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Shloka 19

कुन्ती-युधिष्ठिरसंवादः

Kuntī–Yudhiṣṭhira Dialogue on Bhīma’s Mission

(ततः प्रव्यथितो भीष्म: पाण्डुराजसुतान्‌ मृतान्‌ । सह मात्रेति तच्छुत्वा विललाप रुरोद च ।। भीष्म उवाच न हि तौ नोत्सहेयातां भीमसेनधनंजयौ । तरसा वेगितात्मानौ निर्भेत्तुमपि मन्दिरम्‌ । परासुत्वं न पश्यामि पृथाया: सह पाण्डवै: ।। सर्वथा विकृतं नीत॑ यदि ते निधनं गता: । धर्मराज: स निर्दिष्टो ननु विप्रैर्युधिष्ठिर: ।। सत्यव्रतो धर्मदत्त: सत्यवाक्छुभलक्षण: । कथं कालवशं प्राप्त: पाण्डवेयो युधिष्ठिर: ।। आत्मानमुपमां कृत्वा परेषां वर्तते तु यः । सह मात्रा तु कौरव्य: कथं कालवशं गतः ।। यौवराज्ये5भिषिक्तेन पितुर्येनाहतं यश: । आत्मनश्न पितुश्चिव सत्यधर्मस्य वृत्तिभि: ।। कालेन स हि सम्भग्नो धिक्‌ कृतान्तमनर्थकम्‌ ।। यच्च सा वनवासेन क्लेशिता दुःखभागिनी । पुत्रगृध्नुतया कुन्ती न भर्तारें मृता त्वनु ।। अल्पकालं कुले जाता भर्तुः प्रीतिमवाप या । दग्धाद्य सह पुत्रै: सा असम्पूर्णममनोरथा ।। पीनस्कन्धश्चारुबाहुर्मेरुकूटसमो युवा । मृतो भीम इति श्रुत्वा मनो न श्रद्दधाति मे ।। अनिन्‍न्द्यानि च यो गच्छन्‌ क्षिप्रहस्तो दृढायुध: । प्रपत्तिमाँललब्धलक्ष्यो रथयानविशारद: ।। दूरपाती त्वसम्भ्रान्तो महावीर्यों महास्त्रवित्‌ । अदीनात्मा नरव्याप्र: श्रेष्ठ: सर्वधनुष्मताम्‌ ।। येन प्राच्या: ससौवीरा दाक्षिणात्याश्र निर्जिता: । ख्यापितं येन शूरेण त्रिषु लोकेषु पौरुषम्‌ ।। यस्मिज्जाते विशोकाभूत्‌ कुन्ती पाण्डुश्व वीर्यवान्‌ पुरन्दरसमो जिष्णु: कथं कालवशं गत: ।। कथं तावृषभस्कन्धौ सिंहविक्रान्तगामिनौ । मर्त्यधर्ममनुप्राप्ती यमावरिनिबर्हणौ ।। तदनन्तर भीष्मजी यह सुनकर कि राजा पाण्डुके पुत्र अपनी माताके साथ जल मरे हैं, अत्यन्त व्यथित हो उठे और रोने एवं विलाप करने लगे। भीष्मजी बोले--वे दोनों भाई भीमसेन और अर्जुन उत्साह-शून्य हो गये हों, ऐसा तो नहीं प्रतीत होता। यदि वे वेगसे अपने शरीरका धक्का देते तो सुदृढ़ मकानको भी तोड़- फोड़ सकते थे। अतः पाण्डवोंके साथ कुन्तीकी मृत्यु हो गयी है, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता। यदि सचमुच उन सबकी मृत्यु हो चुकी है, तब तो यह सभी प्रकारसे बहुत बुरी बात हुई है। ब्राह्मणोंने तो धर्मराज युधिष्ठिरके विषयमें यह कहा था कि ये धर्मके दिये हुए राजकुमार सत्यव्रती, सत्यवादी एवं शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न होंगे। ऐसे वे पाण्डुनन्दन युधिष्छिर कालके अधीन कैसे हो गये? जो अपने-आपको आदर्श बनाकर तदनुरूप दूसरोंके साथ बर्ताव करते थे वे ही