अहं तु तावत् पश्यामि कर्म यद् वर्तते कृतम् । गुणयुक्तं प्रकाशं वा पापेनानुपसंहितम्,परंतु मैं तो ऐसा देखता हूँ कि जो कर्म किया गया है वह पुण्य हो या पापयुक्त, प्रकटरूपमें किया गया हो या छिपाकर (तथा जान-बूझकर किया गया हो या अनजानमें), वह अपना फल अवश्य देता ही है
Ich aber sehe dies: Jede vollbrachte Tat—sei sie verdienstvoll oder sündhaft, offen getan oder verborgen (absichtlich oder unabsichtlich)—bringt gewiss ihre eigene Frucht hervor.
पराशर उवाच