(संदिदेश ततः प्रेष्यान् नागाह्नयगतिं प्रति । ततस्ते नरशार्टूलाश्षक्रुर्वै नूपशासनम् ।। सबसे पहले राजा युधिष्ठिरने अपने सेवकोंको हस्तिनापुरकी ओर चलनेका आदेश दिया। वे नरश्रेष्ठ राजसेवक महाराजकी आज्ञाका पालन करनेमें तत्पर हो गये। ततो राजा महातेजा: सधौम्य: सपरिच्छद: । ब्राह्मणै: स्वस्ति वाच्यैव निर्दयौ मन्दिराद् बहि: ।। तत्पश्चात् महातेजस्वी राजा युधिष्ठिर समस्त सामग्रियोंसे सुसज्जित हो ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर पुरोहित धौम्यके साथ राजभवनसे बाहर निकले। ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा गत्यर्थ स यथाविधि । अन्येभ्य: स तु दत्त्वार्थ गन्तुमेवोपचक्रमे ।। यात्राकी सफलताके लिये उन्होंने ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक धन देकर और दूसरोंको भी मनोवांछित वस्तुएँ अर्पित करके यात्रा प्रारम्भ की। सर्वलक्षणसम्पन्नं राजाह सपरिच्छदम् | तमारुहा[ महाराजो गजेन्द्रं षष्टिहायनम् ।। निषसाद गजस्कन्धे काञ्चने परमासने । हारी किरीटी हेमा भ: सर्वाभरणभूषित: ।। रराज राजन् पार्थो वै परया नृपशोभया । रुक्मवेदिगतः प्राज्यो ज्वलन्निव हुताशन: ।। राजाके बैठनेयोग्य एक साठ वर्षका गजराज सब आवश्यक सामग्रियोंसे सुसज्जित करके लाया गया। वह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न था। उसकी पीठपर सोनेका सुन्दर हौदा कसा गया था। महाराज युधिष्छिर (पूर्वोक्त रथसे उतर कर) उस गजराजपर आखूढ़ हो हौदेमें बैठे। उस समय वे हार, किरीट तथा अन्य सभी आभूषणोंसे विभूषित हो अपनी स्वर्णगौर-कान्ति तथा उत्कृष्ट राजोचित शोभासे सुशोभित हो रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो सोनेकी वेदीपर स्थापित अग्निदेव घीकी आहुतिसे प्रज्वलित हो रहे हों। ततो जगाम राजा स प्रहृष्टनरवाहन: । रथघोषेण महता पूरयन् वै नभ:स्थलम् ।। संस्तूयमान: स्तुतिभि: सूतमागधवन्दिभि: । महासैन्येन संवीतो यथा5<दित्य: स्वरश्मिभि: ।। तदनन्तर हर्षमें भरे हुए मनुष्यों तथा वाहनोंके साथ राजा युधिष्ठिर वहाँसे चल पड़े। वे (राजपरिवारके लोगोंसे भरे हुए पूर्वोक्त) रथके महान् घोषसे समस्त आकाशमण्डलको गुँजाते जा रहे थे। सूत, मागध और बन्दीजन नाना प्रकारकी स्तुतियोंद्वारा उनके गुण गाते थे। उस समय विशाल सेनासे घिरे हुए राजा युधिष्ठिर अपनी किरणोंसे आवृत हुए सूर्यदेवकी भाँति शोभा पा रहे थे। पाण्डुरेणातपत्रेण प्रियमाणेन मूर्थनि । बभौ युधिष्ठिरो राजा पौर्णमास्यामिवोडुराट् ।। उनके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे राजा युधिष्ठिर पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाते थे। चामरैहेमदण्डैश्व धूयमान: समन्ततः । जयाशिष: प्रह्ृष्टाणां नराणां पथि पाण्डव: ।। प्रत्यगृह्नाद् यथान्यायं यथावद् भरतर्षभ । उनके चारों ओर स्वर्णदण्डविभूषित चँवर डुलाये जाते थे। भरतश्रेष्ठ! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको मार्ममें बहुतेरे मनुष्य हर्षोल्लासमें भरकर “महाराजकी जय हो” कहते हुए शुभाशीर्वाद देते थे और वे यथोचितरूपसे सिर झुकाकर उन सबको स्वीकार करते थे। अपरे कुरुराजानं पथि यान्तं समाहिता: ।। स्तुवन्ति सततं सौख्यान्मृगपक्षिस्वनैर्नरा: । उस मार्ममें दूसरे बहुत-से मनुष्य एकाग्रचित्त हो मृगों और पक्षियोंकी-सी आवाजमें निरन्तर सुखपूर्वक कुरुराज युधिष्ठिरकी स्तुति करते थे। तथैव सैनिका राजन् राजानमनुयान्ति ये ।। तेषां हलहलाशब्दो दिवं स्तब्ध्वा प्रतिष्ठित: । जनमेजय! इसी प्रकार जो सैनिक राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे जा रहे थे, उनका कोलाहल भी समूचे आकाशमण्डलको स्तब्ध करके गूँज रहा था। नृपस्याग्रे ययौ भीमो गजस्कन्धगतो बली ।। उभौ पार्श्वगतौ राज्ञ: सदश्वौ वै सुकल्पितौ । अधिरूढौ यमौ चापि जम्मतुर्भरतर्षभ ।। शोभयन्तौ महासैन्यं तावुभौ रूपशालिनौ | हाथीकी पीठपर बैठे हुए बलवान् भीमसेन राजाके आगे-आगे जा रहे थे। उनके दोनों ओर सजे-सजाये दो श्रेष्ठ अश्व थे, जिनपर नकुल और सहदेव बैठे थे। भरतश्रेष्ठ! वे दोनों भाई स्वयं तो अपने रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित थे ही, उस विशाल सेनाकी भी शोभा