Adhyāya 41 — Yudhiṣṭhira’s Gurv-anumati and Strategic Counsel (युधिष्ठिरस्य गुर्वनुमतिः)
ऑपन-- माल बक। अि<-छऋाज ३. जैसे खेतमें बोये हुए बीजोंका उनके अनुरूप फल समयपर प्रकट होता है, वैसे ही इस शरीरमें बोये हुए कर्म- संस्काररूप बीजोंका फल भी समयपर प्रकट होता रहता है। इसके अतिरिक्त इसका प्रतिक्षण क्षय होता रहता है, इसलिये भी इसे क्षेत्र” कहते हैं और इसीलिये गीताके पंद्रहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें इसको “क्षर” पुरुष कहा गया है। २. इससे भगवानने अन्तरात्मा द्रष्टाका लक्ष्य करवाया है। मन, बुद्धि, इन्द्रिय, महाभूत और इन्द्रियोंके विषय आदि जितना भी ज्ञेय (जाननेमें आनेवाला) दृश्यवर्ग है--सब जड, विनाशी, परिवर्तनशील है। चेतन आत्मा उस जड दृश्यवर्गसे सर्वथा विलक्षण है। यह उसका ज्ञाता है, उसमें अनुस्यूत है और उसका अधिपति है। इसीलिये इसे क्षेत्रज्ञ” कहते हैं। इसी ज्ञाता चेतन आत्माको गीताके सातवें अध्यायमें “परा प्रकृति” (७।५), आठवेंमें “अध्यात्म” (८।३) और पंद्रहवें अध्यायमें “अक्षर पुरुष” (१५।१६) कहा गया है। यह आत्मतत्त्व बड़ा ही गहन है, इसीसे भगवानने भिन्न-भिन्न प्रकरणोंके द्वारा कहीं स्त्रीवाचक, कहीं नपुंसकवाचक और कहीं पुरुषवाचक नामसे इसका वर्णन किया है। वास्तवमें आत्मा विकारोंसे सर्वथा रहित, अलिंग, नित्य, निर्विकार एवं चेतन--ज्ञानस्वरूप है। 3. इससे “आत्मा” और “परमात्मा” की एकताका प्रतिपादन किया गया है। आत्मा और परमात्मामें वस्तुतः कुछ भी भेद नहीं है, प्रकृतिके संगसे भेद-सा प्रतीत होता है; इसीलिये गीताके दूसरे अध्यायके चौबीसवें और पचीसतवें श्लोकोंमें आत्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए जिन शब्दोंका प्रयोग किया है, बारहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें निर्गुण-निराकार परमात्माके लक्षणोंका वर्णन करते समय भी प्रायः उन्हींके भावोंके द्योतक शब्दोंका प्रयोग किया गया है। ४. 'यत्” पदसे भगवानने क्षेत्रका स्वरूप बतलानेका संकेत किया है और उसे पाँचवें श्लोकमें बतलाया है। ५. 'यादृक्' पदसे क्षेत्रका स्वभाव बतलानेका संकेत किया है और उसका वर्णन छब्बीसवें और सत्ताईसवें श्लोकोंमें समस्त भूतोंको उत्पत्ति-विनाशशील बतलाकर किया है। ६. “यद्विकारि' पदसे क्षेत्रके विकारोंका वर्णन करनेका संकेत किया है और उनका वर्णन छठे श्लोकमें किया है। ७. जिन पदार्थोंके समुदायका नाम क्षेत्र" है, उनमेंसे कौन पदार्थ किससे उत्पन्न हुआ--यह बतलानेका संकेत “यतः च यत' पदोंसे किया है और उसका वर्णन उन्नीसवें श्लोकके उत्तरार्द्धमें तथा बीसवेंके पूर्वार्द्धमें किया गया है। ८. 'सः” पद '“क्षेत्रज्ञ” का वाचक है तथा “य:” पदसे उसका स्वरूप बतलानेका संकेत किया गया है और आगे चलकर उसके प्रकृतिस्थ एवं वास्तविक दोनों स्वरूपोंका वर्णन किया गया है--जैसे उन्नीसवें श्लोकमें उसे “अनादि' बीसतेंमें 'सुख-दु:खोंका भोक्ता” एवं इक्कीसवेंमें 'अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म ग्रहण करनेवाला” बतलाकर तो प्रकृतिस्थ पुरुषका स्वरूप बतलाया गया है और बाईसवेंमें तथा सत्ताईसवेंसे तीसवेंतक परमात्माके साथ एकता करके उसके वास्तविक स्वरूपका निरूपण किया गया है। ९. “यत्प्रभाव:' से क्षेत्रज्ञका प्रभाव बतलानेके लिये संकेत किया गया है और उसे इकतीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक बतलाया गया है। ३१. 4विविधैः विशेषणके सहित “छन्दोभि:” पद ऋक्, यजुट, साम और अथर्व--इन चारों वेदोंके संहिता” और “ब्राह्मण” दोनों ही भागोंका वाचक है; समस्त उपनिषद् और भिन्न-भिन्न शाखाओंको भी इन्हींके अन्तर्गत समझ लेना चाहिये। २. “ब्रह्मसूत्रपदै:” पद “वेदान्तदर्शन” के जो “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” आदि सूत्ररूप पद हैं, उन््हींका वाचक प्रतीत होता है; क्योंकि उपर्युक्त सब लक्षण उनमें ठीक-ठीक मिलते हैं। यहाँ इस कथनका यह भाव है कि श्रुति-स्मृति आदियमें वर्णित जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा युक्तिपूर्वक समझाया गया है, उसका निचोड़ भी भगवान् यहाँ संक्षेपमें कह रहे हैं। 