Adhyaya 94
Adi ParvaAdhyaya 9429 Verses

Adhyaya 94

Śāṃtanu’s Ideal Rule; Devavrata’s Return; The Satyavatī Marriage Condition and Bhīṣma’s Vow (आदि पर्व, अध्याय ९४)

Upa-parva: Śāṃtanu–Satyavatī–Bhīṣma-pratijñā Episode (Ādi-parva)

Vaiśaṃpāyana characterizes Śāṃtanu as a paradigmatic king marked by self-control, generosity, forbearance, and truthfulness, under whom social order is portrayed as regulated and harmonious. The narrative then shifts to Devavrata’s emergence: Gaṅgā returns the eighth son, trained in Vedas, śāstras, and divine weaponry, after which Śāṃtanu installs him as heir apparent. Subsequently, Śāṃtanu encounters Satyavatī, a ferryman’s daughter, and seeks marriage; her father (Dāśarāja) stipulates that Satyavatī’s son must inherit the throne. Śāṃtanu refuses, returns sorrowful, and confides to Devavrata his anxiety about lineage continuity and the vulnerability of a single heir. Devavrata approaches Dāśarāja and first concedes succession to Satyavatī’s future son; when concerns remain about Devavrata’s potential descendants, he makes a public vow of lifelong brahmacarya and renunciation of progeny. The assembly acclaims the severity of the vow, naming him “Bhīṣma,” and Śāṃtanu grants him the boon of choosing the time of his death (icchā-mṛtyu), formalizing the vow’s exceptional status within the epic’s moral economy.

Chapter Arc: स्वर्गलोक में राजा ययाति का तेजस्वी प्राकट्य—परन्तु उनके भीतर एक असाधारण संकल्प: ‘प्रतिग्रह’ (पराया दान/उपहार) स्वीकार न करना, चाहे वह स्वर्ग-लोकों का ही क्यों न हो। → वसुमान् ययाति को अपने अर्जित स्वर्ग-लोक देने का प्रस्ताव करता है—‘मेरे लोक तुम्हारे हों; तृण के समान मूल्य देकर भी इन्हें ले लो।’ ययाति का मन धर्म-संकट में पड़ता है: क्या परोपकार के नाम पर पराया पुण्य लेना उचित है? इसी बीच शिबि के अद्वितीय राजधर्म—दान, तप, सत्य, क्षमा, लज्जा, श्री—का स्मरण कराया जाता है, जिससे ययाति का आदर्श और कठोर हो उठता है। → ययाति का निर्णायक वचन—सत्य और धर्म के आधार पर प्रतिग्रह-अस्वीकार: ‘सत्य से ही द्यौ और पृथ्वी टिके हैं; मेरा वचन व्यर्थ नहीं—सत्पुरुष सत्य का ही पूजन करते हैं।’ वे अष्टक, प्रतर्दन, वसुमान्, उषदर्शि आदि से भी सत्य-प्रतिज्ञा में स्थिर रहने की घोषणा करते हैं और स्वर्ग-प्राप्ति का मार्ग ईर्ष्या-रहित सत्य-निवेदन में बताते हैं। → ययाति अपने कर्मों की महिमा से पृथ्वी को व्याप्त कर, प्रतिग्रह त्यागकर, अपने ही पुण्यबल से स्वर्गगमन करते हैं; उनके वंशज/दौहित्र (अष्टक आदि) सत्य और निष्कपटता के द्वारा उन्हें ‘तार’ देते हैं—ययाति की कीर्ति और धर्म-प्रतिष्ठा स्थापित होती है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २१ श्लोक हैं) त्रिनवतितमो<ध्याय: राजा ययातिका वसुमान्‌ और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना वसुमानुवाच पृच्छामि त्वां वसुमानौषदद्रि- यद्यस्ति लोको दिवि मे नरेन्द्र | यद्यन्तरिक्षे प्रथितो महात्मन्‌ क्षेत्रज्ञ त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये,वसुमानने कहा--नरेन्द! मैं उषदश्वका पुत्र वसुमान्‌ हूँ और आपसे पूछ रहा हूँ। यदि स्वर्ग या अन्तरिक्षमें मेरे लिये भी कोई विख्यात लोक हों तो बताइये। महात्मन्‌! मैं आपको पारलौकिक धर्मका ज्ञाता मानता हूँ

Vasumān said: “O king, I ask you—I am Vasumān, son of Auṣadadri. If there is a renowned realm for me in heaven, or if there is one celebrated in the mid-region (antarikṣa), please tell me. O great-souled one, I regard you as a knower of the law that governs the other world; you are, in my view, a true ‘knower of the field’ (kṣetrajña) of that dharma.”

