धर्मकामा: स्थिता धर्मे सुकृतैर्धर्मसेतव: । यान् समाश्रित्य जीवन्ति प्रजा: सर्वाश्चितुर्विधा: ७ ।। वे धर्मकी ही इच्छा रखनेवाले, पुण्यकर्मोद्वारा धर्ममें ही स्थित रहनेवाले और धर्मके सेतु हैं। उन्हींका आश्रय लेकर चारों प्रकारकी सारी प्रजा जीवन धारण करती है
Sie begehren allein Dharma, stehen durch verdienstvolle Taten fest im Dharma und sind die Brücke des Dharma. Auf sie gestützt lebt das gesamte Volk der vier Stände.
भीष्म उवाच