3. मन्त्रोंके द्रष्टा एवं शास्त्र और स्मृतियोंके रचयिता ऋषिगणोंने “क्षेत्र” और '“क्षेत्रज्' के स्वरूपको और उनसे सम्बन्ध रखनेवाली सभी बातोंको अपने-अपने ग्रन्थोंमें और पुराण-इतिहासोंमें बहुत प्रकारसे वर्णन करके विस्तारपूर्वक समझाया है; उन्हींका सार यहाँ बहुत थोड़े शब्दोंमें भगवान् कहते हैं। ४. स्थूल भूतोंके और शब्दादि विषयोंके कारणरूप जो पंचतन्मात्राएँ यानी सूक्ष्मपंचमहाभूत हैं--गीताके सातवें अध्यायके चौथे श्लोकमें जिनका 'भूमि:', “आप:', “अनलः', वायु: और “खम्' के नामसे वर्णन हुआ है--उन्हीं पाँचोंका वाचक यहाँ “महाभूतानि” पद है। ५, इसीसे मिलता-जुलता वर्णन सांख्यकारिका और योगदर्शनमें भी आता है, जैसे-- मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या: प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृति: पुरुष: ।। (सांख्यकारिका ३) अर्थात् एक मूल प्रकृति है, वह किसीकी विकृति (विकार) नहीं है। महत्तत््व, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धतन्मात्रा)--ये सात प्रकृति-विकृति हैं अर्थात् ये सातों पंचभूतादिके कारण होनेसे “प्रकृति भी हैं और मूल प्रकृतिके कार्य होनेसे “विकृति' भी हैं। पंचज्ञानेन्द्रिय, पंचकर्मेन्द्रिय और मन--ये ग्यारह इन्द्रिय और पंचमहाभूत --ये सोलह केवल विकृति (विकार) हैं, वे किसीकी प्रकृति अर्थात् कारण नहीं हैं। इनमें ग्यारह इन्द्रिय तो अहंकारके तथा पाँच स्थूल महाभूत पंचतन्मात्राओंके कार्य हैं; किंतु पुछ्ष न किसीका कारण है और न किसीका कार्य है, वह सर्वथा असंग है। योगदर्शनमें कहा है--'विशेषाविशेषलिंगमात्रालिंगानि गुणपर्वाणि।। (२।१९) विशेष यानी पंचज्ञानेन्द्रिय, पंचकर्मेन्द्रिय, एक मन और पंच स्थूल भूत; अविशेष यानी अहंकार और पंचतन्मात्राएँ; लिंगमात्र यानी महत्तत््व और अलिंग यानी मूल प्रकृति--ये चौबीस तत्त्व गुणोंकी अवस्थाविशेष हैं; इन्हींको “दृश्य” कहते हैं। योगदर्शनमें जिसको “दृश्य” कहा है, उसीको गीतामें क्षेत्र” कहा गया है। ६. यह समष्टि अन्तःकरणका एक भेद है। अहंकार ही पंचतन्मात्राओं, मन और समस्त इन्द्रियोंका कारण है तथा महत्तत्त्वका कार्य है; इसीको “अहंभाव' भी कहते हैं। यहाँ “अहंकार” शब्द उसीका वाचक है। ७. जिसे “महत्तत्त्व” (महान) और “समष्टि बुद्धि" भी कहते हैं, जो समष्टि अन्तःकरणका एक भेद है, निश्चय ही जिसका स्वरूप है--उसको यहाँ “बुद्धि' कहा गया है। ३. यहाँ “अव्यक्त' का अर्थ मूल प्रकृति समझना चाहिये, जो महत्तत््व आदि समस्त पदार्थोंकी कारणरूपा है, सांख्यशास्त्रमें जिसको “प्रधान” कहते हैं, भगवानने गीताके चौदहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें जिसको “महदब्रह्म” कहा है तथा इस अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें जिसको “प्रकृति' नाम दिया गया है। २. वाक्, पाणि (हाथ), पाद (पैर), उपस्थ और गुदा--ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं तथा श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना और प्राण-- ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ये सब मिलकर दस इन्द्रियाँ हैं। इन सबका कारण अहंकार है। 3. यहाँ “एक” शब्दसे उस मनको ही बतलाया गया है जो समष्टि अन्तःकरणकी मनन करनेवाली शक्तिविशेष है, संकल्प-विकल्प ही जिसका स्वरूप है। यह भी अहंकारका कार्य है। ४. यहाँ “पञ्च इन्द्रियगोचरा:” पदोंका अर्थ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध समझना चाहिये, जो कि पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके स्थूल विषय हैं। ये सूक्ष्म भूतोंके कार्य हैं। ५. जिन पदार्थोंको मनुष्य सुखके हेतु और दुःखनाशक समझता है, उनको प्राप्त करनेकी जो आसक्तियुक्त कामना है --जिसके वासना, तृष्णा, आशा, लालसा