Verse 2

ययातिरुवाच यदन्तरिक्षं पृथिवी दिशश्व यत्तेजसा तपते भानुमांश्व । लोकास्तावन्‍न्तो दिवि संस्थिता वै ते नान्तवन्तः प्रतिपालयन्ति,ययातिने कहा--राजन्‌! पृथ्वी, आकाश और दिशाओंके जितने प्रदेशको सूर्यदेव अपनी किरणोंसे तपाते और प्रकाशित करते हैं; उतने लोक तुम्हारे लिये स्वर्गमें स्थित हैं। वे अन्तवान्‌ न होकर चिरस्थायी हैं और आपकी प्रतीक्षा करते हैं

Yayāti said: “O king, as far as the earth, the mid-space, and the quarters extend—so far as the radiant Sun heats and illumines with his splendor—so many worlds are established for you in heaven. They are not of limited duration; they stand enduring, awaiting you.”

Verse 3

वसुमानुवाच तांस्‍्ते ददानि मा प्रपत प्रपात॑ ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु | क्रीणीष्वैतांस्तृणकेनापि राजन्‌ प्रतिग्रहस्ते यदि धीमन्‌ प्रदुष्ट:,वसुमान्‌ बोले--राजन्‌! वे सभी लोक मैं आपके लिये देता हूँ, आप नीचे न गिरें। मेरे लिये जितने पुण्यलोक हैं, वे सब आपके हो जायँ। धीमन्‌! यदि आपको प्रतिग्रह लेनेमें दोष दिखायी देता हो तो एक मुट्ठी तिनका मुझे मूल्यके रूपमें देकर मेरे इन सभी लोकोंको खरीद लें

Vasumān said: “I give you those worlds—do not fall into ruin. Whatever meritorious realms are mine, let them truly become yours. O king, if you, wise one, regard accepting a gift as morally tainted, then buy these worlds from me even for a mere blade of grass, taking it as the price.”

Verse 4

ययातिरु्वाच न भिथ्याहं विक्रयं वै स्मरामि वृथा गृहीतं शिशुकाच्छडकमान: । कुर्या न चैवाकृतपूर्वमन्यै- विधित्समान: किमु तत्र साधु,ययातिने कहा--मैंने इस प्रकार कभी झूठ-मूठकी खरीद-बिक्री की हो अथवा छलपूर्वक व्यर्थ कोई वस्तु ली हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है। मैं कालचक्रसे शंकित रहता हूँ। जिसे पूर्ववर्ती अन्य महापुरुषोंने नहीं किया वह कार्य मैं भी नहीं कर सकता हूँ; क्योंकि मैं सत्कर्म करना चाहता हूँ

Yayāti said: “I do not recall ever having engaged in false buying and selling, nor do I remember taking anything in vain through deceit, even from a child. Nor would I undertake an act that earlier great men have not done. For I seek to act according to what is right—so what good could there be in such a deed?”

Verse 5

वसुमानुवाच तांस्त्वं लोकान्‌ प्रतिपद्यस्व राजन्‌ मया दत्तान्‌ यदि नेष्ट: क्रयस्ते । अहं न तान्‌ वै प्रतिगन्ता नरेन्द्र सर्वे लोकास्तव ते वै भवन्तु,वसुमान्‌ बोले--राजन्‌! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वतः अर्पण किये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। नरेन्द्र! निश्चय जानिये, मैं उन लोकोंमें नहीं जाऊँगा। वे सब आपके ही अधिकारमें रहें

Vasumān said: “O King, if you do not wish to ‘purchase’ them, then accept those worlds that I have bestowed. O lord of men, know this for certain: I shall not go to those worlds. Let all those worlds indeed be yours.”

Verse 6

शिबिरुवाच पृच्छामि त्वां शिबिरौशीनरोडहं ममापि लोका यदि सन्‍्तीह तात । यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता: क्षेत्रज्ञ त्वां तस्य धर्मस्य मनन्‍्ये,शिबिने कहा--तात! मैं उशीनरका पुत्र शिबि आपसे पूछता हूँ। यदि अन्तरिक्ष या स्वर्गमें मेरे भी पुण्यलोक हों, तो बताइये; क्योंकि मैं आपको उक्त धर्मका ज्ञाता मानता हूँ

Śibi said: “I ask you, dear sir—I am Śibi, the son of Uśīnara. If there are meritorious worlds reserved for me hereafter, tell me—whether they lie in the mid-region (antarikṣa) or are established in heaven. For I regard you as one who truly knows that dharma.”

