अध्याय ७४: अक्रोध–क्षमा–निवासनीति
Chapter 74: Non-anger, Forbearance, and the Ethics of Residence
(शृणु भद्रे मम सुते मम वाक््यं शुचिस्मिते । पतिव्रतानां नारीणां विशिष्टमिति चोच्यते ।। “मेरी कल्याणमयी पुत्री! मेरा यह वचन सुनो। पवित्र मुसकानवाली शकुन्तले! पतिव्रता स्त्रियोंके लिये यह विशेष ध्यान देनेयोग्य बात है; इसलिये बता रहा हूँ। पतिशुश्रूषणं पूर्व मनोवाक्कायचेष्टितै: । अनुज्ञाता मया पूर्व पूजयैतद् व्रतं तव ।। एतेनैव च वृत्तेन विशिष्टां लप्स्यसे श्रियम् । 'सती स्त्रियोंके लिये सर्वप्रथम कर्तव्य यह है कि वे मन, वाणी, शरीर और चेष्टाओंद्वारा निरन्तर पतिकी सेवा करती रहें। मैंने पहले भी तुम्हें इसके लिये आदेश दिया है। तुम अपने इस व्रतका पालन करो। इस पतिव्रतोचित आचार-व्यवहारसे ही विशिष्ट शोभा प्राप्त कर सकोगी। तस्माद् भद्रे प्रयातव्यं समीपं पौरवस्थ ह ।। स्वयं नायाति मत्वा ते गतं काल॑ शुचिस्मिते । गत्वा55राधय राजान दुष्यन्तं हितकाम्यया ।। “भद्रे! तुम्हें पूरनन्दन दुष्यन्तके पास जाना चाहिये। वे स्वयं नहीं आ रहे हैं, ऐसा सोचकर तुमने बहुत-सा समय उनकी सेवासे दूर रहकर बिता दिया। शुचिस्मिते! अब तुम अपने हितकी इच्छासे स्वयं जाकर राजा दुष्यन्तकी आराधना करो। दौष्यन्तिं यौवराज्यस्थं दृष्टवा प्रीतिमवाप्स्यसि । देवतानां गुरूणां च क्षत्रियाणां च भामिनि । भर्तृणां च विशेषेण हितं संगमनं सताम् ।। तस्मात् पुत्रि कुमारेण गन्तव्यं मत्प्रियेप्सया । प्रतिवाक्यं न दद्यास्त्वं शापिता मम पादयो: ।। “वहाँ दुष्यन्तकुमार सर्वदमनको युवराज-पदपर प्रतिष्ठित देख तुम्हें बड़ी प्रसन्नता होगी। देवता, गुरु, क्षत्रिय, स्वामी तथा साधु पुरुष--इनका संग विशेष हितकर है। अतः बेटी! तुम्हें मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे कुमारके साथ अवश्य अपने पतिके यहाँ जाना चाहिये। मैं अपने चरणोंकी शपथ दिलाकर कहता हूँ कि तुम मुझे मेरी इस आज्ञाके विपरीत कोई उत्तर न देना'। वैशम्पायन उवाच एवमुकक््त्वा सुतां तत्र पौत्रं कण्वो5भ्यभाषत । परिष्वज्य च बाहुभ्यां मूर्ध््युपाप्राय पौरवम् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--पुत्रीसे ऐसा कहकर महर्षि कण्वने उसके पुत्र भरतको दोनों बाँहोंसे पकड़कर अंकमें भर लिया और उसका मस्तक सूँघकर कहा। कण्व उवाच सोमवंशोद्धवो राजा दुष्यन्तो नाम विश्लुत: । तस्याग्रमहिषी चैषा तव माता शुचिव्रता ।। गन्तुकामा भर्त्वशं त्वया सह सुमध्यमा । गत्वाभिवाद्य राजानं यौवराज्यमवाप्स्यसि ।। स पिता तव राजेन्द्रस्तस्थ त्वं वशगो भव । पितृपैतामहं राज्यमनुतिष्ठस्व भावत: ।। कण्व बोले--वत्स! चन्द्रवंशमें दुष्यन्त नामसे प्रसिद्ध एक राजा हैं। पवित्र व्रतका पालन करनेवाली यह तुम्हारी माता उन्हींकी महारानी है। यह सुन्दरी तुम्हें साथ लेकर अब पतिकी सेवामें जाना चाहती है। तुम वहाँ जाकर राजाको प्रणाम करके युवराज-पद प्राप्त करोगे। वे महाराज दुष्यन्त ही तुम्हारे पिता हैं। तुम सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहना और बाप-दादेके राज्यका प्रेमपूर्वक पालन करना। शकुन्तले शृणुष्वेदं हितं पथ्यं च भामिनि । पतिव्रताभावगुणान् हित्वा साध्यं न किउ्चन ।। पतिव्रतानां देवा वै तुष्टा: सर्ववरप्रदा: । प्रसाद॑ च करिष्यन्ति ह्वापदर्थे च भामिनि ।। पतिप्रसादात् पुण्यगतिं प्राप्रुवन्ति न चाशुभम् । तस्माद् गत्वा तु राजानमाराधय शुचिस्मिते ।।) (फिर कण्व शकुन्तलासे बोले--) 'भामिनि! शकुन्तले! यह मेरी हितकर एवं लाभप्रद बात सुनो। पतिव्रताभाव-सम्बन्धी गुणोंको छोड़कर तुम्हारे लिये और कोई वस्तु साध्य नहीं है। पतिव्रताओंपर सम्पूर्ण वरोंको देनेवाले देवतालोग भी संतुष्ट रहते हैं। भामिनि! वे आपफत्तिके निवारणके लिये अपने कृपा-प्रसादका भी परिचय देंगे। शुचिस्मिते! पतिव्रता देवियाँ पतिके प्रसादसे पुण्यगतिको ही प्राप्त होती हैं; अशुभ गतिको नहीं। अतः तुम जाकर राजाकी आराधना करो!। तस्य तद् बलमाज्ञाय कण्वः शिष्यानुवाच ह,फिर उस बालकके बलको समझकर कण्वने अपने शिष्योंसे कहा--“तुमलोग समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्मानित मेरी पुत्री शकुन्तला और इसके पुत्रको शीघ्र ही इस घरसे ले जाकर पतिके घरमें पहुँचा दो
śṛṇu bhadre mama sute mama vākyaṃ śucismite | pativratānāṃ nārīṇāṃ viśiṣṭam iti cocyate ||
Kaṇva said: “Listen, dear daughter—my auspicious child, O you of pure, gentle smile—to my words. What I am about to tell you is regarded as a special and weighty principle for women devoted to their husbands (pativratā).”
कण्व उवाच
Kaṇva frames his counsel as a ‘special principle’ for pativratā women: attentive adherence to marital duty and conduct guided by dharma, presented here as an ethically significant instruction rather than casual advice.
In the Śakuntalā–Duṣyanta episode, Kaṇva addresses Śakuntalā tenderly and prepares her to receive guidance; this verse serves as the preface, signaling that what follows is an important norm of conduct for a wife devoted to her husband.