और स्पृहा आदि अनेकों भेद हैं--उसीका वाचक यहाँ “इच्छा” शब्द है। ६. जिन पदार्थोंको मनुष्य दु:खमें हेतु या सुखमें बाधक समझता है, उनमें जो विरोधबुद्धि होती है--उसका नाम “द्वेष' है। इसके स्थूल रूप वैर, ईर्ष्या, घृणा और क्रोध आदि हैं। ७. अनुकूलकी प्राप्ति और प्रतिकूलकी निवृत्तिसे अन्त:करणमें जो प्रसन्नताकी वृत्ति होती है, उसका नाम “सुख” है। ८. प्रतिकूलकी प्राप्ति और अनुकूलके विनाशसे जो अन्तःकरणमें व्याकुलता होती है, जिसे व्यथा भी कहते हैं-- उसका वाचक “दुःख” है। ९. अन्तःकरणमें जो ज्ञानशक्ति है, जिसके द्वारा प्राणी सुख-दुःख और समस्त पदार्थोंका अनुभव करते हैं, जिसे गीताके दसवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें “चेतना” कहा गया है--उसीका वाचक यहाँ “चेतना” है, यह भी अन्त:करणकी वृत्तिविशेष है; अतएव इसकी भी गणना क्षेत्रके विकारोंमें की गयी है। १०, गीताके अठारहवें अध्यायके तैंतीसवें, चौंतीसवें और पैंतीसवें श्लोकोंमें जिस धारणशक्तिके साच्चिक, राजस और तामस--तीन भेद किये गये हैं, उसीका वाचक यहाँ 'धृति” है। अन्तःकरणका विकार होनेसे इसकी गणना भी क्षेत्रके विकारोंमें की गयी है। ३१. यहाँतक विकारोंसहित क्षेत्रका संक्षेपसे वर्णन हो गया अर्थात् पाँचवें श्लोकमें क्षेत्रका स्वरूप संक्षेपमें बतला दिया गया और छठेमें उसके विकारोंका वर्णन संक्षेपमें कर दिया गया। ३२. अपनेको श्रेष्ठ, सम्मान्य, पूज्य या बहुत बड़ा समझना एवं मान-बड़ाई, प्रतिष्ठा-पूजा आदिकी इच्छा करना अथवा बिना ही इच्छा किये इन सबके प्राप्त होनेपर प्रसन्न होना--यह मानित्व है। इन सबका न होना ही “अमानित्व' है। ३१3. मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा और पूजाके लिये, धनादिके लोभसे या किसीको ठगने आदिके अभिप्रायसे अपनेको धर्मात्मा, दानशील, भगवद्धक्त, ज्ञानी या महात्मा विख्यात करना और बिना ही हुए धर्मपालन, उदारता, दातापन, भक्ति, योगसाधना, व्रत-उपवासादिका अथवा अन्य किसी भी प्रकारके गुणका ढोंग करना--दम्भित्व है। इसके सर्वधा अभावका नाम “अदम्भित्व है। ३. किसी भी प्राणीको मन, वाणी या शरीरसे किसी प्रकार भी कभी कष्ट देना--मनसे किसीका बुरा चाहना, वाणीसे किसीको गाली देना, कठोर वचन कहना, किसीकी निन्दा करना या अन्य किसी प्रकारके दुःखदायक और अहितकारक वचन कह देना; शरीरसे किसीको मारना, कष्ट पहुँचाना या किसी प्रकारसे हानि पहुँचाना आदि जो हिंसाके भाव हैं, इन सबके सर्वथा अभावका नाम “अहिंसा” अर्थात् किसी भी प्राणीको किसी प्रकार भी न सताना है। २. अपना अपराध करनेवालेके लिये किसी प्रकार भी दण्ड देनेका भाव मनमें न रखना, उससे बदला लेनेकी अथवा अपराधके बदले उसे इस लोक या परलोकमें दण्ड मिले--ऐसी इच्छा न रखना और उसके अपराधोंको वस्तुतः अपराध ही न मानकर उन्हें सर्वथा भुला देना 'क्षमाभाव” है। गीताके दसवें अध्यायके चौथे श्लोकमें इसकी कुछ विस्तारसे व्याख्या की गयी है। ३. जिस साधकमें मन, वाणी और शरीरकी सरलताका भाव पूर्णरूपसे आ जाता है, वह सबके साथ सरलताका व्यवहार करता है; उसमें कुटिलताका सर्वथा अभाव हो जाता है अर्थात् उसके व्यवहारमें दाव-पेंच, कपट या टेढ़ापन जरा भी नहीं रहता; वह बाहर और भीतरसे सदा समान और सरल रहता है। ४. विद्या और सदुपदेश देनेवाले गुरुका नाम “आचार्य” है। ऐसे गुरुक पास रहकर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक मन, वाणी और शरीरके द्वारा सब प्रकारसे उनको सुख पहुँचानेकी चेष्टा करना, नमस्कार करना, उनकी आज्ञाओंका पालन करना और उनके अनुकूल आचरण करना आदि “आचार्योपासन'” यानी गुरु-सेवा है। ५. सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहारसे द्रव्यकी शुद्धि होती है, उस द्रव्यसे उपार्जित अन्नसे आहारकी शुद्धि होती है। यथायोग्य शुद्ध बर्तावसे आचरणोंकी शुद्धि होती है और जल-मिट्टी आदिके द्वारा प्रक्षालनादि क्रियासे शरीरकी शुद्धि होती है। यह सब बाहरकी शुद्धि है। राग-द्वेष