Verse 7

ययातिरुवाच यत्‌ त्वं वाचा हृदयेनापि साधून्‌ परीप्समानान्‌ नावमंस्था नरेन्द्र । तेनानन्ता दिवि लोका: श्रितास्ते विद्युद्रपा: स्वनवन्तो महान्त:,ययाति बोले--नरेन्द्र! जो-जो साधु पुरुष तुमसे कुछ माँगनेके लिये आये, उनका तुमने वाणीसे कौन कहे, मनसे भी अपमान नहीं किया। इस कारण स्वर्गमें तुम्हारे लिये अनन्त लोक विद्यमान हैं, जो विद्युतके समान तेजोमय, भाँति-भाँतिके सुमधुर शब्दोंसे युक्त तथा महान्‌ हैं

Yayāti said: “O king, because you never insulted—neither by speech nor even in your heart—those virtuous people who came seeking help, therefore endless heavenly realms are secured for you: vast worlds radiant like lightning and filled with resonant, delightful sounds.”

Verse 8

शिबिरुवाच तांस्त्वं लोकान्‌ प्रतिपद्यस्व राजन्‌ मया दत्तान्‌ यदि नेष्ट: क्रयस्ते । नचाहं तान्‌ प्रतिपत्स्ये ह दत्त्वा यत्र गत्वा नानुशोचन्ति धीरा:,शिबिने कहा--महाराज! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वयं अर्पण किये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। उन सबको देकर निश्चय ही मैं उन लोकोंमें नहीं जाऊँगा। वे लोक ऐसे हैं, जहाँ जाकर धीर पुरुष कभी शोक नहीं करते

Śibi said: “O King, if you do not wish to purchase them, then accept those worlds of merit that I myself have offered you. Having given them away, I certainly will not take those worlds for myself. They are realms such that, once reached, the steadfast do not grieve.”

Verse 9

ययातिरुवाच यथा त्वमिन्द्रप्रतिमप्रभाव- स्ते चाप्यनन्ता नरदेव लोका: । तथाद्य लोके न रमे<न्यदत्ते तस्माच्छिबे नाभिनन्दामि देयम्‌,ययाति बोले--नरदेव शिबि! जिस प्रकार तुम इन्द्रके समान प्रभावशाली हो, उसी प्रकार तुम्हारे वे लोक भी अनन्त हैं; तथापि दूसरेके दिये हुए लोकमें मैं विहार नहीं कर सकता, इसीलिये तुम्हारे दिये हुएका अभिनन्दन नहीं करता

Yayāti said: “O Śibi, king among men! Just as you possess power comparable to Indra, so too are the worlds you offer said to be endless. Yet I cannot take delight in a world granted by another; therefore, O Śibi, I do not accept with praise the gift you propose.”

Verse 10

अष्टक उवाच न चेदेकैकशो राजल्‍लोकान्‌ नः प्रतिनन्दसि । सर्वे प्रदाय भवते गन्तारो नरकं वयम्‌,अष्टकने कहा--राजन! यदि आप हममेंसे एक-एकके दिये हुए लोकोंको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण नहीं करते तो हम सब लोग अपने पुण्यलोक आपकी सेवामें अर्पित करके नरक (भूलोक)-में जानेको तैयार हैं

Aṣṭaka said: “O King, if you will not gladly accept, one by one, the worlds each of us offers, then we shall all bestow our worlds of merit upon you, and we are ready to go to hell (the mortal realm).”

Verse 11

ययातिरुवाच यदर्हों5हं तद्‌ यतध्व॑ं सन्त: सत्याभिनन्दिन: । अहं तन्नाभिजानामि यत्‌ कृतं न मया पुरा,ययाति बोले--मैं जिसके योग्य हूँ, उसीके लिये यत्न करो; क्योंकि साधु पुरुष सत्यका ही अभिनन्दन करते हैं। मैंने पूर्वकालमें जो कर्म नहीं किया, उसे अब भी करनेयोग्य नहीं समझता

Yayāti said: “You righteous ones, who rejoice in truth—strive for what is fitting for me. What I did not do in former times, I do not deem fit to do even now.”

Verse 12

अष्टक उवाच कस्यैते प्रतिदृश्यन्ते रथा: पठच हिरण्मया: । यानारुह्मु नरो लोकानभिवाऊ्छति शाश्वतान्‌,अष्टकने कहा--आकाशमें ये किसके पाँच सुवर्णमय रथ दिखायी देते हैं, जिनपर आरूढ़ होकर मनुष्य सनातन लोकोंमें जानेकी इच्छा करता है

Aṣṭaka said: “Whose are these five golden chariots that are seen here—chariots by mounting which a man longs to reach the eternal worlds?”

