Prāyaścitta and Contextual Non-Culpability (प्रायश्चित्त-निमित्त-अदोषवाद)
है ० बक। ] अति्शशाए:<ह - क्योंकि 'स्वर्णहारी तु कुनखी सुरापः श्यामदन्तकः” (कर्म-विपाक) इस स्मृतिके अनुसार वे पूर्व जन्ममें क्रमशः सुवर्णकी चोरी करनेवाले और शराबी होते हैं। पज्चत्रिशो< ध्याय: पापकर्मके प्रायश्षित्तोंका वर्णन व्यास उवाच तपसा कर्मणा चैव प्रदानेन च भारत । पुनाति पापं पुरुष: पुनश्चैन्न प्रवर्तते,व्यासजी बोले--भरतनन्दन! मनुष्य तपसे यज्ञ आदि सत्कर्मोंसे तथा दानके द्वारा पापको धो-बहाकर अपने-आपको पवित्र कर लेता है, परंतु यह तभी सम्भव होता है, जब वह फिर पापमें प्रवृत्त न हो
vyāsa uvāca | tapasā karmaṇā caiva pradānena ca bhārata | punāti pāpaṃ puruṣaḥ punaś cainna pravartate ||
Vyāsa sprach: „O Bhārata, der Mensch wäscht Sünde ab durch Askese, durch rechtes Handeln (wie Opfer und andere vorgeschriebene Werke) und durch Geben. Doch diese Läuterung hat nur dann wahrhaft Bestand, wenn er sich nicht erneut der Sünde zuwendet.“
व्यास उवाच