा । वासुदेवो महाबाहुर्धन॑ंजयमभाषत
sa f1jaya uv01ca | pratij f101te tu p01rthena sindhur01javadh13 tad01 | v01sud13v4d mah01b01hur dhana f1jayam abh0163ata ||
Sanjaya said: When Partha (Arjuna) had thus taken his vow to slay the king of Sindhu (Jayadratha), then Vasudeva (Krishna), the mighty-armed, addressed Dhananjaya (Arjuna).
संजय उवाच