अड-#-#क+ एकोनपज्चाशर्दाधिकशततमो< ध्याय: श्रीविष्णुसहसत्रनामस्तोत्रम् (यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् । विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ।। जिनके स्मरण करनेमात्रसे मनुष्य जन्म-मृत्यु-रूप संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है, सबकी उत्पत्तिके कारणभूत उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।। नम: समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते । अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ।।) सम्पूर्ण प्राणियोंक आदिभूत, पृथ्वीकों धारण करनेवाले, अनेक रूपधारी और सर्वसमर्थ भगवान् विष्णुको प्रणाम है ।। वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वश: । युधिष्ठटिर: शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने सम्पूर्ण विधिरूप धर्म तथा पापोंका क्षय करनेवाले धर्म-रहस्योंको सब प्रकार सुनकर शान्तनुपुत्र भीष्मसे फिर पूछा
vaiśampāyana uvāca: śrutvā dharmān aśeṣeṇa pāvanāni ca sarvaśaḥ | yudhiṣṭhiraḥ śāntanavaṃ punar evābhyabhāṣata ||
Vaiśampāyana sprach: Nachdem König Yudhiṣṭhira, der Sohn des Dharma, die Lehren über das Dharma vollständig vernommen hatte—zusammen mit den reinigenden Grundsätzen, die Sünde auf jede Weise tilgen—wandte er sich erneut an Bhīṣma, den Sohn Śāntanus.
वैशम्पायन उवाच