और छल-कपट आदि विकारोंका नाश होकर अन्त:करणका स्वच्छ हो जाना भीतरकी शुद्धि है। दोनों ही प्रकारकी शुद्धियोंको 'शौच” कहा जाता है। ६. बड़े-से-बड़े कष्ट, विपत्ति, भय या दुःखके आ पड़नेपर भी विचलित न होना एवं काम, क्रोध, भय या लोभ आदिसे किसी प्रकार भी अपने धर्म और कर्तव्यसे जरा भी न डिगना तथा मन और बुद्धिमें किसी तरहकी चंचलताका न रहना “अन्तःकरणकी स्थिरता' है। ७. यहाँ “आत्मा” से अन्त:करण और इन्द्रियोंक सहित शरीरको समझना चाहिये। अत: इन सबको भलीभाँति अपने वशमें कर लेना ही इनका निग्रह करना है। ८. इस लोक और परलोकके जितने भी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धरूप विषय-पदार्थ हैं--अन्तः:करण और इन्द्रियोंद्रारा जिनका भोग किया जाता है और अज्ञानके कारण जिनको मनुष्य सुखके हेतु समझता है, किंतु वास्तवमें जो दु:ःखके कारण हैं--उन सबमें प्रीतिका सर्वथा अभाव हो जाना *“इन्द्रियार्थैषु वैराग्यम्” है। ९. मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर--इन सबमें जो “अहम्' बुद्धि हो रही है--अर्थात् अज्ञानके कारण जो इन अनात्मवस्तुओंमें आत्मबुद्धि हो रही है--इस देहाभिमानका सर्वथा अभाव हो जाना “अनहंकार” कहलाता है। १०, जन्मका कष्ट सहज नहीं है; पहले तो असहाय जीवको माताके गर्भमें लंबे समयतक भाँति-भाँतिके क्लेश होते हैं, फिर जन्मके समय योनिद्वारसे निकलनेमें असहा यन्त्रणा भोगनी पड़ती है। नाना प्रकारकी योनियोंमें बार-बार जन्म ग्रहण करनेमें ये जन्म-दु:ख होते हैं। मृत्युकालमें भी महान् कष्ट होता है। जिस शरीर और घरमें आजीवन ममता रही, उसे बलात् छोड़कर जाना पड़ता है। मरणसमयके निराश नेत्रोंकोी और शारीरिक पीड़ाको देखकर उस समयकी यन्त्रणाका बहुत कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। बुढ़ापेकी यन्त्रणा भी कम नहीं होती; इन्द्रियाँ शिथिल और शक्तिहीन हो जाती हैं, शरीर जर्जर हो जाता है, मनमें नित्य लालसाकी तरंगें उछलती रहती हैं, असहाय अवस्था हो जाती है। ऐसी अवस्थामें जो कष्ट होता है, वह बड़ा ही भयानक होता है। इसी प्रकार बीमारीकी पीड़ा भी बड़ी दुःखदायिनी होती है। शरीर क्षीण हो गया, नाना प्रकारके असह्ा कष्ट हो रहे हैं, दूसरोंकी अधीनता है। निरुपाय स्थिति है। यही सब जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधिके दु:ख हैं। इन दु:खोंको बार-बार स्मरण करना और इनपर विचार करना ही इनमें दु:ःखोंको देखना है। जीवोंको ये जन्म, मृत्यु, जरा व्याधि प्राप्त होते हैं--पापोंके परिणामस्वरूप; अतएव ये चारों ही दोषमय हैं। इसीका बार-बार विचार करना इनमें दोषोंको देखना है। ३. यद्यपि आठवें श्लोकमें इन्द्रियोंके अर्थोमें वैराग्य होनेकी बात कही जा चुकी, किंतु स्त्री, पुत्र, गृह, शरीर और धन आदि पदार्थोंके साथ मनुष्यका विशेष सम्बन्ध होनेके कारण प्राय: इनमें उसकी विशेष आसक्ति होती है; इसीलिये इनमें आसक्तिका सर्वथा अभाव हो जानेकी बात विशेषरूपसे पृथक् कही गयी है। २. अहंकारके अभावकी बात पूर्वश्लोकके “अनहंकार:' पदमें स्पष्टठ:ः आ चुकी है, इसीलिये यहाँ “अनभिष्वड्र” का अर्थ “ममताका अभाव' किया गया है। ३. अनुकूलके संयोग और प्रतिकूलके वियोगसे चित्तमें हर्ष आदि न होना तथा प्रतिकूलके संयोग और अनुकूलके वियोगसे किसी प्रकारके शोक, भय और क्रोध आदिका न होना--सदा ही निर्विकार, एकरस, सम रहना--इसको “प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें समचित्तता” कहते हैं। ४. जहाँ किसी प्रकारका शोर-गुल या भीड़भाड़ न हो, जहाँ दूसरा कोई न रहता हो, जहाँ रहनेमें किसीको भी आपत्ति या क्षोभ न हो, जहाँ किसी प्रकारकी गंदगी न हो, जहाँ काँटे-कंकड़ और कूड़ा-कर्कट न हों, जहाँका प्राकृतिक दृश्य सुन्दर हो, जल, वायु और वातावरण निर्मल और पवित्र हों, किसी प्रकारकी बीमारी न हो, हिंसक प्राणियोंका और हिंसाका अभाव हो और जहाँ स्वाभाविक ही सात्तविकताके परमाणु भरे हों, ऐसे देवालय, तपोभूमि, गंगा आदि पवित्र