Bhakti–Akṣara-Upāsanā-Viveka
Devotion to the Personal vs. Contemplation of the Imperishable
३३) अर्थात् एक बार भी "मैं तेरा हूँ” यों कहकर मेरी शरणमें आये हुए और मुझसे अभय चाहनेवालेको मैं सभी भूतोंसे अभय कर देता हूँ, यह मेरा व्रत है।। इसीलिये भगवान्ने अपनेको “शरण” कहा है। ३३. भगवान् समस्त प्राणियोंके बिना ही कारण उपकार करनेवाले परम हितैषी और सबके साथ अतिशय प्रेम करनेवाले परम बन्धु हैं, इसलिये उन्होंने अपनेको 'सुहृत्' कहा है। १४. जिसका कभी नाश न हो, उसे “अव्यय” कहते हैं। भगवान् समस्त चराचर भूतप्राणियोंके अविनाशी कारण हैं। सबकी उत्पत्ति उन्हींसे होती है, वे ही सबके परम आधार हैं। इसीसे उनको “अव्यय बीज” कहा है। गीताके सातवें अध्यायके दसवें श्लोकमें उन््हींको 'सनातन बीज” और दसवें अध्यायके उनतालीसवें श्लोकमें (सब भूतोंका बीज' बतलाया गया है। ३. भगवान् ही ईश्वरोंके महान् ईश्वर, देवताओंके परम दैवत, पतियोंके परम पति, समस्त भुवनोंके स्वामी और परम पूज्य परमदेव हैं (श्वेताश्बतर उप० ६।॥७)। २. जिसमें कोई वस्तु बहुत दिनोंके लिये रखी जाती हो, उसे “निधान' कहते हैं। महाप्रलयमें समस्त प्राणियोंके सहित अव्यक्त प्रकृति भगवानके ही किसी एक अंशमें धरोहरकी भाँति बहुत समयतक अक्रिय-अवस्थामें स्थित रहती है, इसलिये भगवानने अपनेको “निधान” कहा है। ३. इस श्लोकमें जितने भी शब्द आये हैं, सब-के-सब भगवान्के विशेषण हैं; अतः इस श्लोकमें पूर्वश्लोकोंकी भाँति “अहम्' पदका प्रयोग नहीं किया गया। ४. इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि अपनी किरणोंद्वारा समस्त जगत्को उष्णता और प्रकाश प्रदान करनेवाला तथा समुद्र आदि स्थानोंसे जलको उठाकर रोक रखनेवाला तथा उसे लोकहितार्थ मेघोंके द्वारा यथासमय यथायोग्य वितरण करनेवाला सूर्य भी मेरा ही स्वरूप है। ५, वास्तवमें अमृत तो एक भगवान् ही हैं, जिनकी प्राप्ति हो जानेपर मनुष्य सदाके लिये मृत्युके पाशसे मुक्त हो जाता है, इसीलिये भगवानने अपनेको “अमृत” कहा है और इसलिये मुक्तिको भी “अमृत” कहते हैं। ६. सबका नाश करनेवाले “काल” को '"मृत्यु” कहते हैं। भगवान् ही यथासमय लोकोंका संहार करनेके लिये महाकालरूप धारण किये रहते हैं। वे कालके भी काल हैं। इसीलिये भगवानने “मृत्यु” को अपना स्वरूप बतलाया है। ७. जिसका कभी अभाव नहीं होता, उस अविनाशी आत्माको 'सत्” कहते हैं और नाशवान् अनित्य वस्तुमात्रका नाम “असत' है। इन्हीं दोनोंको गीताके पंद्रहवें अध्यायमें “अक्षर” और “क्षर' पुरुषके नामसे कहा गया है। ये दोनों ही भगवानसे अभिन्न हैं, इसलिये भगवानने सत् और असतको अपना स्वरूप कहा है। ८. ऋक्, यजु: और साम--इन तीनों वेदोंको “वेदत्रयी” अथवा त्रिविद्या कहते हैं। इन तीनों वेदोंमें वर्णित नाना प्रकारके यज्ञोंकी विधि और उनके फलनें श्रद्धा-प्रेम रखनेवाले एवं उसके अनुसार सकामकर्म करनेवाले मनुष्योंको “त्रैविद्य” कहते हैं। यज्ञोमें सोमलताके रसपानकी जो विधि बतलायी