Adhyaya 155
Adi ParvaAdhyaya 15548 Verses

Adhyaya 155

Drupada’s Putrakāmeṣṭi: The Sacrificial Birth of Dhṛṣṭadyumna and Kṛṣṇā

Upa-parva: Drupada–Putrakāmeṣṭi (Birth of Dhṛṣṭadyumna and Kṛṣṇā) Episode

A brāhmaṇa narrator describes King Drupada’s sustained grievance and strategic anxiety regarding Droṇa’s superiority in arms and brahmanical force. Seeking an heir specifically capable of counterbalancing that threat, Drupada searches among numerous brahmin settlements and reaches a disciplined āśrama on the Gaṅgā’s bank. There he meets the sages Yāja and Upayāja, learned in saṃhitā recitation and marked by rigorous vows. Drupada attempts persuasion through service, honor, and large gifts, requesting a ritual that will grant him a son oriented toward the resolution of his conflict. Upayāja refuses, citing his elder brother’s compromised discernment in purity matters; Drupada then turns to Yāja, offering extensive cattle-gifts and requesting the rite. Yāja agrees, prepares the Vedic procedure, and at the culmination of oblations summons the goddess; despite her initial hesitation, the rite proceeds as an accomplished sacrificial act. From the fire arises a formidable, armed youth—Dhṛṣṭadyumna—acclaimed as a fear-removing prince and explicitly associated with Droṇa’s eventual downfall; subsequently a daughter arises from the altar, identified as Kṛṣṇā (Pāñcālī/Draupadī), praised for extraordinary beauty and foretold to be historically consequential. The chapter closes by noting Droṇa’s later acceptance of Dhṛṣṭadyumna as a student, framed as compliance with unavoidable destiny and concern for his own renown.

Chapter Arc: हिडिम्ब के वध के बाद वन में ठहरे पाण्डवों के सामने नया संकट उठता है—राक्षसी हिडिम्बा, जो शत्रु की बहन है, अब क्रोध नहीं, वरन् भीम के प्रति अनुराग लेकर उपस्थित होती है; युधिष्ठिर धर्म-सीमा की रक्षा हेतु भीम को रोकते हैं कि स्त्री-वध न हो। → युधिष्ठिर का प्रश्न तीखा है: ‘जिस राक्षस को मार दिया, उसकी भगिनी क्रुद्ध होकर हमसे क्या करेगी?’—यह भय भी है और नीति भी। हिडिम्बा अपनी निष्ठा सिद्ध करने के लिए सेवा-प्रतिज्ञा करती है—‘स्मरण करते ही उपस्थित रहूँगी, पीठ पर बैठाकर शीघ्र ले चलूँगी’—और भीम के प्रति अपना आग्रह प्रकट करती है। कुन्ती और भाइयों के हित, वन-जीवन की असुरक्षा, और कुल-धर्म—इन सबके बीच हिडिम्बा का प्रस्ताव परीक्षा बन जाता है। → धर्म और आवश्यकता के बीच निर्णायक क्षण आता है: पाण्डव हिडिम्बा की प्रार्थना स्वीकार करते हैं, भीम के साथ उसका गान्धर्व-विवाह होता है; तत्पश्चात् हिडिम्बा दिव्य-गति से भीम को रमणीय पर्वत-शिखरों, देव-निवासों और वन-प्रदेशों में ले जाकर क्रीड़ा कराती है—और इसी संयोग से घटोत्कच का जन्म सुनिश्चित होता है। → समय आने पर हिडिम्बा विशालकाय पुत्र घटोत्कच को लेकर पाण्डवों के पास आती है। घटोत्कच कुन्ती सहित पाण्डवों को यथाविधि प्रणाम कर अपनी शक्ति और निष्ठा प्रकट करता है; हिडिम्बा पुनः सहायता का वचन देती है और अपने लोक को लौट जाती है। पाण्डवों को वन-यात्रा में एक अदृश्य रक्षक और भविष्य का महाबली सहायक प्राप्त होता है। → घटोत्कच का यह प्रथम परिचय भविष्य के महासंग्राम की छाया डाल देता है—वन में अभी शान्ति है, परन्तु पाण्डव-भाग्य में एक राक्षसी-वीर का जुड़ना आने वाले युद्ध-काल के निर्णायक मोड़ों का संकेत बनता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-माज बछ। डे चतुष्पञ्चाशर्दाधेिकशततमो< ध्याय: युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति (वैशग्पायन उवाच सा तानेवापतत्‌ तूर्ण भगिनी तस्य रक्षस: । अनब्रुवाणा हिडिम्बा तु राक्षसी पाण्डवान्‌ प्रति ।। अभिवाद्य तत: कुन्तीं धर्मराजं च पाण्डवम्‌ । अभिपूज्य च तान्‌ सर्वान्‌ भीमसेनमभाषत ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! हिडिम्बा-सुरकी बहिन राक्षसी हिडिम्बा बिना कुछ कहे-सुने तुरंत पाण्डवोंके ही पास आयी और फिर माता कुन्ती तथा पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिरको प्रणाम करके उन सबके प्रति समादरका भाव प्रकट करती हुई भीमसेनसे बोली। हिडिग्बोवाच अहं ते दर्शनादेव मन्मथस्य वशं गता । क्रूरं भ्रातृवचो हित्वा सा त्वामेवानुरुन्धती ।। राक्षसे रौद्रसंकाशे तवापश्यं विचेष्टितम्‌ । अहं शुश्रूषुरिच्छेयं तव गात्र॑ निषेवितुम्‌ ।।) हिडिम्बाने कहा--(आर्यपुत्र!) आपके दर्शनमात्रसे मैं कामदेवके अधीन हो गयी और अपने भाईके क्रूरतापूर्ण वचनोंकी अवहेलना करके आपका ही अनुसरण करने लगी। उस भयंकर आकृतिवाले राक्षसपर आपने जो पराक्रम प्रकट किया है, उसे मैंने अपनी आँखों देखा है; अतः मैं सेविका आपके शरीरकी सेवा करना चाहती हूँ। भीमसेन उवाच स्मरन्ति वैरं रक्षांसि मायामाश्रित्य मोहिनीम्‌ । हिडिम्बे व्रज पन्थानं त्वमिमं भ्रातृसेवितम्‌,भीमसेन बोले--हिडिम्बे! राक्षस मोहिनी मायाका आश्रय लेकर बहुत दिनोंतक वैरका स्मरण रखते हैं, अतः तू भी अपने भाईके ही मार्गपर चली जा

Vaiśampāyana said: “O Janamejaya! Hiḍimbā, the rākṣasī—sister of that rākṣasa—came swiftly to the Pāṇḍavas without a word. Then she bowed to mother Kuntī and to Dharmarāja Yudhiṣṭhira, showed honor to them all, and spoke to Bhīmasena.” Hiḍimbā said: “O noble prince! At the very sight of you I fell under the power of Kāma-deva; casting aside my brother’s cruel words, I followed only you. I saw with my own eyes the valor you displayed against that dreadful-looking rākṣasa; therefore I wish to be your handmaid, to serve and tend your body.” Bhīmasena said: “O Hiḍimbā, the rākṣasas, taking refuge in delusive māyā, remember enmity for a long time. Therefore go—follow this path of yours that is devoted to your brother.”