नदियोंके तट और पवित्र वन, गिरि-गुहा आदि निर्जन एकान्त और शुद्ध देशको “विविक्तदेश” कहते हैं तथा ज्ञानको प्राप्त करनेकी साधनाके लिये ऐसे स्थानमें निवास करना ही उसका सेवन करना है। ५. यहाँ “जनसंसदि” पद “प्रमादी' और “विषयासक्त” सांसारिक मनुष्योंके समुदायका वाचक है। ऐसे लोगोंके संगको साधनमें सब प्रकारसे बाधक समझकर उससे विरक्त रहना ही उसमें प्रेम नहीं करना है। संत, महात्मा और साधक पुरुषोंका संग तो साधनमें सहायक होता है; अतः उनके समुदायका वाचक यहाँ “जनसंसदि” नहीं समझना चाहिये। ६. भगवान् ही सर्वश्रेष्ठ हैं और वे ही हमारे स्वामी, शरण ग्रहण करनेयोग्य, परम गति, परम आश्रय, माता-पिता, भाई- बन्धु, परम हितकारी, परम आत्मीय और सर्वस्व हैं; उनको छोड़कर हमारा अन्य कोई भी नहीं है--इस भावसे जो भगवानके साथ अनन्य सम्बन्ध है, उसका नाम “अनन्य योग' है तथा इस प्रकारके सम्बन्धसे केवल भगवानमें ही अटल और पूर्ण विशुद्ध प्रेम करके निरन्तर भगवान्का ही भजन, ध्यान करते रहना ही अनन्य योगके द्वारा भगवानमें अव्यभिचारिणी भक्ति करना है। ७, आत्मा, नित्य, चेतन, निर्विकार और अविनाशी है; उससे भिन्न जो नाशवान्ू, जड, विकारी और परिवर्तनशील वस्तुएँ प्रतीत होती हैं--वे सब अनात्मा हैं, आत्माका उनसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है--शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे इस प्रकार आत्मतत्त्वको भलीभाँति समझ लेना ही “अध्यात्मज्ञान' है और बुद्धिमें ठीक वैसा ही दृढ़ निश्चय करके मनसे उस आत्मतत्त्वका नित्य-निरन्तर मनन करते रहना “अध्यात्मज्ञानमें नित्य स्थित रहना' है। ८. तत्त्वज्ञानका अर्थ है--सच्चिदानन्दघन पूर्ण ब्रह्म परमात्मा; क्योंकि तत्त्वज्ञानसे उन्हींकी प्राप्ति होती है। उन सच्चिदानन्दघन गुणातीत परमात्माका सर्वत्र समभावसे नित्य-निरन्तर अनुभव करते रहना ही उस अर्थका दर्शन करना है। ३. 'अमानित्वम' से लेकर “तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम” तक जिनका वर्णन किया गया है, वे सभी ज्ञानप्राप्तिके साधन हैं; इसलिये उनका नाम भी “ज्ञान” रखा गया है। अभिप्राय यह है कि दूसरे श्लोकमें भगवानने जो यह बात कही है कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरे मतसे ज्ञान है--इस कथनसे कोई ऐसा न समझ ले कि शरीरका नाम “क्षेत्र” है और इसके अंदर रहनेवाले ज्ञाता आत्माका नाम क्षेत्रज” है--यह बात हमने समझ ही ली; बस, हमें ज्ञान प्राप्त हो गया; किंतु वास्तवमें सच्चा ज्ञान वही है जो उपर्युक्त बीस साथनोंके द्वारा क्षेत्र-क्षेत्रञके स्वरूपको यथार्थरूपसे जान लेनेपर होता है। इसी बातको समझानेके लिये यहाँ इन साधनोंको “ज्ञान” के नामसे कहा गया है। अतएव ज्ञानीमें उपर्युक्त गुणोंका समावेश पहलेसे ही होना आवश्यक है, परंतु यह आवश्यक नहीं है कि ये सभी गुण सभी साधकोंमें एक ही समयमें हों। अवश्य ही, इनमें जो “अमानित्व', “अदम्भित्व” आदि बहुत-से सबके उपयोगी गुण हैं, वे तो सबमें रहते ही हैं। इनके अतिरिक्त “अव्यभिचारिणी भक्ति', 'एकान्तदेशसेवित्व', “अध्यात्मज्ञाननित्यत्व', “तत्त्वज्ञानार्थदर्शन'---इनमें अपनी-अपनी साधन- शैलीके अनुसार विकल्प भी हो सकता है। २. उपर्युक्त अमानित्वादि गुणोंसे विपरीत जो मान-बड़ाईकी कामना, दम्भ, हिंसा, क्रोध, कपट, कुटिलता, द्रोह, अपवित्रता, अस्थिरता, लोलुपता, आसक्ति, अहंता, ममता, विषमता, अश्रद्धा और कुसंग आदि दोष हैं, वे सभी जन्म- मृत्युके हेतुभूत अज्ञानको बढ़ानेवाले और जीवका पतन करनेवाले हैं; इसलिये वे सब अज्ञान ही हैं। अतएव उन सबका सर्वथा त्याग करना चाहिये। ३. यहाँ 'ज्ञेयम' पद सच्चिदानन्दघन निर्गुण और सगुण ब्रह्मका वाचक है, क्योंकि इसी प्रकरणमें स्वयं भगवानने ही उसको निर्गुण और गुणोंका भोक्ता बतलाया है। ४. यहाँ “परम्' विशेषणके सहित “ब्रह्म” पदका प्रयोग, वह ज्ञेय तत्त्व ही निर्मुण, निराकार, सच्चिदानन्दघन परबत्रह्म परमात्मा है, यह बतलानेके उद्देश्यसे