ददर्श मलदिग्धाड़ं जटिलं चीरवाससम् । एकलव्यं धनुष्याणिमस्यन्तमनिशं शरान्,वहाँ पहुँचकर उन्होंने एकलव्यको देखा, जो हाथमें धनुष ले निरन्तर बाणोंकी वर्षा कर रहा था। उसके शरीरपर मैल जम गया था। उसने सिरपर जटा धारण कर रखी थी और वस्त्रके स्थानपर चिथड़े लपेट रखे थे
Dort erblickten sie Ekalavya: vom Schmutz überzogen, mit verfilzten Jata-Haaren, in Lumpen statt in Gewändern. Den Bogen in der Hand ließ er unablässig Pfeile fliegen.
वैशम्पायन उवाच