Verse 2

युधिछिर उवाच क्रुद्धो5पि पुरुषव्याप्र भीम मा सम स्त्रियं वधी: । शरीरगुप्त्यभ्यधिकं धर्म गोपाय पाण्डव,यह सुनकर युधिष्ठिरने कहा--पुरुषसिंह भीम! यद्यपि तुम क्रोधसे भरे हुए हो, तो भी स्त्रीका वध न करो। पाण्डुनन्दन! शरीरकी रक्षाकी अपेक्षा भी अधिक तत्परतासे धर्मकी रक्षा करो

Yudhiṣṭhira said: “O tiger among men, Bhīma! Even if you are inflamed with anger, do not kill a woman. O son of Pāṇḍu, guard dharma with even greater vigilance than you guard your own body.”

Verse 3

वधाभिप्रायमायान्तमवधीस्त्वं महाबलम्‌ । रक्षसस्तस्य भगिनी कि नः क्रुद्धा करिष्यति,महाबली हिडिम्ब हमलोगोंको मारनेके अभिप्रायसे आ रहा था। अतः तुमने जो उसका वध किया, वह उचित ही है। उस राक्षसकी बहिन हिडिम्बा यदि क्रोध भी करे तो हमारा क्या कर लेगी?

Yudhiṣṭhira said: “That mighty rākṣasa was coming with the intent to kill us; therefore your slaying of him was entirely proper. As for his sister Hiḍimbā—if she becomes angry, what can she really do to us?”

Verse 4

वैशमग्पायन उवाच हिडिम्बा तु ततः कुन्तीमभिवाद्य कृताञ्जलि: । युधिष्टिरं तु कौन्तेयमिदं वचनमत्रवीत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर हिडिम्बाने हाथ जोड़कर कुन्तीदेवी तथा उनके पुत्र युधिष्ठिरको प्रणाम करके इस प्रकार कहा--

Vaiśampāyana said: Then Hiḍimbā, with palms joined in reverence, bowed to Kuntī and addressed Yudhiṣṭhira, the son of Kuntī, speaking these words.

Verse 5

आर्ये जानासि यद्‌ दुःखमिह स्त्रीणामनजड्रजम्‌ | तदिदं मामनुप्राप्तं भीमसेनकृतं शुभे,'आर्ये! स्त्रियोंकोी इस जगत्‌में जो कामजनित पीड़ा होती है, उसे आप जानती ही हैं। शुभे! आपके पुत्र भीमसेनकी ओरसे मुझे वही कामदेवजनित वष्ट प्राप्त हुआ है

“Noble lady, you already know the suffering that women experience in this world arising from desire. Auspicious one, that very anguish born of passion has now come upon me—brought about through your son Bhīmasena.”

Verse 6

सोढं तत्‌ परमं दु:खं मया कालप्रतीक्षया । सोडयमभ्यागत: कालो भविता मे सुखोदय:,“मैंने समयकी प्रतीक्षामें उस महान्‌ दुःखको सहन किया है। अब वह समय आ गया है। आशा है, मुझे अभीष्ट सुखकी प्राप्ति होगी

“I have endured that supreme sorrow while waiting for the right time. Now that time has arrived; I trust that the rise of happiness I have long desired will now come to me.”

Verse 7

मया हत्सृज्य सुहृदः स्वधर्म स्वजनं तथा । वृतो<यं पुरुषव्याप्रस्तव पुत्र: पति: शुभे,'शुभे! मैंने अपने हितैषी सुहृदों, स्वजनों तथा स्वधर्मका परित्याग करके आपके पुत्र पुरुषसिंह भीमसेनको अपना पति चुना है

Vaiśaṃpāyana said: “O auspicious lady, setting aside my well-wishers, my own kinsmen, and even the obligations of my dharma, I have chosen as my husband this tiger among men—your son Bhīmasena.”

Verse 8

वीरेणाहं तथानेन त्वया चापि यशस्विनि । प्रत्याख्याता न जीवामि सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते,“यशस्विनि! यदि ये वीरवर भीमसेन या आप मेरी इस प्रार्थनाको ठुकरा देंगी तो मैं जीवित नहीं रह सकूँगी। यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ

“O illustrious lady, if I am rejected by that hero—and by you as well—I shall not go on living. This I tell you in truth.”

Verse 9

तदर्हसि कृपां कर्तु मयि त्वं वरवर्णिनि । मत्वा मूढेति तन्मा त्वं भक्ता वानुगतेति वा,“अतः वरवर्णिनि! आपको मुझे एक मूढ़ स्वभावकी स्त्री मानकर या अपनी भक्ता जानकर अथवा अनुचरी (सेविका) समझकर मुझपर कृपा करनी चाहिये

“Therefore, O fair-complexioned lady, you ought to show compassion to me—do not treat me with contempt by thinking, ‘She is foolish,’ nor by regarding me merely as a devotee or as one who follows in attendance.”

Verse 10

भत्रानिन महाभागे संयोजय सुतेन ह । तमुपादाय गच्छेयं यथेष्टं देवरूपिणम्‌ | पुनश्चैवानयिष्यामि विस्रम्भं कुरु मे शुभे,“महाभागे! मुझे अपने इस पुत्रसे, जो मेरे मनोनीत पति हैं, मिलनेका अवसर दीजिये। मैं इन देवस्वरूप स्वामीको लेकर अपने अभीष्ट स्थानपर जाऊँगी और पुनः निश्चित समयपर इन्हें आपके समीप ले आऊँगी। शुभे! आप मेरा विश्वास कीजिये

“O noble lady, unite your brothers with your son. Taking this godlike one with me, I shall go to the place I desire; and then, at a fixed time, I will surely bring him back again. O auspicious one, place your trust in me.”

Verse 11

अहं हि मनसा ध्याता सर्वान्‌ नेष्यामि व: सदा । (न यातुधान्यहं त्वार्ये न चास्मि रजनीचरी । कन्या रक्षस्सु साध्व्यस्मि राज्ञि सालकटड्कटी ।। पुत्रेण तव संयुक्ता युवतिर्देववर्णिनी । सर्वान्‌ वो5हमुपस्थास्ये पुरस्कृत्य वृकोदरम्‌ ।। अप्रमत्ता प्रमत्तेषु शुश्रूषुरसकृत्‌ त्वहम्‌ ।) वृजिनात्‌ तारयिष्यामि दुर्गेषु विषमेषु च,“आप अपने मनसे जब-जब मेरा स्मरण करेंगे, तब-तब सदा ही (सेवामें उपस्थित हो) मैं आपलोगोंको अभीष्ट स्थानोंमें पहुँचा दिया करूँगी। आर्ये! मैं न तो यातुधानी हूँ और न निशाचरी ही हूँ। महारानी! मैं राक्षस जातिकी सुशीला कन्या हूँ और मेरा नाम सालकटंकटी है। मैं देवोपम कान्तिसे युक्त और युवावस्थासे सम्पन्न हूँ। मेरे हृदयका संयोग आपके पुत्र भीमसेनके साथ हुआ है। मैं वृकोदरको सामने रखकर आप सब लोगोंकी सेवामें उपस्थित रहूँगी। आपलोग असावधान हों, तो भी मैं पूरी सावधानी रखकर निरन्तर आपकी सेवामें संलग्न रहूँगी। आपको संकटोंसे बचाऊँगी। दुर्गण एवं विषम स्थानोंमें यदि आप शीघ्रतापूर्वक अभीष्ट लक्ष्यतक जाना चाहते हों तो मैं आप सब लोगोंको अपनी पीठपर बिठाकर वहाँ पहुँचाऊँगी। आपलोग मुझपर कृपा करें, जिससे भीमसेन मुझे स्वीकार कर लें

