दुर्योधन उवाच आचार्य एव क्षमतां शान्तिरत्र विधीयताम् । अभिश्यमाने तु गुरी तद् वृत्तं रोषकारितम्,दुर्योधनने कहा--आचार्य! क्षमा करें, अब शान्ति धारण करनी चाहिये। यदि गुरुके मनमें भेद न हो, तभी यह समझा जायगा कि पहले जो बातें कही गयी हैं, उनमें रोष ही कारण था
দুর্যোধন বলল—আচার্য, ক্ষমা করুন; এখন এখানে শান্তি স্থাপিত হোক। যদি গুরুর মনে বিভেদ না থাকে, তবে বোঝা যাবে যে পূর্বে বলা কথাগুলি ক্রোধবশতই ছিল।
दुर्योधन उवाच