गयी है, उस विधिसे सोमलताके रसपान करनेवालोंको 'सोमपा' कहते हैं। उपर्युक्त वेदोक्त कर्मोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान करनेसे जिनके स्वर्गप्राप्तिमें प्रतिबनधकरूप पाप नष्ट हो गये हैं, उनको “पूतपापा' कहते हैं। ये तीनों विशेषण ऐसी श्रेणीके मनुष्योंके लिये हैं, जो भगवान्की सर्वरूपतासे अनभिज्ञ हैं और वेदोक्त कर्मकाण्डपर प्रेम और श्रद्धा रखकर पापकर्मोंसे बचते हुए सकामभावसे यज्ञादि कर्मोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान किया करते हैं। ९, यज्ञादि पुण्यकर्मोंके फलरूपमें प्राप्त होनेवाले इन्द्रलोकसे लेकर ब्रह्मलोकपर्यन्त जितने भी लोक हैं, उन सबको लक्ष्य करके श्लोकमें 'पुण्यम” विशेषणके सहित '“सुरेन्द्रलोकम्” पदका प्रयोग किया गया है। अतः 'सुरेन्द्रलोकम” पद इन्द्रलोकका वाचक होते हुए भी उसे उपर्युक्त सभी लोकोंका वाचक समझना चाहिये। ३. स्वर्गादि लोकोंके विस्तारका, वहाँकी भोग्य-वस्तुओंका, भोगप्रकारोंका, भोग्य-वस्तुओंकी सुखरूपताका और भोगनेयोग्य शारीरिक तथा मानसिक शक्ति और परमायु आदि सभीका अनेक प्रकारका परिमाण मृत्युलोककी अपेक्षा कहीं विशद और महान् है। इसीलिये उसको “विशाल” कहा गया है। २. भगवानके स्वरूपतत्त्वको न जाननेवाले सकाम मनुष्य अनन्यचित्तसे भगवानकी शरण ग्रहण नहीं करते, भोगकामनाके वशमें होकर उपर्युक्त धर्मका आश्रय लेते हैं। इसी कारण उनके कर्मोंका फल अनित्य है और इसीलियोे उन्हें फिर मर्त्यलोकमें लौटना पड़ता है। ३. जिनका संसारके समस्त भोगोंसे प्रेम हटकर केवलमात्र भगवानमें ही अटल और अचल प्रेम हो गया है, भगवान्का वियोग जिनके लिये असहा है, जिनका भगवानूसे भिन्न दूसरा कोई भी उपास्यदेव नहीं है और जो भगवान्को ही परम आश्रय, परम गति और परम प्रेमास्पद मानते हैं--ऐसे अनन्यप्रेमी एकनिष्ठ भक्तोंका विशेषण “अनन्या:” पद है। ४. सगुण भगवान् पुरुषोत्तमके गुण, प्रभाव, तत्व और रहस्यको समझकर, चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते और एकान्तमें साधन करते, सब समय निरन्तर अविच्छिन्नरूपसे उनका चिन्तन करते हुए, उन्हींके आज्ञानुसार निष्कामभावसे उन्हींकी प्रसन्नताके लिये चेष्टा करते रहना--यही “उनका चिन्तन करते हुए भजन करना है। ५. अप्राप्तकी प्राप्तिका नाम “योग” और प्राप्तकी रक्षाका नाम “क्षेम” है। अतः भगवानकी प्राप्तिके लिये जो साधन उन्हें प्राप्त है, सब प्रकारकी विघ्न-बाधाओंसे बचाकर उसकी रक्षा करना और जिस साधनकी कमी है, उसकी पूर्ति करके स्वयं अपनी प्राप्ति करा देना--यही “उन प्रेमी भक्तोंका योगक्षेम चलाना” है। भक्त प्रह्नादका जीवन इसका सुन्दर उदाहरण है। हिरण्यकशिपुद्वारा उसके साधनमें बड़े-बड़े विघध्न उपस्थित किये जानेपर भी सब प्रकारसे भगवानने उसकी रक्षा करके अन्तमें उसे अपनी प्राप्ति करवा दी। जो पुरुष भगवान्के ही परायण होकर अनन्यचित्तसे उनका प्रेमपूर्वक निरन्तर चिन्तन करते हुए ही सब कार्य करते हैं, अन्य