Śalya’s Objection to Sārathya and Duryodhana’s Conciliation (शल्यमन्यु-प्रशमनम् / Sārathyāṅgīkāra)
त्वद्वोषात् कुरव: क्षीणा: समासाद्य परस्परम् | त्वामद्य समरे हत्वा कृतकृत्यो5स्मि विज्वर:,तब नकुलने कर्णसे हँसते हुए इस प्रकार कहा--“आज दीर्घकालके पश्चात् देवताओंने मुझे सौम्य दृष्टिसे देखा है; यह बड़े हर्षकी बात है। पापी कर्ण! मैं रणभूमिमें तेरी आँखोंके सामने आ गया हूँ। तू अच्छी तरह मुझे देख ले। तू ही इन सारे अनर्थोंकी तथा वैर एवं कलहकी जड़ है। तेरे ही दोषसे कौरव आपसमें लड़-भिड़कर क्षीण हो गये। आज मैं तुझे समरभूमिमें मारकर कृतकृत्य एवं निश्चिन्त हो जाऊँगा”
tvad-doṣāt kuravaḥ kṣīṇāḥ samāsādya parasparam | tvām adya samare hatvā kṛtakṛtyo 'smi vijvaraḥ ||
„Durch deine Schuld sind die Kurus geschwächt, da sie einander bekämpften. Heute, wenn ich dich im Kampf erschlage, werde ich mein Ziel erfüllt haben und frei von Sorge sein.“
संजय उवाच