सहदेवस्य गोसंख्य-तन्तिपाल-रूपेण विराट-समागमः | Sahadeva’s Audience with Virāṭa as Cattle-Enumerator
Tantipāla
कृत्वा वेषं च सैरन्ध्रयास्ततो व्यचरदार्तवत् । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर पवित्र मन्द मुसकान और कजरारे नेत्रोंवाली द्रौपदीने अपने सुन्दर, महीन, कोमल और बड़े-बड़े, काले एवं घुँघराले केशोंकी चोटी गूँथकर उन मृदुल अलकोंको दाहिने भागमें छिपा दिया और एक अत्यन्त मलिन वस्त्र धारण करके सैरन्ध्रीका वेश बनाये वह दीन-दु:खियोंकी भाँति नगरमें विचरने लगी || १-२ न ! तां नरा: परिधावन्तीं स्त्रियश्व॒ समुपाद्रवन्
vaiśampāyana uvāca | kṛtvā veṣaṃ ca sairandhryās tato vyacarad ārtavat | tāṃ narāḥ paridhāvantīṃ striyaś ca samupādravan |
সৈরন্ধ্রী-রূপ ধারণ করে সে তখন দীন-আর্তের মতো নগরে ঘুরে বেড়াতে লাগল। তাকে এভাবে চলতে দেখে পুরুষেরা তার পেছনে ছুটল, আর নারীরাও কৌতূহলে ভিড় করে তাকে ঘিরে ধরল।
वैशम्पायन उवाच