Śuka’s Guṇa-Transcendence and Vyāsa’s Consolation (शुकगति-वर्णनम्)
आकिंचन्ये न मोक्षो5स्ति किंचन्ये नास्ति बन्धनम् । किंचन्ये चेतरे चैव जन्तुज्ञनिन मुच्यते,न तो अकिंचनता (दरिद्रता)-में मोक्ष है और न किंचनता (आवश्यक वस्तुओंसे सम्पन्न होने)-में बन्धन ही है। धन और निर्धनता दोनों ही अवस्थाओंमें ज्ञानसे ही जीवको मोक्षकी प्राप्ति होती है
Weder liegt Befreiung im völligen Nichtbesitz, noch liegt Bindung im Besitz. In Reichtum wie in Armut wird das Wesen allein durch Erkenntnis frei.
जनक उवाच