न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलो मुनि: । न च वागड्भचपल इति शिष्टस्य गोचर:,मननशील गृहस्थको चाहिये कि हाथ, पैर, नेत्र, वाणी तथा शरीरके द्वारा होनेवाली चपलताका परित्याग करे अर्थात् इनके द्वारा कोई अनुचित कार्य न होने दे। यही सत्पुरुषोंका बर्ताव (शिष्टाचार) है
“A sage should not be restless in hands and feet, nor fickle in the eyes, nor unsteady in speech; this is the proper sphere of conduct for the cultured.”
वायुदेव उवाच