Vaiśaṃpāyana said: “If you but remember me in your mind, I shall always lead you all to your desired destinations. Noble lady, I am neither a yātudhānī nor a night-roaming demoness. O queen, I am a virtuous maiden among the Rākṣasas; my name is Sālakaṭaṅkaṭī. Radiant like a god and in the bloom of youth, my heart is joined to your son Bhīmasena. Placing Vṛkodara at the forefront, I shall attend upon you all in service. Even if you become careless, I shall remain vigilant, serving you repeatedly and without fail. I will deliver you from calamity, and in difficult and uneven places, if you wish to reach your goal swiftly, I will carry you upon my back and take you there. Show me favor, so that Bhīma may accept me.”

Verse 12

पृष्ठेन वो वहिष्यामि शीघ्रं गतिमभीप्सत: । यूयं प्रसादं कुरुत भीमसेनो भजेत माम्‌,“आप अपने मनसे जब-जब मेरा स्मरण करेंगे, तब-तब सदा ही (सेवामें उपस्थित हो) मैं आपलोगोंको अभीष्ट स्थानोंमें पहुँचा दिया करूँगी। आर्ये! मैं न तो यातुधानी हूँ और न निशाचरी ही हूँ। महारानी! मैं राक्षस जातिकी सुशीला कन्या हूँ और मेरा नाम सालकटंकटी है। मैं देवोपम कान्तिसे युक्त और युवावस्थासे सम्पन्न हूँ। मेरे हृदयका संयोग आपके पुत्र भीमसेनके साथ हुआ है। मैं वृकोदरको सामने रखकर आप सब लोगोंकी सेवामें उपस्थित रहूँगी। आपलोग असावधान हों, तो भी मैं पूरी सावधानी रखकर निरन्तर आपकी सेवामें संलग्न रहूँगी। आपको संकटोंसे बचाऊँगी। दुर्गण एवं विषम स्थानोंमें यदि आप शीघ्रतापूर्वक अभीष्ट लक्ष्यतक जाना चाहते हों तो मैं आप सब लोगोंको अपनी पीठपर बिठाकर वहाँ पहुँचाऊँगी। आपलोग मुझपर कृपा करें, जिससे भीमसेन मुझे स्वीकार कर लें

Vaiśaṃpāyana said: “I will carry you upon my back swiftly to whatever destination you desire. Show me your favor, so that Bhīmasena may accept me.”

Verse 13

आपदस्तरणे प्राणान्‌ धारयेद्‌ येन तेन वा । सर्वमावृत्य कर्तव्यं तं धर्ममनुवर्तता,“जिस उपायसे भी आपत्तिसे छुटकारा मिले और प्राणोंकी रक्षा हो सके, धर्मका अनुसरण करनेवाले पुरुषको वह सब स्वीकार करके उस उपायको काममें लाना चाहिये

Vaiśaṃpāyana said: “When calamity must be crossed, one should preserve one’s life by whatever means are available. A person committed to dharma should, covering over everything else, accept and employ that very expedient which rescues him from danger and safeguards his life.”

Verse 14

आपपत्सु यो धारयति धर्म धर्मविदुत्तम: । व्यसन होव धर्मस्य धर्मिणामापदुच्यते,“जो आपत्तिकालमें धर्मको धारण करता है, वही धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ है। धर्मपालनमें संकट उपस्थित होना ही धर्मात्मा पुरुषोंके लिये आपत्ति कही जाती है

He who upholds dharma when calamity strikes is the foremost among those who truly know dharma. For the righteous, the very ‘misfortune’ is this: that the practice of dharma itself becomes beset with hardship and obstruction.

Verse 15

पुण्यं प्राणान्‌ धारयति पुण्यं प्राणदमुच्यते । येन येनाचरेद्‌ धर्म तस्मिन्‌ गर्हा न विद्यते,“पुण्य ही प्राणोंको धारण करता है, इसलिये पुण्य प्राणदाता कहलाता है; अतः जिस- जिस उपायसे धर्मका आचरण हो सके, उसके करनेमें कोई निन्दाकी बात नहीं है

Merit (puṇya) sustains life-breath itself; therefore it is called the giver of life. Hence, by whatever means one is able to practice dharma, in that there is no ground for censure.