कुरुकुलशिरोमणि युधिष्ठिर अपनी माताके साथ कालके अधीन कैसे हो गये? जिन्होंने युवराजपदपर अभिषिक्त होते ही पिताके समान ही अपने सत्य एवं धर्मपूर्ण बर्तावके द्वारा अपना ही नहीं, राजा पाण्डुके भी यशका विस्तार किया था, वे युधिष्ठिर भी कालके अधीन हो गये। ऐसे निकम्मे कालको धिक्‍्कार है। उत्तम कुलमें उत्पन्न कुन्ती, जो पुत्रोंकी अभिलाषा रखनेके कारण ही वनवासका कष्ट भोगती और दुःखपर दुःख उठाती रही तथा पतिके मरनेपर भी उनका अनुगमन न कर सकी, जिसे बहुत थोड़े समयतक ही पतिका प्रेम प्राप्त हुआ था, वही कुन्तिभोजकुमारी अभी अपने मनोरथ पूरे भी न कर पायी थी कि पुत्रोंके साथ दग्ध हो गयी! जिनके भरे हुए कंधे और मनोहर भुजाएँ थीं, जो मेर-शिखरके समान सुन्दर एवं तरुण थे, वे भीमसेन मर गये, यह सुनकर भी मनको विश्वास नहीं होता। जो सदा उत्तम मार्गोंपर चलते थे, जिनके हाथोंमें बड़ी फुर्ती थी, जिनके आयुध अत्यन्त दृढ़ थे, जो गुरुजनोंके आश्रित रहते थे, जिनका निशाना कभी चूकता नहीं था, जो रथ हाँकनेमें कुशल, दूरतकका लक्ष्य बेधनेवाले, कभी व्याकुल न होनेवाले, महापराक्रमी और महान्‌ अस्त्रोंके ज्ञाता थे, जिनके हृदयमें कभी दीनता नहीं आती थी, जो मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी तथा सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ थे, जिन्होंने प्राच्य, सौवीर और दाक्षिणात्य नरेशोंको परास्त किया था, जिस शूरवीरने तीनों लोकोंमें अपने पुरुषार्थको प्रसिद्ध किया था और जिनके जन्म लेनेपर कुन्ती और महापराक्रमी पाण्डु भी शोकरहित हो गये थे, वे इन्द्रके समान विजयी वीर अर्जुन भी कालके अधीन कैसे हो गये? जो बैलके-से हृष्ट-पुष्ट कंधोंसे सुशोभित थे तथा सिंहकी-सी मस्तानी चालसे चलते थे, वे शत्रुओंका संहार करनेवाले नकुल-सहदेव सहसा मृत्युको कैसे प्राप्त हो गये? वैशम्पायन उवाच तस्य विक्रन्दितं श्रुत्वा उदकं॑ च प्रसिज्चत: । देशकालं समाज्ञाय विदुर: प्रत्यभाषत ।। मा शोचीस्त्वं नरव्यापत्र जहि शोकं महाव्रत । न तेषां विद्यते पापं प्राप्तकालं कृतं मया । एतच्च तेभ्य उदकं विप्रसिज्च न भारत ।। सो<ब्रवीत्‌ किंचिदुत्सार्य कौरवाणामशृण्वताम्‌ | क्षत्तारमुपसंगृहा बाष्पोत्पीडकलस्वर: ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जलांजलि-दान देते समय भीष्मजीका यह विलाप सुनकर विदुरजीने देश और कालका भलीभाँति विचार करके कहा--“नरश्रेष्ठ] आप दु:खी न हों। महाव्रती वीर! आप शोक त्याग दें, पाण्डवोंकी मृत्यु नहीं हुई है। मैंने उस अवसरपर जो उचित था, वह कार्य कर दिया है। भारत! आप उन पाण्डवोंके लिये जलांजलि न दें।” तब भीष्मजी विदुरका हाथ पकड़कर उन्हें कुछ दूर