किसी भी विषयकी कामना, अपेक्षा और चिन्ता नहीं करते, उनके जीवननिर्वाहका सारा भार भी भगवानपर रहता है। अतः वे सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, परमसुहृद् भगवान् ही अपने भक्तका लौकिक और पारमार्थिक सब प्रकारका योगक्षेम चलाते हैं। ६. वेद-शास्त्रोंमें वर्णित देवता, उनकी उपासना और स्वर्गादिकी प्राप्तिरूप उसके फलपर जिनका आदरपूर्वक दृढ़ विश्वास हो, उनको यहाँ *श्रद्धासे युक्त” कहा गया है और इस विशेषणका प्रयोग करके यह भाव दिखलाया गया है कि जो बिना श्रद्धाके दम्भपूर्वक यज्ञादि कर्मोंद्वारा देवताओंका पूजन करते हैं, वे इस श्रेणीमें नहीं आ सकते; उनकी गणना तो आसुरी प्रकृतिके मनुष्योंमें है। ७. जिस कामनाकी सिद्धिके लिये जिस देवताकी पूजाका शास्त्रमें विधान है, उस देवताकी शास्त्रोक्त यज्ञादि कर्मोद्वारा श्रद्धापूर्वक पूजा करना “दूसरे देवताओंकी पूजा करना” है। समस्त देवता भी भगवान्के ही अंगभूत हैं, भगवान् ही सबके स्वामी हैं और वस्तुतः: भगवान् ही उनके रूपमें प्रकट हैं--इस तत्त्वको न जानकर उन देवताओंको भगवानसे भिन्न समझकर सकामभावसे जो उनकी पूजा करना है, यही भगवानकी “अविधिपूर्वक' पूजा है। ३. यह सारा विश्व भगवानका ही विराट्रूप होनेके कारण भिन्न-भिन्न यज्ञ-पूजादि कर्मोंके भोक्तारूपमें माने जानेवाले जितने भी देवता हैं, सब भगवानके ही अंग हैं तथा भगवान् ही उन सबके आत्मा हैं (गीता १०।२०)। अतः उन देवताओंके रूपमें भगवान् ही समस्त यज्ञादि कर्मोके भोक्ता हैं। भगवान् ही अपनी योगशक्तिके द्वारा सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करते हुए सबको यथायोग्य नियममें चलाते हैं; वे ही इन्द्र, वरुण, यमराज, प्रजापति आदि जितने भी लोकपाल और देवतागण हैं--उन सबके नियन्ता हैं; इसलिये वही सबके प्रभु अर्थात् महेश्वर हैं (गीता ५।२९)। २. देवताओंकी पूजा करना, उनकी पूजाके लिये बतलाये हुए नियमोंका पालन करना, उनके निमित्त यज्ञादिका अनुष्ठान करना, उनके मन्त्रका जप करना और उनके निमित्त ब्राह्मण-भोजन कराना--इत्यादि सभी बातें “देवताओंके व्रत” हैं। इनका पालन करनेवाले मनुष्योंको अपनी उपासनाके फलस्वरूप जो उन देवताओंके लोकोंकी, उनके सदृश भोगोंकी अथवा उनके-जैसे रूपकी प्राप्ति होती है, वही देवोंको प्राप्त होना है। पितरोंके लिये यथाविधि श्राद्ध-तर्पण करना, उनके निमित्त ब्राह्मणोंको भोजन कराना, हवन करना, जप करना, पाठ-पूजा करना तथा उनके लिये शास्त्रमें बतलाये हुए व्रत और नियमोंका भलीभाँति पालन करना आदि पितरोंके व्रत' हैं और जो मनुष्य सकामभावसे इन व्रतोंका पालन करते हैं, वे मरनेके बाद पितृलोकमें जाते हैं और वहाँ जाकर उन पितरोंके-जैसे स्वरूपको प्राप्त करके उनके-जैसे भोग भोगते हैं। यही पितरोंको प्राप्त होना है। ये भी अधिक-से-अधिक देवताओं या दिव्य पितरोंकी आयुपर्यन्त ही वहाँ रह सकते हैं। अन्तमें इनका भी पुनरागमन होता है। यहाँ देव और पितरोंकी पूजाका निषेध नहीं