किया गया है। “ब्रह्म” पद वेद, ब्रह्मा और प्रकृतिका भी वाचक हो सकता है; अतएव ज्ञेयतत्त्वका स्वरूप उनसे विलक्षण है, यह बतलानेके लिये “ब्रह्म” पदके साथ “परम्” विशेषण दिया गया है। ५. जो वस्तु प्रमाणोंद्वारा सिद्ध की जाती है, उसे 'सत्” कहते हैं। स्वतः प्रमाण नित्य अविनाशी परमात्मा किसी भी प्रमाणद्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता; क्योंकि परमात्मासे ही सबकी सिद्धि होती है, परमात्मातक किसी भी प्रमाणकी पहुँच नहीं है। वह प्रमाणोंद्वारा जाननेमें आनेवाली वस्तुओंसे अत्यन्त विलक्षण है, इसलिये परमात्माको “सत्” नहीं कहा जा सकता तथा जिस वस्तुका वास्तवमें अस्तित्व नहीं होता, उसे 'असत्” कहते हैं; किंतु परब्रह्म परमात्माका अस्तित्व नहीं है, ऐसी बात नहीं है। वह अवश्य है और वह है--इसीसे अन्य सबका होना भी सिद्ध होता है; अतः उसे “असत्' भी नहीं कहा जा सकता। इसीलिये परमात्मा 'सत्” और “असतः' दोनोंसे ही परे है। यद्यपि गीताके नवम अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें तो भगवानने कहा है कि 'सत्' भी मैं हूँ और “असत' भी मैं हूँ और यहाँ यह कहते हैं कि उस जाननेयोग्य परमात्माको न 'सत्” कहा जा सकता है और न “असत्; किंतु वहाँ विधिमुखसे वर्णन है, इसलिये भगवान्का यह कहना कि 'सत' भी मैं हूँ और “असत' भी मैं हूँ, उचित ही है। पर यहाँ निषेधमुखसे वर्णन है, किंतु वास्तवमें उस परत्रह्म परमात्माका स्वरूप वाणीके द्वारा न तो विधिमुखसे बतलाया जा सकता है और न निषेधमुखसे ही। उसके विषयमें जो कुछ भी कहा जाता है, सब केवल शाखाचन्द्रन्यायसे उसे लक्ष्य करानेके लिये ही है, उसके साक्षात् स्वरूपका वर्णन वाणीद्वारा हो ही नहीं सकता। श्रुति भी कहती है--“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' (तैत्तिरीय उप० २।९), अर्थात् 'मनके सहित वाणी जिसे न पाकर वापस लौट आती है (वह ब्रह्म है)।' इसी बातको स्पष्ट करनेके लिये यहाँ भगवानने निषेधमुखसे कहा है कि वह न 'सत्' कहा जाता है और न “असत' ही। अर्थात् मैं जिस ज्ञेयवस्तुका वर्णन करना चाहता हूँ, उसका वास्तविक स्वरूप तो मन-वाणीका अविषय है; अत: उसका जो कुछ भी वर्णन किया जायगा, उसे उसका तटस्थ लक्षण ही समझना चाहिये। ३. यह श्लोक श्वेताश्वतरोपनिषद् (३।१६)-में अक्षरश: आया है। २. वह परब्रह्म परमात्मा सब ओर हाथवाला है। उसे कोई भी वस्तु कहींसे भी समर्पण की जाय, वह वहींसे उसे ग्रहण करनेमें समर्थ है। इसी तरह वह सब जगह पैरवाला है। कोई भी भक्त कहींसे उसके चरणोंमें प्रणामादि करते हैं, वह वहीं उसे स्वीकार कर लेता है। वह सब जगह आँखवाला है। उससे कुछ भी छिपा नहीं है। वह सब जगह सिरवाला है। जहाँ कहीं भी भक्तलोग उसका सत्कार करनेके उद्देश्यसे पुष्प आदि उसके मस्तकपर चढ़ाते हैं, वे सब ठीक उसपर चढ़ते हैं। वह सब जगह मुखवाला है। उसके भक्त जहाँ भी उसको खानेकी वस्तु समर्पण करते हैं, वह वहीं उस वस्तुको स्वीकार कर सकता है। अर्थात् वह ज्ञेयस्वरूप परमात्मा सबका साक्षी, सब कुछ देखनेवाला तथा सबकी पूजा और भोग स्वीकार करनेकी शक्तिवाला है। वह परमात्मा सब जगह सुननेकी शक्तिवाला है। जहाँ कहीं भी उसके भक्त उसकी स्तुति करते हैं या उससे प्रार्थना अथवा याचना करते हैं, उन सबको वह भलीभाँति सुनता है। ३. आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और पृथ्वीका कारण होनेसे उनको व्याप्त किये हुए स्थित है, उसी प्रकार वह ज्ञेयस्वरूप परमात्मा भी इस चराचर जीवसमूहसहित समस्त जगत्का कारण होनेसे सबको व्याप्त किये हुए स्थित है, अत: सब कुछ उसीसे परिपूर्ण है। ४. अभिप्राय यह है कि तेरहवें श्लोकमें जो उसको सब जगह हाथ-पैरवाला और अन्य सब इन्द्रियोंवाला बतलाया गया है, उससे यह बात नहीं समझनी चाहिये कि वह ज्ञेय परमात्मा अन्य जीवोंकी भाँति हाथ-पैर आदि इन्द्रियोंवाला है; वह इस प्रकारकी इन्द्रियोंसे सर्वथा रहित होते हुए भी सब जगह उन-उन इन्द्रियोंके विषयोंको ग्रहण करनेमें समर्थ है। इसलिये उसको सब जगह सब इन्द्रियोंवाला और सब इन्द्रियोंसे रहित कहा गया है। श्रुतिमें भी कहा है-- अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षु: स शृणोत्यकर्ण: । (श्वेताश्चवतरोपनिषद् ३।