ध्यानयोगः — Dhyāna-Yoga
Discipline of Meditation and Mental Restraint
सम्बन्ध-- सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने यह बात कही थी कि मैं तुम्हें वह कर्मतत्व बतलाऊँगा; जिसे जानकर तुम अशुभसे मुक्त हो जाओगे। उस प्रतिज्ञाके अनुसार अठारहवें श्लोकसोे यहाँतक उस कर्मतत््वका वर्णन करके अब उसका उपसंहार करते हैं-- एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान् विद्धि तान् स्वनिवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे,इसी प्रकार और भी बहुत तरहके यज्ञ वेदकी वाणीमें विस्तारसे कहे गये हैं। उन सबको तू मन, इन्द्रिय और शरीरकी क्रियाद्वारा सम्पन्न होनेवाले जान; इस प्रकार तत्त्वसे जानकर उनके अनुष्ठानद्वारा तू कर्माबन्धनसे सर्वथा मुक्त हो जायगा
evaṁ bahuvidhā yajñā vitatā brahmaṇo mukhe | karmajān viddhi tān sarvān evaṁ jñātvā vimokṣyase ||
Arjuna said: “Thus, many kinds of sacrificial disciplines are set forth in the mouth of the Veda. Know all of them to arise from action—performed through body, senses, and mind. When you understand this truth and undertake them in that spirit, you will be released from the bondage of karma.”
अजुन उवाच