Verse 13

ययातिरुवाच युष्मानेते वहिष्यन्ति रथा: पञ्च हिरण्मया: । उच्चै: सन्त: प्रकाशन्ते ज्वलन्तो5ग्निशिखा इव,ययाति बोले--ऊपर आकाशमें स्थित प्रज्वलित अग्निकी लपटोंके समान जो पाँच सुवर्णमय रथ प्रकाशित हो रहे हैं, ये आपलोगोंको ही स्वर्गमें ले जायँगे

Yayāti said: “These five golden chariots will carry you. Lofty in the sky, they shine brilliantly, blazing like tongues of fire.”

Verse 14

(वैशग्पायन उवाच) (एतस्मिन्नन्तरे चैव माधवी तु तपोधना । मृगचर्मपरीताड़्ी परिणामे मृगव्रतम्‌ ।। मृगै: सह चरन्ती सा मृगाहारविचेष्टिता । यज्ञवाट्टं मृगगणै: प्रविश्य भृशविस्मिता ।। आध्रायन्ती धूमगन्धं मृगैरैव चचार सा । वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! इसी समय तपस्विनी माधवी उधर आ निकली। उसने मृगचर्मसे अपने सब अंगोंको ढक रखा था। वृद्धावस्था प्राप्त होनेपर वह मृगोंके साथ विचरती हुई मृगव्रतका पालन कर रही थी। उसकी भोजन-सामग्री और चेष्टा मृगोंके ही तुल्य थी। वह मृगोंके झुंडके साथ यज्ञमण्डपमें प्रवेश करके अत्यन्त विस्मित हुई और यज्ञीय धूमकी सुगन्ध लेती हुई मृगोंके साथ वहाँ विचरने लगी। यज्ञवाटमटन्ती सा पुत्रांस्तानपराजितान्‌ ।। पश्यन्ती यज्ञमाहात्म्यं मुदं लेभे च माधवी । यज्ञशालामें घूम-घूमकर अपने अपराजित पुत्रोंकोी देखती और यज्ञकी महिमाका अनुभव करती हुई माधवी बहुत प्रसन्न हुई। असंस्पृशन्तं वसुधां ययातिं नाहुषं तदा ।। दिविष्ठं प्राप्तमाज्ञाय ववन्दे पितरं तदा । ततो वसुमना:- पृच्छन्‌ मातरं वै तपस्विनीम्‌ ।। उसने देखा, स्वर्गवासी नहुषनन्दन महाराज ययाति आये हैं, परंतु पृथ्वीका स्पर्श नहीं कर रहे हैं (आकाशमें ही स्थित हैं)। अपने पिताको पहचानकर माधवीने उन्हें प्रणाम किया। तब वसुमनाने अपनी तपस्विनी मातासे प्रश्न करते हुए कहा। वसुमना उवाच भवत्या यत्‌ कृतमिदं वन्दनं वरवर्णिनि । को<यं देवो5थवा राजा यदि जानासि मे वद ।। वसुमना बोले--माँ! तुम श्रेष्ठ वर्णकी देवी हो। तुमने इन महापुरुषको प्रणाम किया है। ये कौन हैं? कोई देवता हैं या राजा? यदि जानती हो तो मुझे बताओ। माधव्युवाच शृणुध्वं सहिता: पुत्रा नाहुषो5यं पिता मम | ययातिर्मम पुत्राणां मातामह इति श्रुतः ।। पूरुं मे भ्रातरं राज्ये समावेश्य दिवं गत: । केन वा कारणेनैव इह प्राप्तो महायशा: ।। माधवीने कहा--पुत्रो! तुम सब लोग एक साथ सुन लो--'ये मेरे पिता नहुषनन्दन महाराज ययाति हैं। मेरे पुत्रोंके सुविख्यात मातामह (नाना) ये ही हैं। इन्होंने मेरे भाई पूरुको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वर्गलोककी यात्रा की थी; परंतु न जाने किस कारणसे ये महायशस्वी महाराज पुनः यहाँ आये हैं'। वैशम्पायन उवाच तस्यास्तदू वचन श्रुत्वा स्थान भ्रष्टेति चाब्रवीत्‌ | सा पुत्रस्य वच: श्रुत्वा सम्भ्रमाविष्टचेतना ।। माधवी पितरं प्राह दौहित्रपरिवारितम्‌ । वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! माताकी यह बात सुनकर वसुमनाने कहा--माँ! ये अपने स्थानसे भ्रष्ट हो गये हैं। पुत्रका यह वचन सुनकर माधवी भ्रान्तचित्त हो उठी और दौहित्रोंसे घिरे हुए अपने पितासे इस प्रकार बोली। माधव्युवाच तपसा निर्जिताल्लोकान्‌ प्रतिगृह्नीष्व मामकान्‌ । पुत्राणामिव पौत्राणां धर्मादधिगतं