रणे यं प्रेक्ष्य सीदन्ति हृतस्वा वणिजो यथा । कृपेण तेन ते तात कथमासीत् समागम:,“बेटा! जैसे वणिक् अपना धन छिन जानेपर दु:खी होते हैं, उसी प्रकार युद्धमें जिन्हें देखकर बड़े-बड़े योद्धा शिथिल हो जाते हैं, उन कृपाचार्यके साथ तुम्हारा संग्राम किस प्रकार हुआ?
বৈশম্পায়ন বললেন—বৎস! যাঁকে রণে দেখলেই মহাবীররাও ভেঙে পড়ে, যেমন ধনহৃত বণিক শোকে নুয়ে যায়—সেই কৃপাচার্যের সঙ্গে তোমার সম্মুখসমর কীভাবে ঘটল?
वैशम्पायन उवाच