हटा ले गये, जहाँसे कौरवलोग उनकी बात न सुन सकें। फिर वे आँसू बहाते हुए गद्गद वाणीमें बोले। भीष्म उवाच कथं ते तात जीवन्ति पाण्डो: पुत्रा महारथा: । कथमस्मत्कृते पक्ष: पाण्डोर्न हि निपातितः ।। कथं मत्प्रमुखा: सर्वे प्रमुक्ता महतो भयात्‌ | जननी गरुडेनेव कुमारास्ते समुद्धृता: ।। भीष्मजीने कहा--तात! पाण्डुके वे महारथी पुत्र कैसे जीवित बच गये? पाण्डुका पक्ष किस तरह हमारे लिये नष्ट होनेसे बच गया? जैसे गरुड़ने अपनी माताकी रक्षा की थी, उसी प्रकार तुमने किस तरह पाण्डुकुमारोंको बचाकर हम सब लोगोंकी महान्‌ भयसे रक्षा की है? वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु कौरव्य कौरवाणामशृण्वताम्‌ । आचचक्षे स धर्मात्मा भीष्मायाद्भुतकर्मणे ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार पूछे जानेपर धर्मात्मा विदुरने कौरवोंके न सुनते हुए अद्भुत कर्म करनेवाले भीष्मजीसे इस प्रकार कहा-- विदुर उवाच धृतराष्ट्रस्य शकुने राज्ञो दुर्योधनस्य च । विनाशे पाण्डुपुत्राणां कृतो मतिविनिश्चय: ।। ततो जतुगृहं गत्वा दहने5स्मिन्‌ नियोजिते । पृथायाश्न सपुत्राया धार्तराष्ट्स्य शासनात्‌ ।। ततः खनकमाहूय सुरझ्भां वै बिले तदा । सगुहां कारयित्वा ते कुन्त्या पाण्डुसुतास्तदा ।। निष्क्रामिता मया पूर्व मा सम शोके मन: कृथा: । निर्गता: पाण्डवा राजन्‌ मात्रा सह परंतपा: ।। अग्निदाहान्महाघोरान्मया तस्मादुपायत: । मा सम शोकमिमं कार्षीर्जीवन्त्येव च पाण्डवा: ।। प्रच्छन्ना विचरिष्यन्ति यावत्‌ कालस्य पर्यय: ।। तस्मिन्‌ युधिष्ठिरं काले दक्ष्यन्ति भुवि भूमिपा: ।) विदुर बोले--धूृतराष्ट्र शकुनि तथा राजा दुर्योधनका यह पक्का विचार हो गया था कि पाण्डवोंको नष्ट कर दिया जाय। तदनन्तर लाक्षागृहमें जानेपर जब दुर्योधनकी आज्ञासे पुत्रोंसहित कुन्तीको जला देनेकी योजना बन गयी, तब मैंने एक भूमि खोदनेवालेको बुलाकर भूगर्भमें गुफासहित सुरंग खुदवायी और कुन्तीसहित पाण्डवोंको घरमें आग लगनेसे पहले ही निकाल लिया, अतः आप अपने मनमें शोकको स्थान न दीजिये। राजन! शत्रुओंको संताप देनेवाले पाण्डव अपनी माताके साथ उस महाभयंकर अग्निदाहसे दूर निकल गये हैं। मेरे पूर्वोक्त उपायसे ही यह कार्य सम्भव हो सका है। पाण्डव निश्चय ही जीवित हैं, अतः आप उनके लिये शोक न कीजिये। जबतक यह समय बदलकर अनुकूल नहीं हो जाता, तबतक वे पाण्डव छिपे रहकर इस भूतलपर विचरेंगे। अनुकूल समय आनेपर सब राजा इस पृथ्वीपर युधिष्ठिरको देखेंगे। पाण्डवाश्वापि निर्गत्य नगराद्‌ वारणावतात्‌ | नदीं गड्जभामनुप्राप्ता मातृषष्ठा महाबला:,(इधर) महाबली पाण्डव भी वारणावत नगरसे निकलकर माताके साथ गंगा नदीके तटपर पहुँचे