धनम्‌ ।। स्वार्थमेव वदन्‍्तीह ऋषयो वेदपारगा: । तस्माद्‌ दानेन तपसा अस्माकं दिवमाव्रज ।। माधवीने कहा--पिताजी! मैंने तपस्याद्वारा जिन लोकोंपर अधिकार प्राप्त किया है, उन्हें आप ग्रहण करें। पुत्रों और पौत्रोंकी भाँति पुत्री और दौहित्रोंका धर्माचरणसे प्राप्त किया हुआ धन भी अपने ही लिये है, यह वेदवेत्ता ऋषि कहते हैं; अतः आप हमलोगोंके दान एवं तपस्याजनित पुण्यसे स्वर्गलोकमें जाइये। ययातिरुवाच यदि धर्मफलं होतच्छोभनं भविता तथा । दुहित्रा चैव दौहित्रैस्तारितो5हं महात्मभि: ।। ययाति बोले--यदि यह धर्मजनित फल है, तब तो इसका शुभ परिणाम अवश्यम्भावी है। आज मुझे मेरी पुत्री तथा महात्मा दौहित्रोंने तारा है। तस्मात्‌ पवित्र दौहित्रमद्यप्रभृति पैतृके । भविष्यति न संदेह: 828, | प्रीतिवर्धनम्‌ ।। इसलिये आजसे पितृ-कर्म (श्राद्ध)-में दौहित्र परम पवित्र समझा जायगा। इसमें संशय नहीं कि वह पितरोंका हर्ष बढ़ानेवाला होगा। त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्र: कुतपस्तिला: । त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम्‌ ।। भोक्तार: परिवेष्टार: श्रावितार: पवित्रका: । श्राद्धमें तीन वस्तुएँ पवित्र मानी जायँगी--दौहित्र, कुतप और तिल। साथ ही इसमें तीन गुण भी प्रशंसित होंगे--पवित्रता, अक्रोध और अत्वरा (उतावलेपनका अभाव)। तथा श्राद्धमों भोजन करनेवाले, परोसनेवाले और (वैदिक या पौराणिक मन्त्रोंका पाठ) सुनानेवाले--ये तीन प्रकारके मनुष्य भी पवित्र माने जायूँगे। दिवसस्याष्टमे भागे मन्दी भवति भास्करे | स काल: कुतपो नाम पितृणां दत्तमक्षयम्‌ ।। दिनके आठवें भागमें जब सूर्यका ताप घटने लगता है, उस समयका नाम कुतप है। उसमें पितरोंके लिये दिया हुआ दान अक्षय होता है। तिला: पिशाचाद्‌ रक्षन्ति दर्भा रक्षन्ति राक्षसात्‌ । रक्षन्ति श्रोत्रिया: पद्धक्ति यतिभिर्भुक्तमक्षयम्‌ ।। तिल पिशाचोंसे श्राद्धकी रक्षा करते हैं, कुश राक्षसोंसे बचाते हैं, श्रोत्रिय ब्राह्मण पंक्तिकी रक्षा करते हैं और यदि यतिगण श्राद्धमें भोजन कर लें तो वह अक्षय हो जाता है। लब्ध्वा पात्र तु दिद्वांसं श्रोत्रियं सुव्रतं शुचिम्‌ । स काल: कालतो दत्त नान्यथा काल इष्यते ।। उत्तम व्रतका आचरण करनेवाला पवित्र श्रोत्रिय ब्राह्मण श्राद्धका उत्तम पात्र है। वह जब प्राप्त हो जाय, वही श्राद्धका उत्तम काल समझना चाहिये। उसको दिया हुआ दान उत्तम कालका दान है। इसके सिवा और कोई उपयुक्त काल नहीं है। वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा ययातिस्तु पुनः प्रोवाच बुद्धिमान । सर्वे ह्वभूथस्नातास्त्वरध्वं कार्यगौरवात्‌ ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! बुद्धिमान्‌ ययाति उपर्युक्त बात कहकर पुनः अपने दौहित्रोंसे बोले--“तुम सब लोग अवभूथस्नान कर चुके हो। अब महत्त्वपूर्ण कार्यकी सिद्धिके लिये शीघ्र तैयार हो जाओ'। अष्टक उवाच आतिष्ठस्व रथान्‌ राजन्‌ विक्रमस्व विहायसम्‌ । वयमप्यनुयास्यथामो यदा कालो भविष्यति,अष्टक बोले--राजन्‌! आप इन रथोंमें बैठिये और आकाशमें ऊपरकी ओर बढ़िये। जब समय होगा, तब हम भी आपका अनुसरण करेंगे

Aṣṭaka said: “O King, mount these chariots and ascend into the sky. When the proper time comes, we too shall follow after you.”