१९) “वह परमात्मा बिना पैर-हाथके ही वेगसे चलता और ग्रहण करता है तथा बिना नेत्रोंक देखता और बिना कानोंके ही सुनता है।” अतएव उसका स्वरूप अलौकिक है, इस वर्णनमें यही बात समझायी गयी है। ५. अभिप्राय यह है कि वह परमात्मा सब गुणोंका भोक्ता होते हुए भी अन्य जीवोंकी भाँति प्रकृतिके गुणोंसे लिप्त नहीं है। वह वास्तवमें गुणोंसे सर्वथा अतीत है, तो भी प्रकृतिके सम्बन्धसे समस्त गुणोंका भोक्ता है। यही उसकी अलौकिकता | ६. श्रुतिमें भी कहा है--“तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके | तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्मत: ।। * (ईशोपनिषद् ५) अर्थात् वह चलता है और नहीं भी चलता है, वह दूर भी है और समीप भी है, वह इस सम्पूर्ण जगत्के भीतर भी है और इन सबके बाहर भी है। ७. वह परमात्मा चराचर भूतोंके बाहर और भीतर भी है, इससे कोई यह बात न समझ ले कि चराचर भूत उससे भिन्न होंगे। इसीको स्पष्ट करनेके लिये कहते हैं कि चराचर भूत भी वही है। अर्थात् जैसे बरफके बाहर-भीतर भी जल है और स्वयं बरफ भी वस्तुतः जल ही है--जलसे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ नहीं है, उसी प्रकार यह समस्त चराचर जगत् उस परमात्माका ही स्वरूप है, उससे भिन्न नहीं है। <. जैसे सूर्यकी किरणोंमें स्थित परमाणुरूप जल साधारण मनुष्योंके जाननेमें नहीं आता--उनके लिये वह दुर्विज्ञेय है, उसी प्रकार वह सर्वव्यापी परब्रह्मय परमात्मा भी उस परमाणुरूप जलकी अपेक्षा भी अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण साधारण मनुष्योंके जाननेमें नहीं आता; इसलिये वह अविज्ञेय है। १. सम्पूर्ण जगत्में और इसके बाहर ऐसी कोई भी जगह नहीं है जहाँ परमात्मा न हों। इसलिये वह अत्यन्त समीपमें भी है और दूरमें भी है; क्योंकि जिसको मनुष्य दूर और समीप मानता है, उन सभी स्थानोंमें वह विज्ञानानन्दधन परमात्मा सदा ही परिपूर्ण है। इसलिये इस तत्त्वको समझनेवाले श्रद्धालु मनुष्योंके लिये वह परमात्मा अत्यन्त समीप है और अश्रद्धालुके लिये अत्यन्त दूर है। २. इस वाक्यसे उस जाननेयोग्य परमात्माके एकत्वका प्रतिपादन किया गया है। अभिप्राय यह है कि जैसे महाकाश वास्तवमें विभागरहित है तो भी भिन्न-भिन्न घड़ोंके सम्बन्धसे विभक्त-सा प्रतीत होता है, वैसे ही परमात्मा वास्तवमें विभागरहित है, तो भी समस्त चराचर प्राणियोंमें क्षेत्रज्॒रूपसे पृथक्-पृथक्के सदृश स्थित प्रतीत होता है; किंतु यह भिन्नता केवल प्रतीतिमात्र ही है, वास्तवमें वह परमात्मा एक है और वह सर्वत्र परिपूर्ण है। ३. यहाँ “तमसः” पद अन्धकार और अज्ञान अर्थात् मायाका वाचक है और वह परमात्मा स्वयंज्योति तथा ज्ञानस्वरूप है; अन्धकार और अज्ञान उसके निकट नहीं रह सकते, इसलिये उसे मायासे अत्यन्त परे--इनसे सर्वथा रहित--बतलाया गया है। ४. उसे पुन: 'ज्ञेय” कहकर यह भाव दिखलाया गया है कि जिस ज्ञेयका बारहवें श्लोकमें प्रकरण आरम्भ किया गया है, उस परमात्माका ज्ञान प्राप्त कर लेना ही इस संसारमें मनुष्य-शरीरका परम कर्तव्य है; इस संसारमें जाननेके योग्य एकमात्र परमात्मा ही है। अतएव उसका तत्त्व जाननेके लिये सभीको पूर्णरूपसे उद्योग करना चाहिये, अपने अमूल्य जीवनको सांसारिक भोगोंमें लगाकर नष्ट नहीं कर डालना चाहिये। ५. चन्द्रमा, सूर्य, विद्युत, तारे आदि जितनी भी बाहा ज्योतियाँ हैं; बुद्धि, मन और इन्द्रियाँ आदि जितनी आध्यात्मिक ज्योतियाँ हैं तथा विभिन्न लोकों और वस्तुओंके अधिष्ठातृदेवतारूप जो देवज्योतियाँ हैं--उन सभीका प्रकाशक वह परमात्मा है तथा उन सबमें जितनी प्रकाशनशक्ति है, वह भी उसी परब्रह्म परमात्माका एक अंभशमात्र है। ६. अभिप्राय यह है कि पूर्वोक्त अमानित्वादि ज्ञान-साथनोंके