समझना चाहिये। देव-पितृ-पूजा तो यथाविधि अपने-अपने वर्णाश्रमके अधिकारानुसार सबको अवश्य ही करनी चाहिये; परंतु वह पूजा यदि सकामभावसे होती है तो अपना अधिक-से-अधिक फल देकर नष्ट हो जाती है और यदि कर्तव्यबुद्धिसे भगवत् आज्ञा मानकर या भगवत्-पूजा समझकर की जाती है तो वह भगवत्प्राप्तिरूप महान् फलमें कारण होती है। इसलिये यहाँ समझना चाहिये कि देव-पितृकर्म तो अवश्य ही करें; परंतु उनमें निष्कामभाव लानेका प्रयत्न करें। ३. जो प्रेत और भूतगणोंकी पूजा करते हैं, उनकी पूजाके नियमोंका पालन करते हैं, उनके लिये हवन या दान आदि करते हैं, ऐसे मनुष्योंका जो उन-उन भूत-प्रेतादिके समान रूप, भोग आदिको प्राप्त होना है, वही उनको प्राप्त होना है। भूत-प्रेतोंकी पूजा तामसी है तथा अनिष्ट फल देनेवाली है, इसलिये उसको नहीं करना चाहिये। ४. जो पुरुष भगवानके सगुण-निराकार अथवा साकार--किसी भी रूपका सेवन-पूजन और भजन-ध्यान आदि करते हैं, समस्त कर्म उनके अर्पण करते हैं, उनके नामका जप करते हैं, गुणानुवाद सुनते और गाते हैं तथा इसी प्रकार भगवद्धक्तिविषयक अनेक प्रकारके साधन करते हैं, वे भगवान्का पूजन करनेवाले भक्त हैं और उनका भगवानके दिव्य लोकमें जाना, भगवानके समीप रहना, उनके-जैसे ही दिव्य रूपको प्राप्त होना अथवा उनमें लीन हो जाना-यही भगवानको प्राप्त होना है। $. पत्र, पुष्प आदि कोई भी वस्तु जो प्रेमपूर्वक समर्पण की जाती है, उसे “भक्त्युपह्वत” कहते हैं। इसके प्रयोगसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि बिना प्रेमके दी हुई वस्तुको मैं स्वीकार नहीं करता और जहाँ प्रेम होता है तथा जिसको मुझे वस्तु अर्पण करनेमें और मेरे द्वारा उसके स्वीकार हो जानेमें सच्चा आनन्द होता है, वहाँ उस भक्तके द्वारा अर्पण की हुई वस्तु बहुत प्रेमसे स्वीकार कर लेता हूँ। २. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि इस प्रकार शुद्धभावसे प्रेमपूर्वक समर्पण की हुई वस्तुओंको मैं स्वयं उस भक्तके सम्मुख प्रत्यक्ष प्रकट होकर खा लेता हूँ अर्थात् जब मनुष्यादिके रूपमें अवतीर्ण होकर संसारमें विचरता हूँ, तब तो उस रूपमें वहाँ पहुँचकर और अन्य समयमें उस भक्तके इच्छानुसार रूपमें प्रकट होकर उसकी दी हुई वस्तुका भोग लगाकर उसे कृतार्थ कर देता हूँ। 3. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि किसी भी वर्ण, आश्रम और जातिका कोई भी मनुष्य पत्र, पुष्प, फल, जल आदि मेरे अर्पण कर सकता है। बल, रूप, धन, आयु, जाति, गुण और विद्या आदिके कारण मेरी किसीमें भेदबुद्धि नहीं है; अवश्य ही अर्पण करनेवालेका भाव विदुर और शबरी आदिकी भाँति सर्वथा शुद्ध और प्रेमपूर्ण होना चाहिये। ४. यहाँ पत्र, पुष्प, फल और झलका नाम लेकर यह भाव दिखलाया गया है कि जो वस्तु साधारण मनुष्योंकों बिना किसी परिश्रम, हिंसा और व्ययके अनायास मिल सकती है--ऐसी कोई भी वस्तु भगवानके अर्पण की जा सकती है। भगवान् पूर्णकाम होनेके कारण वस्तुके भूखे नहीं