Verse 15

ययातिरुवाच सर्वैरिदानीं गन्तव्यं सह स्वर्गजितो वयम्‌ | एष नो विरजा: पन्था दृश्यते देवसझन:,ययाति बोले--हम सब लोगोंने साथ-साथ स्वर्गपर विजय पायी है, इसलिये इस समय सबको वहाँ चलना चाहिये। देवलोकका यह रजोहीन सात्त्विक मार्ग हमें स्पष्ट दिखायी दे रहा है

Yayāti said: “Now all of us must go together. We have won heaven as one company; therefore it is time to proceed there. Behold—this stainless, dustless path to the abode of the gods is clearly visible to us.”

Verse 16

वैशम्पायन उवाच तेडधिरुहय रथान्‌ सर्वे प्रयाता नृपसत्तमा: । आक्रमन्तो दिवं भाभिर्धमेणावृत्य रोदसी,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर वे सभी नृपश्रेष्ठ उन दिव्य रथोंपर आरूढ़ हो धर्मके बलसे स्वर्गमें पहुँचनेके लिये चल दिये। उस समय पृथ्वी और आकाशमें उनकी प्रभा व्याप्त हो रही थी

Vaiśampāyana said: Then all those foremost of kings mounted their chariots and set forth to reach heaven. Advancing upward, they filled both earth and sky with their radiance, as though the power of dharma itself had spread like a covering over the two worlds.

Verse 17

(अष्टकश्न शिबिश्वैव काशिराज: प्रतर्दन: । ऐक्ष्वाकवो वसुमनाश्षत्वारो भूमिपाश्च ह ।। सर्वे ह्रवभूथस्नाता: स्वर्गता: साधव: सह ।) अष्टक, शिबि, काशिराज प्रतर्दन तथा इक्ष्वाक॒वंशी वसुमना--ये चारों साधु नरेश यज्ञान्त-स्नान करके एक साथ स्वर्गमें गये। अष्टक उवाच अहं मन्ये पूर्वमेको 5स्मि गन्ता सखा चेन्द्र: सर्वथा मे महात्मा । कस्मादेवं शिबिरौशीनरो5य- मेको>त्यगात्‌ सर्ववेगेन वाहान्‌,अष्टक बोले--राजन्‌! महात्मा इन्द्र मेरे बड़े मित्र हैं, अतः मैं तो समझता था कि अकेला मैं ही सबसे पहले उनके पास पहुँचूँगा। परंतु ये उशीनरपुत्र शिबि अकेले सम्पूर्ण वेगसे हम सबके वाहनोंको लाँधकर आगे बढ़ गये हैं, ऐसा कैसे हुआ?

Aṣṭaka said: “I believed that I alone would arrive first, for the great-souled Indra is in every way my close friend. How, then, has this Śibi, the son of Uśīnara, by himself surpassed all our vehicles with full speed and gone ahead?”

Verse 18

ययातिरुवाच अददद्‌ देवयानाय यावद्‌ वित्तमविन्दत । उशीनरस्य पुत्रो5यं तस्माच्छेष्ठो हि व: शिबि:,ययातिने कहा--राजन्‌! उशीनरके पुत्र शिबिने ब्रह्मलोकके मार्गकी प्राप्तिके लिये अपना सर्वस्व दान कर दिया था, इसीलिये ये तुम सब लोगोंमें श्रेष्ठ हैं

Yayāti said: “He kept giving to Devayānī as much wealth as he could obtain. This Śibi is the son of Uśīnara; therefore, among you all, Śibi is indeed the foremost.” The statement highlights Śibi’s exemplary generosity—renouncing even what is most dear for a higher goal—held up as an ethical model of dāna (selfless giving) aligned with dharma.

