“दुष्यन्त! माता तो केवल भाथी (धौंकनी)-के समान है। पुत्र पिताका ही होता है; क्योंकि जो जिसके द्वारा उत्पन्न होता है, वह उसीका स्वरूप है--इस न्यायसे पिता ही पुत्ररूपमें उत्पन्न होता है, अतः दुष्यन्त! तुम पुत्रका पालन करो। शकुन्तलाका अनादर मत करो। पौरव! पुत्र साक्षात् अपना ही शरीर है। वह पिताके सम्पूर्ण अंगोंसे उत्पन्न होता है। वास्तवमें वह पुत्र नामसे प्रसिद्ध अपना आत्मा ही है। ऐसा ही यह तुम्हारा पुत्र भी है। अपने द्वारा ही गर्भमें स्थापित किये हुए आत्मस्वरूप इस पुत्रकी तुम रक्षा करो। शकुन्तला तुम्हारे प्रति अनन्य अनुराग रखनेवाली धर्म-पत्नी है। इसे इसी दृष्टिसे देखो! उसका अनादर मत करो। दुष्यन्त! स्त्रियाँ अनुपम पवित्र वस्तु हैं, यह धर्मतः स्वीकार किया गया है। प्रत्येक मासमें इनके जो रज:स्राव होता है, वह इनके सारे दोषोंको दूर कर देता है। नरदेव! वीर्यका आधान करनेवाला पिता ही पुत्र बनता है और वह यमलोकसे अपने पितृगणका उद्धार करता है। तुमने ही इस गर्भका आधान किया था। शकुन्तला सत्य कहती है। जाया (पत्नी) दो भागोंमें विभक्त हुए पतिके अपने ही शरीरको पुत्ररूपमें उत्पन्न करती है || ११०-- ११२ || तस्माद् भरस्व दुष्यन्त पुत्र शाकुन्तलं नूप । अभूतिरेषा यत् त्यक्त्वा जीवेज्जीवन्तमात्मजम्,“इसलिये राजा दुष्यन्त! तुम शकुन्तलासे उत्पन्न हुए अपने पुत्रका पालन-पोषण करो। अपने जीवित पुत्रको त्यागकर जीवन धारण करना बड़े दुर्भाग्यकी बात है
tasmād bharasva duṣyanta putraṃ śākuntalaṃ nṛpa | abhūtir eṣā yat tyaktvā jīvej jīvantam ātmajam ||
Vaiśampāyana said: “Therefore, O Duṣyanta, O king, support and raise the son born of Śakuntalā. It is sheer misfortune to try to go on living while abandoning one’s own living child.”
वैशम्पायन उवाच
A father’s dharma is to acknowledge, protect, and raise his living child; abandoning one’s own offspring is portrayed as a grave ethical failure and a source of misfortune.
In the Śakuntalā–Duṣyanta episode, the narrator Vaiśampāyana urges King Duṣyanta to accept Śakuntalā’s son and fulfill his royal and familial responsibility by providing care and protection.