Verse 16

(महतोऊत्र स्त्रियं कामाद बाधितां त्राहि मामपि । धर्मार्थकाममोक्षेषु दयां कुर्वन्ति साधव: ।। तं तु धर्ममिति प्राहुर्मुन॒यो धर्मवत्सला: । दिव्यज्ञानेन पश्यामि अतीतानागतानहम्‌ ।। तस्माद्‌ वक्ष्यामि व: श्रेय आसन्न॑ सर उत्तमम्‌ | अद्यासाद्य सर: स्नात्वा विश्रम्य च वनस्पतौ ।। व्यासं कमलपत्राक्षं दृष्टवा शोक॑ विहास्यथ ।। धार्तराष्ट्राद्‌ विवासश्व दहनं वारणावते । त्राणं च विदुरात्‌ तुभ्यं विदितं ज्ञानचक्षुषा ।। आवासे शालिहोत्रस्य स च वासं विधास्यति । वर्षवातातपसह: अयं पुण्यो वनस्पति: ।। पीतमात्रे तु पानीये क्षुत्पिपासे विनश्यतः । तपसा शालिहोत्रेण सरो वक्षश्न निर्मित: ।। कादम्बा: सारसा हंसा: कुरर्य: कुररै:ः सह | रुवन्ति मधुरं गीत॑ गान्धर्वस्वनमिश्रितम्‌ ।। “मैं महती कामवेदनासे पीड़ित एक नारी हूँ, अतः आप मेरी भी रक्षा कीजिये। साधु पुरुष धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिके सभी पुरुषार्थोके लिये शरणागतोंपर दया करते हैं। धर्मानुरागी महर्षि दयाको ही श्रेष्ठ धर्म मानते हैं। मैं दिव्य ज्ञानससे भूत और भविष्यकी घटनाओंको देखती हूँ। अतः आपलोगोंके कल्याणकी बात बता रही हूँ। यहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक उत्तम सरोवर है। आपलोग आज वहाँ जाकर उस सरोवरमें स्नान करके वृक्षके नीचे विश्राम करें। कुछ दिन बाद कमलनयन व्यासजीका दर्शन पाकर आपलोग शोकमुक्त हो जायँगे। दुर्योधनके द्वारा आपलोगोंका हस्तिनापुरसे निकाला जाना, वारणावत नगरमें जलाया जाना और विदुरजीके प्रयत्नसे आप सब लोगोंकी रक्षा होनी आदि बातें उन्हें ज्ञानदृष्टिसे ज्ञात हो गयी हैं। वे महात्मा व्यास शालिहोत्र मुनिके आश्रममें निवास करेंगे। उनके आश्रमका वह पवित्र वृक्ष सर्दी, गर्मी और वर्षाको अच्छी तरह सहनेवाला है। वहाँ केवल जल पी लेनेसे भूख-प्यास दूर हो जाती है। शालिहोत्र मुनिने अपनी तपस्यद्वारा पूर्वोक्त सरोवर और वृक्षका निर्माण किया है। वहाँ कादम्ब, सारस, हंस, कुररी और कुरर आदि पक्षी संगीतकी ध्वनिसे मिश्रित मधुर गीत गाते रहते हैं'। वैशम्पायन उवाच तस्यास्तदू वचन श्रुत्वा कुन्ती वचनमत्रवीत्‌ । युधिष्ठिरं महाप्राज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम्‌ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! हिडिम्बाका यह वचन सुनकर कुन्तीदेवीने सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पारंगत परम बुद्धिमान्‌ युधिष्ठिससे इस प्रकार कहा। कुन्त्युवाच त्वं हि धर्मभृतां श्रेष्ठ मयोक्ते शूणु भारत । राक्षस्येषा हि वाक्येन धर्म वदति साधु वै ।। भावेन दुष्टा भीम॑ सा कि करिष्यति राक्षसी । भजतां पाण्डवं वीरमपत्यार्थ यदीच्छसि ।।) कुन्ती बोली--धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भारत! मैं जो कहती हूँ, उसे तुम सुनो; यह राक्षसी अपनी वाणीद्वारा तो उत्तम धर्मका ही प्रतिपादन करती है। यदि इसकी हार्दिक भावना भीमसेनके प्रति दूषित हो, तो भी यह उनका क्या बिगाड़ लेगी? अतः यदि तुम्हारी सम्मति हो तो यह संतानके लिये कुछ कालतक मेरे वीर पुत्र पाण्डुनन्दन भीमसेनकी सेवामें रहे। युधिछिर उवाच एवमेतद्‌ यथा<>त्थ त्वं हिडिम्बे नात्र संशय: । स्थातव्यं तु त्वया सत्ये यथा ब्रूयां सुमध्यमे,युधिष्ठिर बोले--हिडिम्बे! तुम जैसा कह रही हो, वह सब ठीक है; इसमें संशय नहीं है। परंतु सुमध्यमे! मैं जैसे कहूँ, उसी प्रकार तुम्हें सत्यपर स्थिर रहना चाहिये

Yudhiṣṭhira said: “Protect me as well—here stands a woman afflicted by the force of desire. The good show compassion to those who seek refuge, for the sake of all human aims: dharma, prosperity, pleasure, and liberation. The sages devoted to dharma declare that compassion itself is dharma. With divine knowledge I behold what has been and what is yet to come. Therefore I shall tell you what is for your welfare. Not far from here is an excellent lake. Go there today, bathe in it, and rest beneath a tree. Before long, on seeing Vyāsa—lotus-eyed—you will cast off grief. By the eye of knowledge he already knows your exile at the hands of the Dhārtarāṣṭra, the attempt to burn you at Vāraṇāvata, and your rescue through Vidura. He will dwell at the hermitage of the sage Śālihotra. There stands a sacred tree, enduring rain, wind, and heat. By merely drinking its water, hunger and thirst subside. Through Śālihotra’s austerities the lake and the tree were brought into being. There, kadamba-birds, cranes, swans, and ospreys, together with kuraras, sing sweetly with notes mingled like Gandharva-music.” Yudhiṣṭhira then replied: “Hiḍimbe, what you have said is indeed so—there is no doubt. Yet you must remain steadfast in truth and act exactly as I instruct, O slender-waisted one.”

Verse 17

स्‍्नातं॑ कृताद्विकं भद्रे कृतकौतुकमजलम्‌ । भीमसेनं भजेथास्त्व॑ प्रागस्तगमनाद्‌ रवे:,भद्रे! जब भीमसेन स्नान, नित्यकर्म तथा मांगलिक वेशभूषा आदि धारण कर लें, तब तुम प्रतिदिन उनके साथ रहकर सूर्यास्त होनेसे पहलेतक ही उनकी सेवा कर सकती हो

Yudhiṣṭhira said: “O auspicious lady, once Bhīmasena has bathed, completed his daily rites, and put on his auspicious adornments, you may attend upon him and remain in his company each day—but only until before the sun sets.”

Verse 18

अहस्सु विहरानेन यथाकामं॑ मनोजवा | अयं त्वानयितव्यस्ते भीमसेन: सदा निशि,तुम मनके समान वेगसे चलने-फिरनेवाली हो, अतः दिनभर तो तुम इनके साथ अपनी इच्छाके अनुसार विहार करो, परंतु रातको सदा ही तुम्हें भीमसेनको (हमारे पास) पहुँचा देना होगा

Yudhiṣṭhira said: “O swift-moving one, by day you may roam as you please and take your recreation at will. But every night, Bhīmasena must unfailingly be brought back to us.”