Verse 19

दानं तपः सत्यमथापि धर्मो ह्वी: श्री: क्षमा सौम्यमथो विधित्सा । राजन्नेतान्यप्रमेयाणि राज्ञ: शिबे: स्थितान्यप्रतिमस्य बुद्धा,नरेश्वर! दान, तपस्या, सत्य, धर्म, ही, श्री, क्षमा, सौम्यभाव और व्रत-पालनकी अभिलाषा--राजा शिबिमें ये सभी गुण अनुपम हैं तथा बुद्धिमें भी उनकी समता करनेवाला कोई नहीं है

Aṣṭaka said: “O king, in King Śibi—who is without equal—there abide immeasurable virtues: generosity, austerity, truthfulness, righteousness, modesty, prosperity, forgiveness, gentleness, and the resolve to observe vows and right conduct. No one matches him in wisdom, O lord of men.”

Verse 20

एवंवृत्तो ह्वीनिषेवश्च॒ यस्मात्‌ तस्माच्छिबिरत्यगाद्‌ वै रथेन । राजा शिबि ऐसे सदाचारसम्पन्न और लज्जाशील हैं! (इनमें अभिमानकी मात्रा छू भी नहीं गयी है।) इसीलिये शिबि हम सबसे आगे बढ़ गये हैं। वैशम्पायन उवाच अथाष्टक: पुनरेवान्वपृच्छ- न्मातामहं कौतुकेनेन्द्रकल्पम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर अष्टकने कौतूहलवश इन्द्रके तुल्य अपने नाना राजा ययातिसे पुनः प्रश्न किया

Vaiśampāyana said: “Because Śibi is of such conduct—one who lives by modesty and is naturally shamefast—therefore he went ahead of all of us, riding in his chariot. Then Aṣṭaka, moved by curiosity, again questioned his grandfather, King Yayāti, who was like Indra in splendour.”

Verse 21

पृच्छामि त्वां नृपते ब्रूहि सत्यं कुतश्च कश्नचासि सुतश्न॒ कस्य । कृतं॑ त्वया यद्धि न तस्य कर्ता लोके त्वदन्य: क्षत्रियो ब्राह्मणों वा,महाराज! मैं आपसे एक बात पूछता हूँ। आप उसे सच-सच बताइये। आप कहाँसे आये हैं, कौन हैं और किसके पुत्र हैं? आपने जो कुछ किया है, उसे करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण इस संसारमें नहीं है

Vaiśaṃpāyana said: “I ask you, O king—tell me the truth. From where have you come, who are you, and whose son are you? For what you have done—there is no other doer of such a deed in this world besides you, whether among kṣatriyas or even among brāhmaṇas.”

Verse 22

ययातिरुवाच ययातिरस्मि नहुषस्य पुत्र: पूरो: पिता सार्वभौमस्त्विहासम्‌ । गुहां चार्थ मामकेभ्यो ब्रवीमि मातामहो<हं भवतां प्रकाशम्‌,ययातिने कहा--मैं नहुषका पुत्र और पूरुका पिता राजा ययाति हूँ। इस लोकमें मैं चक्रवर्ती नरेश था। आप सब लोग मेरे अपने हैं; अत: आपसे गुप्त बात भी खोलकर बतलाये देता हूँ। मैं आपलोगोंका नाना हूँ। (यद्यपि पहले भी यह बात बता चुका हूँ, तथापि पुनः स्पष्ट कर देता हूँ)

Yayāti said: “I am Yayāti, the son of Nahuṣa and the father of Pūru. In this very world I once held universal sovereignty. You are my own people; therefore I will disclose to you even what is meant to be kept secret. Let it be stated plainly: I am your maternal grandfather.”

Verse 23

सर्वामिमां पृथिवीं निर्जिगाय प्रादामहं छादन ब्राह्मणेभ्य: । मेध्यानश्वानेकशतान्‌ सुरूपां- स्तदा देवा: पुण्यभाजो भवन्ति,मैंने इस सारी पृथ्वीको जीत लिया था। मैं ब्राह्मणोंको अन्न-वस्त्र दिया करता था। मनुष्य जब एक सौ सुन्दर पवित्र अश्वोंका दान करते हैं, तब वे पुण्यात्मा देवता होते हैं

Vaiśampāyana said: “Having conquered this entire earth, I used to give food and clothing to the brāhmaṇas. When a person donates one hundred handsome, ritually pure horses, the gods become sharers in that merit—through such dharmic giving one becomes worthy of divine blessedness.”

Verse 24

अदामहं पृथिवी ब्राह्मणे भ्य: पूर्णामिमामखिलां वाहनेन । गोभि: सुवर्णेन धनैश्व मुख्यै- स्‍्तदाददं गा: शतमर्बुदानि,मैंने तो सवारी, गौ, सुवर्ण तथा उत्तम धनसे परिपूर्ण यह सारी पृथ्वी ब्राह्मणोंको दान कर दी थी एवं सौ अर्बुद (दस अरब) गौओंका दान भी किया था

Vaiśampāyana said: “I had bestowed upon the Brāhmaṇas this entire earth, made complete with conveyances, along with cattle, gold, and other foremost riches; and I also gave away a hundred arbuda (ten billion) cows.” The statement underscores the ideal of royal generosity—wealth and sovereignty are treated as instruments for dharmic giving, especially toward those regarded as custodians of sacred learning.

