Ādi Parva, Adhyāya 147 — Kanyā-paridevita
The daughter’s lament on lineage and protection
पुरोचनभयादेव व्यदधात् संवृतं मुखम् । स तस्य तु गृहद्वारि वसत्यशुभधी: सदा । तत्र ते सायुधा: सर्वे वसन्ति सम क्षपां नूप,पुरोचनके भयसे उस सुरंग खोदनेवालेने उसके मुखको बंद कर दिया था। दुष्टबुद्धि पुरोचन सर्वदा मकानके द्वारपर ही निवास करता था और पाण्डवगण भी रात्रिके समय शस्त्र सँभाले सावधानीके साथ उस द्वारपर ही रहा करते थे। (इसलिये पुरोचनको आग लगानेका अवसर नहीं मिलता था।) वे दिनमें हिंस़र पशुओंके मारनेके बहाने एक वनसे दूसरे वनमें विचरते रहते थे। पाण्डव भीतरसे तो विश्वास न करनेके कारण सदा चौकजन्ने रहते थे, परंतु ऊपरसे पुरोचनको ठगनेके लिये विश्वस्तकी भाँति व्यवहार करते थे। राजन! वे संतुष्ट न होते हुए भी संतुष्टकी भाँति निवास करते और अत्यन्त विस्मययुक्त रहते थे
purocanabhayād eva vyadadhāt saṃvṛtaṃ mukham | sa tasya tu gṛhadvāri vasaty aśubhadhiḥ sadā | tatra te sāyudhāḥ sarve vasanti sma kṣapāṃ nṛpa |
Vaiśaṃpāyana said: “Out of fear of Purocana, the tunnel-digger sealed up its opening. That wicked-minded Purocana kept his constant post at the doorway of the house; and there, O king, all the Pāṇḍavas would spend the night armed and vigilant at that very door.”
वैशम्पायन उवाच