Dhaumya’s Enumeration of Eastern Tīrthas
Prācī-diś Tīrtha-kathana
हरिश्व भगवानास्ते प्रजापतिपुरस्कृत: । तत्र त्रीण्यग्निकुण्डानि येषां मध्येन जाह्नवी,राजेन्द्र! तत्पश्चात् महर्षियोंद्वारा प्रशंसित प्रयागतीर्थमें जाय। जहाँ ब्रह्मा आदि देवता, दिशा, दिक्पाल, लोकपाल, साध्य, लोकसम्मानित पितर, सनत्कुमार आदि महर्षि, अंगिरा आदि निर्मल ब्रह्मर्षि, नाग, सुपर्ण, सिद्ध, सूर्य, नदी, समुद्र, गन्धर्व, अप्सरा तथा ब्रह्माजीसहित भगवान् विष्णु निवास करते हैं। वहाँ तीन अग्निकुण्ड हैं जिनके बीचसे सब तीर्थोंसे सम्पन्न गंगा वेगपूर्वक बहती हैं। त्रिभुवनविख्यात सूर्यपुत्री लोकपावनी यमुनादेवी वहाँ गंगाजीके साथ मिली हैं। गंगा और यमुनाका मध्यभाग पृथ्वीका जघन माना गया है
hariśvā bhagavān āste prajāpati-puraskṛtaḥ | tatra trīṇy agni-kuṇḍāni yeṣāṁ madhyena jāhnavī ||
Pulastya sprach: „Dort wohnt der ehrwürdige Hariśvā, geehrt in Gegenwart von Prajāpati. In jener heiligen Gegend stehen drei Feueraltäre, und zwischen ihnen fließt die Jāhnavī—die Gaṅgā.“
पुलस्त्य उवाच