हैं, उनको तो केवल प्रेमकी ही आवश्यकता है। “मुझ-जैसे साधारण-से- साधारण मनुष्यद्वारा अर्पण की हुई छोटी-से-छोटी वस्तु भी भगवान् सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं, यह उनकी कैसी महत्ता है!” इस भावसे भावित होकर प्रेमविह्नललचित्तसे किसी भी वस्तुको भगवान्के समर्पण करना, उसे भक्तिपूर्वक भगवान्के अर्पण करना है। ५. जिसका अन्त:करण शुद्ध हो, उसे 'शुद्धबुद्धि' कहते हैं। इसका प्रयोग करके भगवानने यह भाव दिखलाया है कि यदि अर्पण करनेवालेका भाव शुद्ध न हो तो बाहरसे चाहे जितने शिष्टाचारके साथ, चाहे जितनी उत्तम-से-उत्तम सामग्री मुझे अर्पण की जाय, मैं उसे कभी स्वीकार नहीं करता। मैंने दुर्योधनका निमन्त्रण अस्वीकार करके भाव शुद्ध होनेके कारण विदुरके घरपर जाकर प्रेमपूर्वक भोजन किया, सुदामाके चिउरोंका बड़ी रुचिके साथ भोग लगाया, द्रौपदीकी बटलोईमें बचे हुए “पत्ते” को खाकर विश्वको तृप्त कर दिया, गजेन्द्रद्वारा अर्पण किये हुए “पुष्प” को स्वयं वहाँ पहुँचकर स्वीकार किया, शबरीकी कुटियापर जाकर उसके दिये हुए “फलों"-का भोग लगाया और रन्तिदेवके जल” को स्वीकार करके उसे कृतार्थ किया। इसी प्रकार प्रत्येक भक्तकी प्रेमपूर्वक अर्पण की हुई वस्तुको मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ। ६. इससे भगवानने सब प्रकारके कर्तव्यकर्मोंका समाहार किया है। अभिप्राय यह है कि यज्ञ, दान और तपके अतिरिक्त जीविकानिर्वाह आदिके लिये किये जानेवाले वर्ण, आश्रम और लोकव्यवहारके कर्म तथा भगवान्का भजन, ध्यान आदि जितने भी शास्त्रीय कर्म हैं, उन सबका समावेश “यत्करोषि' में, शरीर-पालनके निमित्त किये जानेवाले खान पान आदि कर्मोंका “यदश्नासि” में, पूजन और हवनसम्बन्धी समस्त कर्मोंका “यज्जुहोषि' में, सेवा और दानसम्बन्धी समस्त कर्मोंका 'यद्ददासि” में और संयम तथा तपसम्बन्धी समस्त कर्मोका समावेश “यत्तपस्यसि” में किया गया है (गीता १७|१४--१७)। ७. साधारण मनुष्यकी उन कर्मोमें ममता और आसक्ति होती है तथा वह उनमें फलकी कामना रखता है। अतएव समस्त कर्मोंमें ममता, आसक्ति और फलकी इच्छाका त्याग कर देना और यह समझना कि समस्त जगत् भगवान्का है मेरे मन, बुद्धि, शरीर तथा इन्द्रिय भी भगवानके हैं और मैं स्वयं भी भगवानका हूँ, इसलिये मेरे द्वारा जो कुछ भी यज्ञादि कर्म किये जाते हैं, वे सब भगवानके ही हैं। कठपुतलीको नचानेवाले सूत्रधारकी भाँति भगवान् ही मुझसे यह सब कुछ करवा रहे हैं। मैं तो केवल निमित्तमात्र हँ--ऐसा समझकर जो भगवान्के आज्ञानुसार भगवानकी ही प्रसन्नताके लिये निष्कामभावसे उपर्युक्त कर्मोंका करना है, यही उन कर्मोंको भगवान्के अर्पण करना है। पहले किसी दूसरे उद्देश्यसे किये हुए कर्मोंको पीछेसे भगवान्को अर्पण करना, कर्म करते-करते बीचमें ही भगवानके अर्पण कर देना, कर्म समाप्त होनेके साथ-साथ भगवान्के अर्पण कर देना अथवा कर्मोंका फल ही भगवानके अर्पण करना--इस प्रकारका अर्पण करना भी भगवानके ही