Verse 19

(प्राक्‌ संध्यातो विमोक्तव्यो रक्षितव्यश्न नित्यश: । एवं रमस्व भीमेन यावद्‌ गर्भस्य वेदनम्‌ ।। एष ते समयो भगद्रे शुश्रूष्यश्चाप्रमत्तया । नित्यानुकूलया भूत्वा कर्तव्यं शोभनं त्वया ।। संध्याकाल आनेसे पहले ही इन्हें छोड़ देना होगा और नित्य-निरन्तर इनकी रक्षा करनी होगी। इस शर्तपर तुम भीमसेनके साथ सुखपूर्वक तबतक रहो, जबतक कि तुम्हें यह पता न चल जाय कि तुम्हारे गर्भमें बालक आ गया है। भद्रे! यही तुम्हारे लिये पालन करनेयोग्य नियम है। तुम्हें सावधान होकर भीमसेनकी सेवा करनी चाहिये और नित्य उनके अनुकूल होकर सदा उनकी भलाईमें संलग्न रहना चाहिये। ३७ ५। ४९, ५७८ युधिष्ठिरेणैवमुक्ता कुन्त्या चाड्केडधिरोपिता । भीमार्जुनान्तरगता यमाभ्यां च पुरस्कृता ।। तिर्यग युधिष्ठिरे याति हिडिम्बा भीमगामिनी । शालिहोत्रसरो रम्यमासेदुस्ते जलार्थिन: ।। तत्‌ तथेति प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तदा | वनस्पतितलं गत्वा परिमृज्य गृहं यथा ।। पाण्डवानां च वासं सा कृत्वा पर्णमयं तथा । आत्मनश्व तथा कुन्त्या एकोद्देशे चकार सा ।। पाण्डवास्तु ततः स्नात्वा शुद्धा: संध्यामुपास्य च । तृषिता: क्षुत्पिपासार्ता जलमात्रेण वर्तयन्‌ ।। शालिहोगत्रस्ततो ज्ञात्वा क्षुधार्तान्‌ पाण्डवांस्तदा | मनसा चिन्तयामास पानीयं भोजन महत्‌ | ततस्ते पाण्डवा: सर्वे विश्रान्ता: पृथया सह ।। यथा जतुगृहे वृत्तं राक्षसेन कृतं च यत्‌ । कृत्वा कथा बहुविधा: कथान्ते पाण्डुनन्दनम्‌ ।। कुन्तिराजसुता वाक्‍्यं भीमसेनमथात्रवीत्‌ ।। युधिष्ठिरके यों कहनेपर कुन्तीने हिडिम्बाको अपने हृदयसे लगा लिया। तदनन्तर वह युधिष्ठिससे कुछ दूरीपर रहकर भीमके साथ चल पड़ी। वह चलते समय भीम और अर्जुनके बीचमें रहती थी। नकुल और सहदेव सदा उसे आगे करके चलते थे। (इस प्रकार) वे (सब) लोग जल पीनेकी इच्छासे शालिहोत्र मुनिके रमणीय सरोवरके तटपर जा पहुँचे। वहाँ कुन्ती तथा युधिष्ठिरने पहले जो शर्त रखी थी, उसे स्वीकार करके हिडिम्बा राक्षसीने वैसा ही कार्य करनेकी प्रतिज्ञा की। तत्पश्चात्‌ उसने वृक्षके नीचे जाकर घरकी तरह झाड़ू लगायी और पाण्डवोंके लिये निवास-स्थानका निर्माण किया। उन सबके लिये पर्णशाला तैयार करनेके बाद उसने अपने और कुन्तीके लिये एक दूसरी जगह कुटी बनायी। तदनन्तर पाण्डवोंने स्नान करके शुद्ध हो संध्योपासना किया और भूख-प्याससे पीड़ित होनेपर भी केवल जलका आहार किया। उस समय शालिठोगत्र मुनिने उन्हें भूखसे व्याकुल जान मन-ही-मन उनके लिये प्रचुर अन्न-पानकी सामग्रीका चिन्तन किया (और उससे पाण्डवोंको भोजन कराया)। तदनन्तर कुन्तीदेवीसहित सब पाण्डव विश्राम करने लगे। विश्रामके समय उनमें नाना प्रकारकी बातें होने लगीं--किस प्रकार लाक्षागृहमें उन्हें जलानेका प्रयत्न किया गया तथा फिर राक्षस हिडिम्बने उन लोगोंपर किस प्रकार आक्रमण किया इत्यादि प्रसंग उनकी चर्चाके विषय थे। बातचीत समाप्त होनेपर कुन्तिराजकुमारी कुन्तीने पाण्डुनन्दन भीमसेनसे इस प्रकार कहा। कुन्त्युवाच यथा पाण्डुस्तथा मान्यस्तव ज्येष्ठो युधिष्ठिर: । अहं धर्मविधानेन मान्या गुरुतरा तव ।। तस्मात्‌ पाण्डुहितार्थ मे युवराज हित॑ कुरु । निकृता धार्तराष्ट्रेण पापेनाकृतबुद्धिना । दुष्कृतस्य प्रतीकारं न पश्यामि वृकोदर ।। तस्मात्‌ कतिपयाहेन योगक्षेमं भविष्यति ।। क्षेमं दु्गमिमं वासं वसिष्यामो यथासुखम्‌ । इदमद्य महद्‌ दु:खं धर्मकृच्छं वृकोदर ।। दृष्टवैव त्वां महाप्राज्ञ अनड्रािप्रचोदिता । युधिष्ठिरं च मां चैव वरयामास धर्मतः ।। धर्मार्थ देहि पुत्र त्वं स न: श्रेय: करिष्यति । प्रतिवाक्यं तु नेच्छामि हयावाभ्यां वचनं कुरु ।।) कुन्ती बोली--युवराज! तुम्हारे लिये जैसे महाराज पाण्डु माननीय थे, वैसे ही बड़े भाई युधिष्ठिर भी हैं। धर्मशास्त्रकी दृष्टिसे मैं उनकी अपेक्षा भी अधिक गौरवकी पात्र तथा सम्माननीय हूँ। अतः तुम महाराज पाण्डुके हितके लिये मेरी एक हितकर आज्ञाका पालन करो। वृकोदर! अपवित्र बुद्धिवाले पापात्मा दुर्योधनने हमारे साथ जो दुष्टता की है, उसके प्रतिशोधका उपाय मुझे कोई नहीं दिखायी देता। अतः कुछ दिनोंके बाद भले ही हमारा योगक्षेम सिद्ध हो। यह निवासस्थान अत्यन्त दुर्गम होनेके कारण हमारे लिये कल्याणकारी सिद्ध होगा। हम यहाँ सुखपूर्वक रहेंगे। महाप्राज्ञ भीमसेन! आज यह हमारे सामने अत्यन्त दुःखद धर्मसंकट उपस्थित हुआ है कि हिडिगम्बा तुम्हें देखते ही कामसे प्रेरित हो मेरे और युधिष्ठिरके पास आकर धर्मतः तुम्हें पतिके रूपमें वरण कर चुकी है। मेरी आज्ञा है कि तुम उसे धर्मके लिये एक पुत्र प्रदान करो। वह हमारे लिये कल्याणकारी होगा। मैं इस विषयमें तुम्हारा कोई प्रतिवाद नहीं सुनना चाहती। तुम हम दोनोंके सामने प्रतिज्ञा करो। वैशम्पायन उवाच तथेति तत्‌ प्रतिज्ञाय भीमसेनो<ब्रवीदिदम्‌ । शृणु राक्षसि सत्येन समयं ते वदाम्यहम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! “बहुत अच्छा” कहकर भीमसेनने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की (और हिडिम्बाके साथ गान्धर्व-विवाह कर लिया)। तत्पश्चात्‌ भीमसेन हिडिम्बासे इस प्रकार बोले--'राक्षसी! सुनो, मैं सत्यकी शपथ खाकर तुम्हारे सामने एक शर्त रखता हूँ

Vaiśampāyana said: “Before the time of twilight you must be released, and you must be protected constantly. On these terms, live joyfully with Bhīma until you come to know the sign of conception in your womb. O gentle one, this is the rule you must observe: with vigilance you should serve Bhīmasena, and by being ever agreeable to him, you should continually act for his welfare.”

Verse 20

यावत्‌ कालेन भवति पुत्रस्योत्पादनं शुभे । तावत्‌ कालं॑ गमिष्यामि त्वया सह सुमध्यमे,'शुभे! सुमध्यमे! जबतक तुम्हें पुत्रकी उत्पत्ति न हो जाय तभीतक मैं तुम्हारे साथ विहारके लिये चलूँगा”

“O auspicious lady, O slender-waisted one—until, in due course of time, a son is born to you, I shall go and remain with you, accompanying you in your pleasures and wanderings.”

Verse 21

वैशम्पायन उवाच तथेति तत्‌ प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तदा । भीमसेनमुपादाय सोर्ध्वमाचक्रमे तत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब “ऐसा ही होगा” यह प्रतिज्ञा करके हिडिम्बा राक्षसी भीमसेनको साथ ले वहाँसे ऊपर आकाशमें उड़ गयी

Vaiśampāyana said: Having pledged, “So be it,” the rākṣasī Hiḍimbā then took Bhīmasena with her and rose up from that place into the sky.

