Śamī-vṛkṣe śastra-nidhāna and Entry into Virāṭa’s Capital (शमीवृक्षे शस्त्रनिधानम्)
तस्य मौर्वीमपाकर्षच्छूर: संक्रन्दनो युधि । कुले नास्ति समो रूपे यस्येति नकुल: स्मृत:,जिनका मुख ताँबेके समान लाल था, जो बहुत कम बोलते थे, उन महाबाहु माद्रीनन्दन नकुलने दिग्विजयके समय जिस धनुषकी सहायतासे पश्चिम दिशापर विजय प्राप्त की थी, समूचे कुरुकुलमें जिनके समान दूसरा कोई रूपवान् न होनेके कारण जिन्हें नकुल कहा जाता था, जो युद्धमें शत्रुओंको रुलानेवाले शूर-वीर थे; उन वीरवर नकुलने भी अपने पूर्वोक्त धनुषकी प्रत्यंचा उतार दी
tasya maurvīm apākarṣac chūraḥ saṅkrandano yudhi | kule nāsti samo rūpe yasye ti nakulaḥ smṛtaḥ ||
বৈশম্পায়ন বললেন— যুদ্ধে শূর, শত্রুকে আর্তনাদ করানো ‘সংক্রন্দন’ নকুল তার ধনুকের জ্যা খুলে দিলেন। কুরু বংশে রূপে যার সমান কেউ ছিল না— সেই কারণেই তিনি ‘নকুল’ নামে প্রসিদ্ধ।
वैशम्पायन उवाच