अर्पण करना है। पहले इसी प्रकार होता है। ऐसा करते-करते ही उपर्युक्त प्रकारसे पूर्णतया भगवदर्पण होता है। ३. यहाँ 'संन्यासयोग” पद सांख्ययोग अर्थात् ज्ञानयोगका वाचक नहीं है, किंतु पूर्वश्लोकके अनुसार समस्त कर्मोंको भगवानके अर्पण कर देना ही यहाँ 'संन्यासयोग” है। इसलिये ऐसे संन्यासयोगसे जिसकी आत्मा युक्त हो, जिसके मन और बुद्धिमें पूर्वश्लोकके कथनानुसार समस्त कर्म भगवानके अर्पण करनेका भाव सुदृढ़ हो गया हो, उसे 'संन्यासयोगयुक्तात्मा' समझना चाहिये। २. भिन्न-भिन्न शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार स्वर्ग, नरक और पशु, पक्षी एवं मनुष्यादि लोकोंके अंदर नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेना तथा सुख-दुःखोंका भोग करना--यही शुभाशुभ फल है, इसीको कर्मबन्धन कहते हैं; क्योंकि कर्मोंका फल भोगना ही कर्मबन्धनमें पड़ना है। उपर्युक्त प्रकारसे समस्त कर्म भगवानके अर्पण कर देनेवाला मनुष्य कर्मफलरूप पुनर्जन्मसे और सुख-दु:खोंके भोगसे मुक्त हो जाता है, यही शुभाशुभ फलरूप कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाना है। मरनेके बाद भगवानके परमधाममें पहुँच जाना या इसी जन्ममें भगवान्को प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेना ही उस कर्मबन्धनसे मुक्त होकर भगवानको प्राप्त होना है। ३. इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि मैं ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे समानभावसे व्याप्त हूँ। अतएव मेरा सबमें समभाव है, किसीमें भी मेरा राग-द्वेष नहीं है। इसलिये वास्तवमें मेरा कोई भी अप्रिय या प्रिय नहीं है। ४. भगवान्के साकार या निराकार-किसी भी रूपका श्रद्धा और प्रेमपूर्वक निरन्तर चिन्तन करना; उनके नाम, गुण, प्रभाव, महिमा और लीला-चरित्रोंका श्रवण, मनन और कीर्तन करना; उनको नमस्कार करना, पत्र, पुष्प आदि यशथेष्ट सामग्रियोंके द्वारा उनकी प्रेमपूर्वक पूजा करना और अपने समस्त कर्म उनके समर्पण करना आदि सभी क्रियाओंका नाम भक्तिपूर्वक भगवान्को भजना है। जो पुरुष इस प्रकार भगवान्को भजते हैं, भगवान् भी उनको वैसे ही भजते हैं। वे जैसे भगवान्को नहीं भूलते, वैसे ही भगवान् भी उनको नहीं भूल सकते--यही भाव दिखलानेके लिये भगवान्ने उनको अपनेमें बतलाया है और उन भक्तोंका विशुद्ध अन्तःकरण भगवत्प्रेमसे परिपूर्ण हो जाता है, इससे उनके हृदयमें भगवान् सदा-सर्वदा प्रत्यक्ष दीखने लगते हैं--यही भाव दिखलानेके लिये भगवानने अपनेको उनमें बतलाया है। जैसे समभावसे सब जगह प्रकाश देनेवाला सूर्य दर्पण आदि स्वच्छ पदार्थोंमें प्रतिबिम्बित होता है, काष्ठादिमें नहीं होता, तथापि उसमें विषमता नहीं है, वैसे ही भगवान् भी भक्तोंको मिलते हैं, दूसरोंको नहीं मिलते--इसमें उनकी विषमता नहीं है, यह तो भक्तिकी ही महिमा है। १. 'अपि' देनेका अभिप्राय यह है कि सदाचारी और साधारण पापियोंका मेरा भजन करनेसे उद्धार हो जाय--इसमें तो कहना ही क्या है, भजनसे अतिशय दुराचारीका भी उद्धार हो सकता है। २. 