इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १८९ ॥। ऑपन-- माल बछ। जि ३. जिधर बाणके फलका रुख हो, उससे विपरीत रुखवाले दो काँटोंसे युक्त बाणको “कर्णी” कहते हैं। शरीरमें धँस जानेपर यदि उसे निकाला जाय तो वह आँतोंको भी अपने साथ खींच लेता है, इसलिये निन्द्य है। २. 'नालीक” नामक बाण अत्यन्त छोटा होता है, वह शरीरमें पूरा-का-पूरा डूब जाता है, अतः उसे निकालना कठिन हो जाता है। 3. बाणके डंडे और फलके संधि-स्थानमें, जो अत्यन्त पतला होता है, उस बाणको “वस्तिक' कहते हैं। उसे शरीरसे निकालनेपर वह बीचसे टूट जाता है, फल भीतर रह जाता है और केवल डंडा बाहर निकल पाता है। ४. 'सूची” नामक बाण भी कर्णके ही समान होता है। अन्तर इतना ही है कि इसमें बहुत-से कण्टक होते हैं। ५. कुछ लोग “कपिश' को भी सूचीके ही समान मानते हैं। किन्हींके मतमें 'कपिश” का फल बंदरकी हड्डीका बना होता है। अधिकांश लोगोंका मत है कि “कपिश' काले लोहेका बना होता है, उसका हलका आघात लगनेपर भी वह शरीरमें गहराईतक घुस जाता है। मेदिनीकोषके अनुसार कपिशका अर्थ काला है भी। ६-७. जिसका फल गायकी हड्डीका बना हो, वह “गवास्थिज” और जिसका हाथीकी हड्डीका बना हो, वह “गजास्थिज' कहलाता है। इसका असर भी विषलिप्त बाणके समान ही होता है। नवर्त्याधेकशततमो<् ध्याय: द्रोणाचार्यका घोर कर्म, ऋषियोंका द्रोणको अस्त्र त्यागनेका आदेश तथा अभ्रृत्थामाकी मृत्यु सुनकर द्रोणका जीवनसे निराश होना संजय उवाच पज्चालानां ततो द्रोणो5प्यकरोत् कदनं महत् | यथा क्ुद्धों रणे शक्रो दानवानां क्षयं पुरा,संजय कहते हैं--राजन्! तदनन्तर द्रोणाचार्यने कुपित होकर रणभूमिमें पांचालोंका उसी प्रकार संहार आरम्भ किया, जैसे पूर्वकालमें इन्द्रने दानवोंका विनाश किया था
sañjaya uvāca | pāñcālānāṃ tato droṇo 'py akarot kadanaṃ mahat | yathā kruddho raṇe śakro dānavānāṃ kṣayaṃ purā ||
Sanjaya said: O King, thereafter Drona too, inflamed with anger, began a great slaughter of the Panchalas on the battlefield—just as, in former times, Indra, wrathful in war, brought about the destruction of the Danavas.
संजय उवाच
The verse highlights how anger magnifies violence: even within the framework of kṣatriya duty, rage turns combat into indiscriminate carnage. By comparing Droṇa to Indra destroying the Dānavas, it underscores the peril of justifying human brutality through divine or cosmic analogies.
After the preceding events, Droṇa becomes furious and launches a devastating assault against the Pāñcāla forces. Sañjaya reports this to the king, emphasizing the scale of destruction through a mythic comparison to Indra’s ancient war against the Dānavas.