Vishwarupa Darshana Yoga
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन ...
sakheti matvā prasabhaṃ yad uktaṃ he kṛṣṇa he yādava he sakheti |
ajānātā mahimānaṃ tavedaṃ mayā pramādāt praṇayena ...
Dich für einen Freund haltend, habe ich ungestüm gesprochen: „O Krishna“, „o Yādava“, „o Freund“. Da ich diese deine (kosmische) Größe nicht kannte, habe ich es aus Unachtsamkeit oder aus Vertrautheit (unbedacht) gesagt …
आपको अपना सखा समझकर मैंने जो कुछ भी हठपूर्वक कह दिया— ‘हे कृष्ण’, ‘हे यादव’, ‘हे सखे’— आपके इस (विराट्) महात्म्य को न जानने के कारण, प्रमादवश अथवा प्रेमवश (अविवेकपूर्वक) (कहा गया) …
Thinking of you as a friend, whatever I said impulsively— ‘O Kṛṣṇa’, ‘O Yādava’, ‘O friend’— not knowing this greatness of yours, through heedlessness or through affection …
यह श्लोक प्रायः अगले श्लोक (11.42) के साथ एक ही वाक्य-रचना में पूरा होता है; यहाँ पाठ ‘…’ के कारण वाक्य अपूर्ण है। अधिकांश परंपरागत अनुवाद ‘प्रसभम्’ को ‘उतावलेपन/अविवेक’ और ‘प्रमादात्/प्रणयेन’ को ‘असावधानी/स्नेह’ के द्वंद्व के रूप में लेते हैं; अकादमिक अनुवाद शब्दार्थ को अधिक निकट रखता है।
यह श्लोक विस्मयजनित आत्म-परावर्तन को दर्शाता है: अत्यंत निकट संबंध (सख्य) के कारण होने वाली सहजता अब विराट् अनुभव के बाद ‘अति-परिचय’ के रूप में दिखाई देती है। अर्जुन अपनी भाषा को ‘प्रसभम्’ (आवेग/अविवेक) कहकर संज्ञानात्मक पुनर्मूल्यांकन करता है और संभावित सीमा-लंघन के लिए उत्तरदायित्व स्वीकार करता है।
अर्जुन का कथन ईश्वर के द्वि-आयामी अनुभव की ओर संकेत करता है— सगुण सान्निध्य (मित्र के रूप में निकटता) और परम ऐश्वर्य/महिमा (विश्व-रूप) के रूप में अतीन्द्रियता। ‘महिमानं तव’ का बोध यह दिखाता है कि परम सत्ता का पूर्ण स्वरूप साधारण सामाजिक श्रेणियों (मित्र, कुल-नाम आदि) से अधिक व्यापक है।
यह 11वें अध्याय के विश्व-रूप-दर्शन के बाद आता है, जहाँ अर्जुन का परिचित संबंध-भाव अचानक एक व्यापक, श्रद्धा-उत्पादक दृष्टि से रूपांतरित हो जाता है। इसलिए यह श्लोक कथा में संक्रमण-बिंदु है: मित्रता-आधारित संबोधन से विनय और क्षमा-याचना की ओर।
यह श्लोक निकट संबंधों में भी मर्यादित, विचारशील संवाद की सीख देता है: अपनापन कभी-कभी असावधानी (प्रमाद) में बदल सकता है। साथ ही यह बताता है कि जब किसी व्यक्ति/मूल्य/आदर्श का ‘महत्त्व’ नए रूप में समझ में आए, तो अपने पूर्व व्यवहार की पुनर्समीक्षा और आवश्यक हो तो क्षमा-याचना नैतिक परिपक्वता का संकेत है।
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