'चेत्” अव्यय “यदि” के अर्थमें है। इसका प्रयोग करके भगवानने यह भाव दिखलाया है कि प्राय: दुराचारी मनुष्योंकी विषयोंमें और पापोंमें आसक्ति रहनेके कारण वे मुझमें प्रेम करके मेरा भजन नहीं करते, तथापि किसी पूर्व शुभ संस्कारकी जागृति, भगवद्धावमय वातावरण, शास्त्रके अध्ययन और महात्मा पुरुषोंके सत्संगसे एवं मेरे गुण, प्रभाव, महत्त्व और रहस्यका श्रवण करनेसे यदि कदाचित् दुराचारी मनुष्यकी मुझमें श्रद्धा-भक्ति हो जाय और वह मेरा भजन करने लगे तो उसका भी उद्धार हो जाता है। 3. जिनके आचरण अत्यन्त दूषित हों, खान-पान और चाल-चलन भ्रष्ट हों, अपने स्वभाव, आसक्ति और बुरी आदतसे विवश होनेके कारण जो दुराचारोंका त्याग न कर सकते हों, ऐसे मनुष्योंको अतिशय दुराचारी समझना चाहिये। ऐसे मनुष्योंका जो भगवान्के गुण, प्रभाव आदिके सुनने और पढ़नेसे या अन्य किसी कारणसे भगवान्को सर्वोतम समझ लेना और एकमात्र भगवान्का ही आश्रय लेकर अतिशय श्रद्धा-प्रेमपूर्वक उनन््हींको अपना इष्टदेव मान लेना है--यही उनका “अनन्यभाक्' होना है। इस प्रकार भगवान्का भक्त बनकर जो उनके स्वरूपका चिन्तन करना, नाम, गुण, महिमा और प्रभावका श्रवण, मनन और कीर्तन करना, उनको नमस्कार करना, पत्र-पुष्प आदि यशथेष्ट वस्तु उनके अर्पण करके उनका पूजन करना तथा अपने किये हुए शुभ कर्मोंको भगवानके समर्पण करना है--यही अनन्यभाक् होकर भगवान्का भजन करना है। ४. जिसने यह दृढ़ निश्चय कर लिया है कि “भगवान् पतितपावन, सबके सुहृद, सर्वशक्तिमान, परम दयालु, सर्वज्ञ, सबके स्वामी और सर्वोतम हैं एवं उनका भजन करना ही मनुष्य-जीवनका परम कर्तव्य है; इससे समस्त पापों और पाप- वासनाओंका समूल नाश होकर भगवत्कृपासे मुझको अपने-आप ही भगवत्प्राप्ति हो जायगी।“--यह बहुत ही उत्तम और यथार्थ निश्चय है। भगवान् कहते हैं कि जिसका ऐसा निश्चय है, वह मेरा भक्त है और मेरी भक्तिके प्रतापसे वह शीघ्र ही पूर्ण धर्मात्मा हो जायगा। अतएव उसे पापी या दुष्ट न मानकर साधु ही मानना उचित है। ५. इसी जन्ममें बहुत ही शीघ्र सब प्रकारके दुर्गुण और दुराचारोंसे रहित होकर गीताके सोलहवें अध्यायके पहले, दूसरे और तीसरे श्लोकोंमें वर्णित दैवी सम्पदासे युक्त हो जाना अर्थात् भगवान्की प्राप्तिका पात्र बन जाना ही शीघ्र धर्मात्मा बन जाना है और जो सदा रहनेवाली शान्ति है, जिसकी एक बार प्राप्ति हो जानेपर फिर कभी अभाव नहीं होता, जिसे नैष्ठिकी शान्ति (गीता ५१२), निर्वाणपरमा शान्ति (गीता ६१५) और परमा शान्ति (गीता १८।