बढ़ा रहे थे। पृष्ठतो$नुययौ धीमान् पार्थ: शस्त्रभृतां वर: ।। श्वेताश्वो गाण्डिवं गृह अग्निदत्तं रथं गतः । शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परम बुद्धिमान् श्वेतवाहन अर्जुन अग्निदेवके दिये हुए रथपर बैठकर गाण्डीव धनुष धारण किये महाराजके पीछे-पीछे जा रहे थे। सैन्यमध्ये ययौ राजन् कुरुराजो युधिष्ठिर: ।। द्रौपदीप्रमुखा नार्य: सानुगा: सपरिच्छदा: । आरुह्दु ता विचित्राणि शिबिकानां शतानि च ।। महत्या सेनया राजन्नग्रे राज्ञो ययुस्तदा । राजन! कुरुराज युधिष्ठिर सेनाके बीचमें चल रहे थे। द्रौपदी आदि स्त्रियाँ अपनी सेविकाओं तथा आवश्यक सामग्रियोंके साथ सैकड़ों विचित्र शिबिकाओं (पालकियों)-पर आरूढ़ हो बड़ी भारी सेनाके साथ महाराजके आगे-आगे जा रही थीं। समृद्धनरनागाश्वं सपताकरथध्वजम् ।। समृद्धरथनिस्त्रिंशं पत्तिभिर्घोषितस्वनम् । पाण्डवोंकी वह सेना हाथी-घोड़ों तथा पैदल सैनिकोंसे भरी-पूरी थी। उसमें बहुत-से रथ भी थे, जिनकी ध्वजाओंपर पताकाएँ फहरा रही थीं। उन सभी रथोंमें खड़ग आदि अस्त्र-शस्त्र संगृहीत थे। पैदल सैनिकोंका कोलाहल सब ओर फैल रहा था। शड्खदुन्दुभितालानां वेणुवीणानुनादितम् ।। शुशुभे पाण्डवं सैन्यं प्रयातं तत् तदा नृप । राजन! शंख, दुन्दुभि, ताल, वेणु और वीणा आदि वाद्योंकी तुमुल ध्वनि वहाँ गूँज रही थी। उस समय हस्तिनापुरकी ओर जाती हुई पाण्डवोंकी उस सेनाकी बड़ी शोभा हो रही थी। स सरांसि नदीश्वैव वनान्युपवनानि च ।। अत्यक्रामन्महाराज पुरी चाभ्यवपद्यत । हस्तीपुरसमीपे तु कुरुराजो युधिष्िर: ।। जनमेजय! कुरुराज युधिष्ठिर अनेक सरोवर, नदी, वन और उपवनोंको लाँघते हुए हस्तिनापुरके समीप जा पहुँचे। चक्रे निवेशनं तत्र ततः स सहसैनिक: । शिवे देशे समे चैव न्यवसत् पाण्डवस्तदा ।। वहाँ उन्होंने एक सुखद एवं समतल प्रदेशमें सैनिकोंसहित पड़ाव डाल दिया। उसी छावनीमें पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर स्वयं भी ठहर गये। ततो राजन् समाहूय शोकविह्नललया गिरा । एतद् वाक््यं च सर्वस्वं धृतराष्ट्रचिकीर्षितम् । आचचतक्षे यथावृत्तं विदुरोडथ तपस्य ह ।।) राजन्! तदनन्तर विदुरजीने शोकाकुल वाणीमें महाराज युधिष्ठिरको वहाँका सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया कि धृतराष्ट्र क्या करना चाहते हैं और इस द्यूतक्रीडाके पीछे क्या रहस्य है? धृतराष्ट्रेण चाहूत: कालस्य समयेन च,तब धुृतराष्ट्रके द्वारा बुलाये हुए कालके समयानुसार धर्मात्मा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर हस्तिनापुरमें पहुँचकर धृतराष्ट्रके भवनमें गये और उनसे मिले
saṃdideśa tataḥ preṣyān nāgāhnavī-gatiṃ prati | tataste naraśārdūlāś cakrur vai nṛpaśāsanam ||
Vaiśampāyana sprach: Darauf entsandte König Yudhiṣṭhira seine Diener mit dem Befehl, den Weg zum Lauf der Gaṅgā (und damit nach Hāstināpura) einzuschlagen. Jene Männer, wie Tiger unter Menschen, die Vornehmsten der Dienerschaft, führten den königlichen Auftrag unverzüglich aus. Die Szene betont königliche Disziplin und geordnete Herrschaft: Ein gerechter Herrscher handelt weder hastig noch im Verborgenen, sondern nach gebührendem Verfahren, mit klaren Weisungen und verantwortlicher Gefolgschaft—ein äußeres Zeichen innerer Bindung an das Dharma, auch wenn die Ereignisse ihn einer gefährlichen Einladung zutreiben.
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights disciplined kingship: a ruler’s intent becomes ethical action through clear command and orderly execution. Even before the moral crisis of the dice-game unfolds, Yudhiṣṭhira’s conduct reflects procedural righteousness—acting through proper channels rather than impulsively.
Yudhiṣṭhira sends his attendants ahead with instructions to move toward the Gaṅgā-route, i.e., toward Hāstinapura. The attendants promptly obey, setting in motion the Pandavas’ formal journey that will culminate in the fateful assembly and gambling episode.