Verse 25

सत्येन वै द्यौश्व वसुन्धरा च तथैवाग्निज्वलते मानुषेषु । न मे वृथा व्याहृतमेव वाक्‍्यं सत्यं हि सन्त: प्रतिपूजयन्ति,सत्यसे ही पृथ्वी और आकाश टिके हुए हैं। इसी प्रकार सत्यसे ही मनुष्य-लोकमें अग्नि प्रज्वलित होती है। मैंने कभी व्यर्थ बात मुँहसे नहीं निकाली है; क्योंकि साधु पुरुष सदा सत्यका ही आदर करते हैं

By truth indeed the sky and the earth are upheld; and by truth, likewise, fire blazes among human beings. Never has a word of mine been uttered in vain, for the good and the virtuous always honor truth.

Verse 26

यदष्टक प्रब्रवीमीह सत्यं प्रतर्दन॑ चौषदर्शिंव तथैव । सर्वे च लोका मुनयश्न देवा: सत्येन पूज्या इति मे मनोगतम्‌,अष्टक! मैं तुमसे, प्रतर्दनसे और उषदश्चके पुत्र वसुमानसे भी यहाँ जो कुछ कहता हूँ; वह सब सत्य ही है। मेरे मनका यह विश्वास है कि समस्त लोक, मुनि और देवता सत्यसे ही पूजनीय होते हैं

Vaiśampāyana said: “O Aṣṭaka, what I declare here is the truth—so too (what I say) to Pratardana and to the son of Uṣadarśin. This is my settled conviction: all worlds, sages, and even the gods are worthy of honor through truth.”

Verse 27

यो नः स्वर्गजित: सर्वान्‌ यथा वृत्तं निवेदयेत्‌ अनसूयुर्दधिजाग्र्ये भ्य: स लभेन्न: सलोकताम्‌,जो मनुष्य हृदयमें ईर्ष्या न रखकर स्वर्गपर अधिकार करनेवाले हम सब लोगोंके इस वृत्तान्तको यथार्थरूपसे श्रेष्ठ द्विजोंके सामने सुनायेगा, वह हमारे ही समान पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेगा

Vaiśampāyana said: Whoever, free from envy, truthfully recounts this entire account of us—who have won heaven—to the foremost among the twice-born, will attain the same blessed world as ours.

Verse 28

वैशम्पायन उवाच एवं राजा स महात्मा हाृतीव स्वैर्दौह्वित्रैस्तारितो$मित्रसाह: । त्यक्त्वा महीं परमोदारकर्मा स्वर्ग गत: कर्मभिव्याप्य पृथ्वीम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा ययाति बड़े महात्मा थे। शत्रुओंके लिये अजेय और उनके कर्म अत्यन्त उदार थे। उनके दौहित्रोंने उनका उद्धार किया और वे अपने सत्कर्मोद्वारा सम्पूर्ण भूमण्डलको व्याप्त करके पृथ्वी छड़कर स्वर्गलोकमें चले गये

Vaiśampāyana said: Thus that king, a great-souled man—unyielding to foes—was, as it were, rescued by his own grandsons. Having renounced the earth, and being a doer of supremely generous deeds, he went to heaven, after his actions had spread his fame and influence across the whole world.

Verse 93

इति श्रीमहा भारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायातसमाप्तौ त्रिनवतितमो<ध्याय:

Thus, in the revered Mahābhārata, within the Ādi Parva and specifically the Sambhava Parva, the section concerning the completion of the account of Uttara’s departure comes to an end; here concludes the ninety-third chapter. This colophon signals a formal pause in the narration, marking the completion of a thematic unit and reminding the listener of the text’s careful organization and transmission.

Frequently Asked Questions

A conflict arises between established heirship (Devavrata’s position) and a new marital alliance conditioned on future succession, forcing a choice between personal desire, dynastic continuity, and public legitimacy.

The chapter models how satya and public vows can function as stabilizing ethical instruments in governance, while also implying that extreme self-sacrifice may secure short-term order yet generate complex long-term consequences.

Rather than a formal phalaśruti, the narrative provides meta-valuation through communal acclaim (“Bhīṣma”) and the boon of icchā-mṛtyu, signaling that the vow is treated as an extraordinary dharmic act with enduring epic significance.