Verse 22

शैलशज्जेषु रम्येषु देवतायतनेषु च । मृगपक्षिविघुष्टेषु रमणीयेषु सर्वदा,उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास-स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु- पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्द्न भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य- मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननोंमें, हिमवान्‌ पर्वतके कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र-तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्मकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयोंमें घूम-फिरकर हिडिम्बाने परम सुन्दर रूप धारण करके पाण्डुनन्दन भीमसेनके साथ रमण किया। वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी, अतः उन-उन स्थानोंमें भीमसेनको आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी

Vaiśampāyana said: In delightful mountain-peaks, in the sanctuaries of the gods, and in ever-pleasant places resonant with the calls of deer and birds, she would continually roam—bringing joy to Bhīmasena.

Verse 23

कृत्वा च परमं रूप॑ सर्वाभरणभूषिता । संजल्पन्ती सुमधुरं रमयामास पाण्डवम्‌,उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास-स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु- पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्द्न भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य- मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननोंमें, हिमवान्‌ पर्वतके कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र-तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्मकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयोंमें घूम-फिरकर हिडिम्बाने परम सुन्दर रूप धारण करके पाण्डुनन्दन भीमसेनके साथ रमण किया। वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी, अतः उन-उन स्थानोंमें भीमसेनको आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी

Vaiśaṃpāyana said: Assuming a supremely beautiful form and adorning herself with every kind of ornament, she spoke in exceedingly sweet words and delighted the Pāṇḍava, Bhīmasena, the son of Pāṇḍu.

Verse 24

तथैव वनदुर्गेषु पुष्पितद्रुमवल्लिषु । सरस्सु रमणीयेषु पद्मोत्पलयुतेषु च,उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास-स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु- पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्द्न भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य- मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननोंमें, हिमवान्‌ पर्वतके कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र-तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्मकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयोंमें घूम-फिरकर हिडिम्बाने परम सुन्दर रूप धारण करके पाण्डुनन्दन भीमसेनके साथ रमण किया। वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी, अतः उन-उन स्थानोंमें भीमसेनको आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी

Vaiśampāyana said: In the same way, in hard-to-reach forest fastnesses adorned with flowering trees and creepers, and in delightful lakes graced with lotuses and blue lotuses, she moved about giving Bhīmasena joy.

Verse 25

नदीद्वीपप्रदेशेषु वैदूर्यसिकतासु च | सुतीर्थवनतोयासु तथा गिरिनदीषु च,उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास-स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु- पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्द्न भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य- मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननोंमें, हिमवान्‌ पर्वतके कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र-तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्मकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयोंमें घूम-फिरकर हिडिम्बाने परम सुन्दर रूप धारण करके पाण्डुनन्दन भीमसेनके साथ रमण किया। वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी, अतः उन-उन स्थानोंमें भीमसेनको आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी

Vaiśampāyana said: In river-islands and riverine tracts, on sands gleaming like vaidūrya (cat’s-eye gem), at holy fords (tīrthas) with lovely groves and waters, and likewise along mountain rivers, Hiḍimbā moved about with Bhīmasena, delighting him.

Verse 26

काननेषु विचित्रेषु पुष्पितद्रुमवल्लिषु । हिमवद्‌गिरिकुगञ्जेषु गुहासु विविधासु च,उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास-स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु- पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्द्न भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य- मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननोंमें, हिमवान्‌ पर्वतके कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र-तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्मकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयोंमें घूम-फिरकर हिडिम्बाने परम सुन्दर रूप धारण करके पाण्डुनन्दन भीमसेनके साथ रमण किया। वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी, अतः उन-उन स्थानोंमें भीमसेनको आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी

Vaiśampāyana said: In wondrous groves adorned with flowering trees and creepers, in the clustered thickets of the Himālaya, and in caves of many kinds, Hiḍimbā—moving from one delightful place to another—assuming a supremely beautiful form, brought joy to Bhīmasena, the son of Pāṇḍu.

Verse 27

प्रफुल्लशतपत्रेषु सरस्स्वमलवारिषु | सागरस्य प्रदेशेषु मणिहेमचितेषु च,उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास-स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु- पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्द्न भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य- मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननोंमें, हिमवान्‌ पर्वतके कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र-तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्मकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयोंमें घूम-फिरकर हिडिम्बाने परम सुन्दर रूप धारण करके पाण्डुनन्दन भीमसेनके साथ रमण किया। वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी, अतः उन-उन स्थानोंमें भीमसेनको आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी

Vaiśampāyana said: In lotus-lakes where the hundred-petalled flowers were fully in bloom and the waters were spotless, and along stretches of the seashore adorned with jewels and gold, Hiḍimbā—ever assuming a supremely beautiful form—wandered with Bhīmasena, delighting him with sweet speech and ornamented splendor.

Verse 28

पल्वलेषु च रम्येषु महाशालवनेषु च | देवारण्येषु पुण्येषु तथा पर्वतसानुषु,उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास-स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु- पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्द्न भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य- मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननोंमें, हिमवान्‌ पर्वतके कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र-तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्मकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयोंमें घूम-फिरकर हिडिम्बाने परम सुन्दर रूप धारण करके पाण्डुनन्दन भीमसेनके साथ रमण किया। वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी, अतः उन-उन स्थानोंमें भीमसेनको आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी

Vaiśampāyana said: In lovely marshy pools, in great forests of śāla trees, in sacred divine groves, and along the slopes and ridges of mountains, Hidimbā—ever assuming a supremely beautiful form, adorned with ornaments and speaking sweetly—moved about with Bhīmasena and brought him delight. The passage situates their union within pure, auspicious landscapes, emphasizing a phase of respite and domestic happiness for the Pāṇḍavas amid exile-like wandering, without departing from the broader dharmic frame of protection, companionship, and the continuity of the lineage.

Verse 29

गुहाकानां निवासेषु तापसायतनेषु च । सर्वर्तुफलरम्येषु मानसेषु सरस्सु च,उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास-स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु- पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्द्न भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य- मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननोंमें, हिमवान्‌ पर्वतके कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र-तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्मकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयोंमें घूम-फिरकर हिडिम्बाने परम सुन्दर रूप धारण करके पाण्डुनन्दन भीमसेनके साथ रमण किया। वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी, अतः उन-उन स्थानोंमें भीमसेनको आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी

Vaiśampāyana said: Hidimbā, assuming a supremely beautiful form and adorned with every kind of ornament, delighted Bhīmasena, the son of Pāṇḍu, by roaming with him through charming regions—among the dwellings of the Guhyakas, in hermitages of ascetics, and in lakes and pools made lovely by fruits of every season, including the sacred Mānasarovar. Moving with mind-like speed, she continually brought him joy as they wandered from place to place.