६२) कहते हैं, परमेश्वरकी प्राप्तिरूप उस शान्तिको प्राप्त हो जाना ही “सदा रहनेवाली परम शान्ति' को प्राप्त होना है। ६. इसके प्रयोगसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि “अर्जुन! मैंने जो तुम्हें अपनी भक्तिका और भक्तका यह महत्त्व बतलाया है, उसमें तुम्हें किंचिन्मात्र भी संशय न रखकर उसे सर्वथा सत्य समझना और दृढ़तापूर्वक धारण कर लेना चाहिये।' ७. यहाँ भगवानके कहनेका यह अभिप्राय है कि मेरे भक्तका क्रमशः उत्थान ही होता रहता है, पतन नहीं होता। अर्थात् वह न तो अपनी स्थितिसे कभी गिरता है और न उसको नीच योनि या नरकादिकी प्राप्तिरूप दुर्गतिकी प्राप्ति होती है; वह पूर्व कथनके अनुसार क्रमश: दुर्गुण-दुराचारोंसे सर्वधा रहित होकर शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है। ३. यहाँ “अपि' का दो बार प्रयोग करके भगवानने ऊँची-नीची जातिके कारण होनेवाली विषमताका अपनेमें सर्वथा अभाव दिखलाया है। भगवानके कथनका यहाँ यह अभिप्राय प्रतीत होता है कि ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी अपेक्षा हीन समझे जानेवाले स्त्री, वैश्य और शूद्र एवं उनसे भी हीन समझे जानेवाले चाण्डाल आदि कोई भी हों, मेरी उनमें भेदबुद्धि नहीं है। मेरी शरण होकर जो कोई भी मुझको भजते हैं, उन््हींको परम गति मिल जाती है। २. पूर्वजन्मोंके पापोंके कारण चाण्डालादि योनियोंमें उत्पन्न प्राणियोंको “पापयोनि” माना गया है। इनके सिवा शास्त्रोंके अनुसार हूण, भील, खस, यवन आदि म्लेच्छ-जातिके मनुष्य भी “पापयोनि' ही माने जाते हैं। यहाँ 'पापयोनि' शब्द इन्हीं सबका वाचक है। भगवान्की भक्तिके लिये किसी जाति या वर्णके लिये कोई रुकावट नहीं है। वहाँ तो शुद्ध प्रेमकी आवश्यकता है। श्रीमद्भागवतमें भी कहा है-- भव्त्याहमेकया ग्राह: श्रद्धया55त्मा प्रियः सताम् । भक्ति: पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात् ॥। (११
arjuna uvāca
Arjuna sprach: (In diesem Abschnitt rahmt Arjunas Stimme eine Lehre, die die Zuflucht im Göttlichen als sicheren Grund von Furchtlosigkeit und moralischer Standhaftigkeit hervorhebt. Die umgebende Auslegung erklärt, dass derjenige, der aufrichtig Schutz sucht, Sicherheit empfängt, und dass der Herr die unvergängliche Quelle und Stütze aller Wesen ist—daher die Bezeichnungen „unverwelklicher Same“ und „Schatzhaus“, in dem die Welt bei der Auflösung ruht. Der ethische Kern lautet: Hingabe und Ergebung, nicht bloß Ritual oder Status, führen zu dauerhaftem Frieden und Befreiung.)
अजुन उवाच
Sincere surrender—taking refuge in the Lord and seeking fearlessness—brings divine protection; the Lord is also presented as the imperishable causal source (‘avyaya-bīja’) and ultimate support of all beings, making devotion ethically transformative and spiritually decisive.
Within Bhīṣma Parva’s battlefield setting, Arjuna’s speech-marker introduces a section where the discourse (with explanatory gloss) highlights the Lord’s role as refuge and the metaphysical ground of the cosmos, contrasting lasting spiritual attainment with temporary ritual-based heavenly results.