Draupadī’s Exhortation on Rājadharma and Daṇḍa (द्रौपद्याः राजधर्मोपदेशः)
अभिमानवती नित्यं विशेषेण युधिष्ठिरे । लालिता सतत राज्ञा धर्मज्ञा धर्मदर्शिनी,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! अपने भाइयोंके मुखसे नाना प्रकारके वेदोंके सिद्धान्तोंको सुनकर भी जब कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर कुछ नहीं बोले, तब महान् कुलमें उत्पन्न हुई, युवतियोंमें श्रेष्ठ, स्थूल, नितम्ब और विशाल नेत्रोंवाली, पतियों एवं विशेषत: राजा युधिष्ठिरके प्रति अभिमान रखनेवाली, राजाकी सदा ही लाड़िली, धर्मपर दृष्टि रखनेवाली तथा धर्मको जाननेवाली श्रीमती महारानी द्रौपदी हाथियोंसे घिरे हुए यूथपति गजराजकी भाँति सिंहशार्दूल-सदृश पराक्रमी भाइयोंसे घिरकर बैठे हुए पतिदेव नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरकी ओर देखकर उन्हें सम्बोधित करके सान्त्वनापूर्ण परम मधुर वाणीमें इस प्रकार बोलीं
vaiśampāyana uvāca |
abhimānavatī nityaṁ viśeṣeṇa yudhiṣṭhire |
lālitā satataṁ rājñā dharmajñā dharmadarśinī ||
Vaiśampāyana sprach: Stets war sie stolz—besonders in Bezug auf Yudhiṣṭhira; vom König wurde sie unablässig geliebt und verwöhnt; sie kannte den Dharma und schaute ihn klar.
वैशम्पायन उवाच