Verse 30

बिभ्रती परमं रूपं रमयामास पाण्डवम्‌ | रमयन्ती तथा भीमं तत्र तत्र मनोजवा,उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास-स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु- पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्द्न भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य- मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननोंमें, हिमवान्‌ पर्वतके कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र-तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्मकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयोंमें घूम-फिरकर हिडिम्बाने परम सुन्दर रूप धारण करके पाण्डुनन्दन भीमसेनके साथ रमण किया। वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी, अतः उन-उन स्थानोंमें भीमसेनको आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी

Vaiśampāyana said: Assuming a supremely beautiful form, she delighted the Pāṇḍava. Swift as the mind, she continued to gladden Bhīma again and again in various places, bringing him pleasure as she moved from spot to spot.

Verse 31

प्रजज्ञे राक्षसी पुत्र भीमसेनान्महाबलम्‌ | विरूपाक्षं महावकत्र शड्कुकर्ण बिभीषणम्‌,कुछ कालके पश्चात्‌ उस राक्षसीने भीमसेनसे एक महान्‌ बलवान पुत्र उत्पन्न किया, जिसकी आँखें विकराल, मुख विशाल और कान शंकुके समान थे। वह देखनेमें बड़ा भयंकर जान पड़ता था

After some time, that rākṣasī bore Bhīmasena a son of great might—his eyes fierce, his face broad, and his ears like cones. To behold, he seemed exceedingly dreadful.

Verse 32

भीमनादं सुताम्रोष्ठं तीक्ष्णदंष्टं महाबलम्‌ । महेष्वासं महावीर्य महासत्त्वं महाभुजम्‌,उसकी आवाज बड़ी भयानक थी। सुन्दर लाल-लाल ओठ, तीखी दाढ़ें, महान्‌ बल, बहुत बड़ा धनुष, महान्‌ पराक्रम, अत्यन्त धैर्य और साहस, बड़ी-बड़ी भुजाएँ, महान्‌ वेग और विशाल शरीर--ये उसकी विशेषताएँ थीं। वह महामायावी राक्षस अपने शत्रुओंका दमन करनेवाला था। उसकी नाक बहुत बड़ी, छाती चौड़ी तथा पैरोंकी दोनों पिंडलियाँ टेढ़ी और ऊँची थीं

Vaiśampāyana said: “He had a terrifying roar; his lips were beautifully copper-red; his fangs were sharp. He was of immense strength—an archer bearing a great bow—endowed with great valor, steadfast courage, and mighty arms.” (The narrative continues, describing this master of illusion among the rākṣasas as a formidable oppressor of enemies, marked by a huge nose, a broad chest, and oddly high, crooked shanks.)

Verse 33

महाजवं महाकायं॑ महामायमरिंदमम्‌ । दीर्घधोणं महोरस्कं विकटोद्धद्धपिण्डिकम्‌,उसकी आवाज बड़ी भयानक थी। सुन्दर लाल-लाल ओठ, तीखी दाढ़ें, महान्‌ बल, बहुत बड़ा धनुष, महान्‌ पराक्रम, अत्यन्त धैर्य और साहस, बड़ी-बड़ी भुजाएँ, महान्‌ वेग और विशाल शरीर--ये उसकी विशेषताएँ थीं। वह महामायावी राक्षस अपने शत्रुओंका दमन करनेवाला था। उसकी नाक बहुत बड़ी, छाती चौड़ी तथा पैरोंकी दोनों पिंडलियाँ टेढ़ी और ऊँची थीं

Vaiśampāyana said: He was of tremendous speed and colossal body, a master of great māyā, and a crusher of foes. His nose was long, his chest broad, and his calves were misshapen—raised and twisted—marking him as a terrifying, unnatural rākṣasa. The description underscores how formidable and deceptive such a rākṣasa can be, and how outward power, when joined to māyā, becomes a grave threat to order and safety.

Verse 34

अमानुषं मानुषजं भीमवेगं महाबलम्‌ | यः पिशाचानतीत्यान्यान्‌ बभूवातीव राक्षसान्‌,यद्यपि उसका जन्म मनुष्यसे हुआ था तथापि उसकी आकृति और शक्ति अमानुषिक थी। उसका वेग भयंकर और बल महान्‌ था। वह दूसरे पिशाचों तथा राक्षसोंसे बहुत अधिक शक्तिशाली था

Vaiśampāyana said: Though born of human parentage, he was in form and power beyond the human. His speed was terrifying and his strength immense; surpassing other piśācas and rākṣasas, he proved exceedingly mightier than them all.

Verse 35

बालो<पि यौवन प्राप्तो मानुषेषु विशाम्पते । सवस्त्रिषु परं वीर: प्रकर्षमगमद्‌ बली,राजन्‌! अवस्थामें बालक होनेपर भी वह मनुष्योंमें युवक-सा प्रतीत होता था। उस बलवान वीरने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंमें बड़ी निपुणता प्राप्त की थी

Vaiśampāyana said: “Though still a boy, O lord of the people, he appeared among men as one who had already reached youth. That mighty hero, O king, attained outstanding excellence in all weapons and martial disciplines.”

Verse 36

सद्यो हि गर्भान्‌ राक्षस्थो लभन्ते प्रसवन्ति च । कामरूपधराश्चैव भवन्ति बहुरूपिका:,राक्षसियाँ जब गर्भ धारण करती हैं, तब तत्काल ही उसको जन्म दे देती हैं। वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली और नाना प्रकारके रूप बदलनेवाली होती हैं

Vaiśampāyana said: “Rākṣasī women conceive and give birth almost at once. They can assume forms at will, and they are capable of taking on many different appearances.”

Verse 37

प्रणम्य विकच: पादावगृह्नात्‌ स पितुस्तदा । मातुश्न परमेष्वासस्तौ च नामास्य चक्रतु:,उस महान धनुर्धर बालकने पैदा होते ही पिता और माताके चरणोंमें प्रणाम किया। उसके सिरमें बाल नहीं उगे थे। उस समय पिता और माताने उसका इस प्रकार नामकरण किया

Vaiśampāyana said: Having bowed down, the hairless child then clasped his father’s feet; and he also bowed to his mother. Seeing this extraordinary sign of reverence at birth, the supreme archer—together with the mother—performed the child’s naming rite. The episode highlights innate humility and filial devotion as auspicious marks of character.

Verse 38

घटो हास्योत्कच इति माता त॑ प्रत्यभाषत । अब्रवीत्‌ तेन नामास्य घटोत्कच इति सम ह,बालककी माताने भीमसेनसे कहा--“इसका घट (सिर) उत्कच- अर्थात्‌ केशरहित है।' उसके इस कथनसे ही उसका नाम घटोत्कच हो गया

Vaiśampāyana said: His mother addressed the child, saying, “This one is ‘Ghaṭa’ and ‘Ut-kaca’—his head is like a pot and his hair is shorn (or absent).” From that very remark, his name came to be established as Ghaṭotkaca.

Verse 39

अनुरक्तश्न तानासीत्‌ पाण्डवान्‌ स घटोत्कच: । तेषां च दयितो नित्यमात्मनित्यो बभूव ह,घटोत्कचका पाण्डवोंके प्रति बड़ा अनुराग था और पाण्डवोंको भी वह बहुत प्रिय था। वह सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहता था

Vaiśampāyana said: Ghaṭotkaca was deeply devoted to the Pāṇḍavas, and they too always held him dear. Constantly, he remained bound to their will—steadfast in loyalty and ready obedience.