द्वारा प्राप्त तत्त्वज्ञानसे वह जाना जाता है। ७. वह परमात्मा सब जगह समानभावसे परिपूर्ण होते हुए भी, हृदयमें उसकी विशेष अभिव्यक्ति है। जैसे सूर्यका प्रकाश सब जगह समानरूपसे विस्तृत रहनेपर भी दर्पण आदिमें उसके प्रतिबिम्बकी विशेष अभिव्यक्ति होती है एवं सूर्यमुखी शीशेमें उसका तेज प्रत्यक्ष प्रकट होकर अग्नि उत्पन्न कर देता है, अन्य पदार्थोंमें उस प्रकारकी अभिव्यक्ति नहीं होती, उसी प्रकार हृदय उस परमात्माकी उपलब्धिका स्थान है। ज्ञानीके हृदयमें तो वह प्रत्यक्ष ही प्रकट है। यही बात समझानेके लिये उसको सबके हृदयमें विशेषरूपसे स्थित बतलाया गया है। ८. इस अध्यायके पाँचवें और छठे श्लोकोंमें विकारोंसहित क्षेत्रके स्वरूपका वर्णन किया गया है, सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक ज्ञानके नामसे ज्ञानके बीस साधनोंका और बारहवेंसे सत्रहवेंतक ज्ञेय अर्थात् जाननेयोग्य परमात्माके स्वरूपका वर्णन किया गया है। ९, क्षेत्रको प्रकृतिका कार्य, जड, विकारी, अनित्य और नाशवान् समझना, ज्ञानके साधनोंको भलीभाँति धारण करना और उनके द्वारा भगवानके निर्गुण, सगुणरूपको भलीभाँति समझ लेना--यही क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयको जानना है तथा उस ज्ञेयस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाना ही भगवान्के स्वरूपको प्राप्त हो जाना है। ३. इसी अध्यायके छठे श्लोकमें जिन इच्छा-द्वेष, सुख-दुःख आदि विकारोंका वर्णन किया गया है--उन सबका वाचक यहाँ “विकारान्” पद है तथा सत्त्व, रज और तम--इन तीनों गुणोंका और इनसे उत्पन्न समस्त जड पदार्थोंका वाचक “गुणान' पद है। इन दोनोंको प्रकृतिसे उत्पन्न समझनेके लिये कहकर भगवानूने यह भाव दिखलाया है कि सत्त्व, रज और तम--इन तीनों गुणोंका नाम प्रकृति नहीं है; प्रकृति अनादि है। तीनों गुण सृष्टिके आदिमें उससे उत्पन्न होते हैं (भागवत २,सम्बन्ध-- जीवोंके नाना प्रकारकी योनियोंगें जन्म लेनेकी बात तो चौथे #लोकतक कही गयी, किंतु वहाँ गुणोंकी कोई बात नहीं आयी। इसलिये अब वे गुण क्या हैं? उनका संग क्या है? किस गुणके संगसे अच्छी योनियें और किस गुणके संगसे बुरी योनि्ें जन्म होता है?--इन सब बातोंको स्पष्ट करनेके लिये इस प्रकरणका आरम्भ करते हुए भगवान् अब पहले उन तीनों गुणोंकी प्रकृतिये उत्पत्ति और उनके विभिन्न नाम बतलाकर फिर उनके स्वरूप और उनके द्वारा जीवात्माके बन्धन-प्रकारका क्रमशः पृथक्ू-पृथक् वर्णन करते हैं-- सत्त्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा: । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण--ये प्रकृतिसे उत्पन्न तीनों गुणर अविनाशी जीवात्माको शरीरमें बाँधते हैं:
sattvaṁ rajas tama iti guṇāḥ prakṛti-sambhavāḥ | nibadhnanti mahā-bāho dehe dehinam avyayam ||
Arjuna, the mighty-armed, is told that the three fundamental qualities—sattva (clarity), rajas (restless drive), and tamas (inertia and darkness)—arise from primordial Nature (prakṛti). By their influence they bind the imperishable embodied self (the dehin) to life within the body, shaping temperament, choices, and thus the ethical direction of one’s actions even amid the pressures of war and duty.
अजुन उवाच
The self is imperishable, yet its lived experience and moral tendencies are conditioned by the three guṇas arising from prakṛti. Understanding how sattva, rajas, and tamas bind the embodied being is a key step toward disentangling identity from these forces and acting with discernment.
In the Gītā discourse within the Bhīṣma Parva, Kṛṣṇa continues instructing Arjuna by introducing the doctrine of the three guṇas—explaining the psychological and ethical forces that shape conduct and keep the embodied self bound to bodily existence.