vidura uvāca |

dhṛtarāṣṭrasya śakune rājño duryodhanasya ca |

vināśe pāṇḍuputrāṇāṁ kṛto mativiniścayaḥ ||

tato jatugṛhaṁ gatvā dahane 'smin niyojite |

pṛthāyāś ca saputrāyā dhārtarāṣṭrasya śāsanāt ||

tataḥ khanakam āhūya suraṅgāṁ vai bile tadā |

saguhāṁ kārayitvā te kunyā pāṇḍusutās tadā ||

niṣkrāmitā mayā pūrvaṁ mā sma śoke manaḥ kṛthāḥ |

nirgatāḥ pāṇḍavā rājan mātrā saha paraṁtapāḥ ||

agnidāhān mahāghorān mayā tasmād upāyataḥ |

mā sma śokam imaṁ kārṣīr jīvanty eva ca pāṇḍavāḥ ||

pracchannā vicarīṣyanti yāvat kālasya paryayaḥ |

tasmin yudhiṣṭhiraṁ kāle drakṣyanti bhuvi bhūmipāḥ ||

Vidura said: “Dhṛtarāṣṭra, Śakuni, and King Duryodhana reached a firm resolve to destroy the sons of Pāṇḍu. Then, when the lac-house was prepared and the plan was set in motion to burn Pṛthā (Kuntī) together with her sons—by order of the Dhārtarāṣṭra— I summoned a digger and had a tunnel made underground, with a concealed chamber. By that means I brought Kuntī and the Pāṇḍava princes out beforehand. Therefore, do not give your mind over to grief, O King. The Pāṇḍavas, tormenters of foes, have escaped with their mother from that most dreadful fire, through the stratagem I employed. Do not indulge this sorrow: the Pāṇḍavas are indeed alive. They will move about in concealment until the turn of time changes; and when that time arrives, the kings of the earth will behold Yudhiṣṭhira upon this world.”

ततःthen, thereafter
ततः:
Adhikarana
TypeIndeclinable
Rootततः
प्रव्यथितःdeeply distressed
प्रव्यथितः:
Karta
TypeAdjective
Rootप्र-व्यथित
FormMasculine, Nominative, Singular
भीष्मःBhishma
भीष्मः:
Karta
TypeNoun
Rootभीष्म
FormMasculine, Nominative, Singular
पाण्डुराजसुतान्sons of King Pandu
पाण्डुराजसुतान्:
Karma
TypeNoun
Rootपाण्डुराज-सुत
FormMasculine, Accusative, Plural
मृतान्dead
मृतान्:
Karma
TypeAdjective
Rootमृत
FormMasculine, Accusative, Plural
सहtogether with
सह:
Karana
TypeIndeclinable
Rootसह
मात्राwith (their) mother
मात्रा:
Karana
TypeNoun
Rootमातृ
FormFeminine, Instrumental, Singular
इतिthus (quotative)
इति:
TypeIndeclinable
Rootइति
तत्that (news/statement)
तत्:
Karma
TypePronoun
Rootतद्
FormNeuter, Accusative, Singular
श्रुत्वाhaving heard
श्रुत्वा:
TypeVerb
Rootश्रु
FormAbsolutive (Gerund)
विललापlamented
विललाप:
TypeVerb
Rootवि-लप्
FormPerfect, 3, Singular
रुरोदwept
रुरोद:
TypeVerb
Rootरुद्
FormPerfect, 3, Singular
and
:
TypeIndeclinable
Root

विदुर उवाच

V
Vidura
D
Dhṛtarāṣṭra
Ś
Śakuni
D
Duryodhana
P
Pāṇḍu
P
Pāṇḍuputrāḥ / Pāṇḍavāḥ
P
Pṛthā (Kuntī)
J
Jatugṛha (lac-house)
S
Suraṅgā (tunnel)
G
Guhā (hidden chamber)
A
Agni / Dahana (fire)
Y
Yudhiṣṭhira
B
Bhūmipāḥ (kings of the earth)

Educational Q&A

Even amid corrupt power and lethal conspiracy, dharmic intelligence (upāya guided by conscience) can protect the vulnerable. Vidura models ethical statecraft: he does not meet deceit with cruelty, but with prudent rescue, patience, and trust in the ‘turn of time’ (kālasya paryayaḥ) until justice can re-emerge.

Vidura confidentially informs Bhīṣma that the Pāṇḍavas and Kuntī did not die in the lac-house fire. He explains that Duryodhana, Śakuni, and Dhṛtarāṣṭra had decided on their destruction, but Vidura arranged an underground tunnel with a hidden chamber and evacuated them before the arson. The Pāṇḍavas will remain concealed until circumstances become favorable, when Yudhiṣṭhira will reappear before the kings.