Verse 40

संवाससमयो जीर्ण इत्याभाष्य ततस्तु तान्‌ | हिडिम्बा समयं कृत्वा स्वां गतिं प्रत्यपद्यत,तदनन्तर हिडिम्बा पाण्डवोंसे यह कहकर कि भीमसेनके साथ रहनेका मेरा समय समाप्त हो गया, आवश्यकताके समय पुनः मिलनेकी प्रतिज्ञा करके अपने अभीष्ट स्थानको चली गयी

Vaiśampāyana said: Having addressed them, “The time of my cohabitation has run its course,” Hiḍimbā then made a pledge to meet again when need arose, and departed to her own destined abode.

Verse 41

घटोत्कचो महाकाय: पाण्डवान्‌ पृथया सह । अभिवाद्य यथान्यायमत्रवीच्च प्रभाष्य तान्‌,तत्पश्चात्‌ विशालकाय घटोत्कचने कुन्तीसहित पाण्डवोंको यथायोग्य प्रणाम करके उन्हें सम्बोधित करके कहा--“निष्पाप गुरुजन! आप नि:शंक होकर बतायें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?” इस प्रकार पूछनेवाले भीमसेनकुमारसे कुन्तीने कहा--

Vaiśampāyana said: Then Ghaṭotkaca, of mighty form, approached the Pāṇḍavas together with Pṛthā (Kuntī). Having paid them respectful homage in the proper manner and addressed them, he spoke: “O blameless elders and revered ones, speak without hesitation—what service shall I render to you?” As he thus inquired, Kuntī replied to Bhīma’s son.

Verse 42

कि करोम्यहमार्याणां निःशड्कं॑ वदतानघा: । त॑ ब्रुवन्तं भैमसेनिं कुन्ती वचनमत्रवीत्‌,तत्पश्चात्‌ विशालकाय घटोत्कचने कुन्तीसहित पाण्डवोंको यथायोग्य प्रणाम करके उन्हें सम्बोधित करके कहा--“निष्पाप गुरुजन! आप नि:शंक होकर बतायें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?” इस प्रकार पूछनेवाले भीमसेनकुमारसे कुन्तीने कहा--

“O blameless nobles, speak without hesitation: what shall I do for you?” As Bhīmasena’s son spoke thus, Kuntī replied in words.

Verse 43

त्वं कुरूणां कुले जात: साक्षाद्‌ भीमसमो हासि । ज्येष्ठ: पुत्रोडसि पञ्चानां साहाय्यं कुरु पुत्रक,“बेटा! तुम्हारा जन्म कुरुकुलमें हुआ है। तुम मेरे लिये साक्षात्‌ भीमसेनके समान हो। पाँचों पाण्डवोंके ज्येष्ठ पुत्र हो, अत: हमारी सहायता करो”

Vaiśampāyana said: “You were born in the lineage of the Kurus; you are, as it were, Bhīma himself in strength. You are the eldest son among the five; therefore, my child, extend your help to us.”

Verse 44

वैशम्पायन उवाच पृथयाप्येवमुक्तस्तु प्रणम्यैव वचो<ब्रवीत्‌ | यथा हि रावणो लोके इन्द्रजिच्च महाबल: । वर्ष्णवीर्यसमो लोके विशिष्टश्चाभवं नृषु,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुन्तीके यों कहनेपर घटोत्कचने प्रणाम करके ही उनसे कहा--'दादीजी! लोकमें जैसे रावण और मेघनाद बहुत बड़े बलवान थे, उसी प्रकार इस मानव-जगत्‌में मैं भी उन्हींके समान विशालकाय और महापराक्रमी हूँ; बल्कि उनसे भी बढ़कर हूँ

Vaiśampāyana said: Thus addressed by Pṛthā (Kuntī), he first bowed in reverence and then replied: “Just as Rāvaṇa and Indrajit are famed in the world as men of immense might, so too am I in this human realm—equal in prowess, and even distinguished above other men.”

Verse 45

कृत्यकाल उपस्थास्ये पितृनिति घटोत्कच: । आमन्त्र्य रक्षसां श्रेष्ठ: प्रतस्थे चोत्तरां दिशम्‌,“जब मेरी आवश्यकता होगी, उस समय मैं स्वयं अपने पितृवर्गकी सेवामें उपस्थित हो जाऊँगा।' यों कहकर राक्षसश्रेष्ठ घटोत्कच पाण्डवोंसे आज्ञा लेकर उत्तर दिशाकी ओर चला गया

“When the time of need arises, I, Ghaṭotkaca, shall present myself to serve my father and the line of my forebears.” Having spoken thus, the foremost of the rākṣasas took leave of the Pāṇḍavas and set out toward the northern quarter.

Verse 46

पाण्डवोंकी व्यासजीसे भेंट धृष्टद्युम्नकी घोषणा स हि सृष्टो मघवता शक्तिहेतोर्महात्मना । कर्णस्याप्रतिवीर्यस्य प्रतियोद्धा महारथ:,महामना इन्द्रने अनुपम पराक्रमी कर्णकी शक्तिका आघात सहन करनेके लिये घटोत्कचकी सृष्टि की थी। वह कर्णके सम्मुख युद्ध करनेमें समर्थ महारथी वीर था

Vaiśampāyana said: “Indeed, that great-souled Maghavat (Indra) created him for the sake of the Śakti—so that he might stand as a counter-champion, a mighty chariot-warrior, against Karṇa whose prowess was deemed unmatched. He was brought into being to endure the blow of Karṇa’s Śakti and thereby protect the larger cause of the Pāṇḍavas in the war.”

Verse 153

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत हिडिग्बवधपर्वमें लिडिम्बायुरके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ

Thus ends the one hundred and fifty-third chapter of the Ādi Parva of the Śrī Mahābhārata, within the section on the slaying of Hiḍimba, specifically connected with the killing of Liḍimbāyuraka.

Verse 154

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि घटोत्कचोत्पत्तौ चतुष्पड्चाशदधिकशततमो<्ध्याय:

Thus, in the Śrī Mahābhārata, within the Ādi Parva—specifically in the section on the slaying of Hiḍimba and the birth of Ghaṭotkaca—ends the one-hundred-and-fifty-fourth chapter. This colophon marks the close of a narrative unit in which the protection of the vulnerable and the consequences of violent beings are set within the epic’s larger moral order (dharma).

Frequently Asked Questions

The chapter frames a dharma-sankat around means and ends: Drupada seeks a ritually sanctioned outcome for a politically motivated objective, raising questions about intention (saṅkalpa), propriety, and the ethical limits of instrumental action within Vedic rites.

The narrative emphasizes that power is multi-modal—martial strength, brahmanical knowledge, and ritual authority interact—and that outcomes emerge from disciplined procedure and accumulated causality, not merely immediate force or desire.

No explicit phalaśruti is stated; instead, the chapter provides meta-commentary through prophecy and narrative framing, presenting the births as historically determinative and illustrating the epic’s broader logic of daiva (inevitability) operating through human institutions.