Virāṭa-parva Adhyāya 42 — Duryodhana’s counsel to Bhīṣma on ajñātavāsa risk and raid strategy
विपाठा: पृथव: कस्य गार्ध्रपत्रा: शिलाशिता: । हारिद्रवर्णा: सुमुखा: पीता: सर्वायसा: शरा:,ये जो सोनेके तरकसमें सहस्रों नाराच रखे हुए हैं, जिनके सब ओर विशेषत: अग्रभागमें सोनेका पानी चढ़ा है और जो सबके सब पंखवाले हैं, ये किसके उपयोगमें आते हैं? ये मोटे-मोटे विपाठ (स्थूल दण्डवाले बाणविशेष) किसके हैं? इनमें गीधकी पाँखें लगी हुई हैं। इन बाणोंको पत्थरपर रगड़कर तेज किया गया है। इनके रंग हल्दीके समान हैं और अग्रभाग बहुत ही सुन्दर हैं। कारीगरने इनपर भी खूब पानी चढ़ाया है। ये सबके सब लोहेके ही बाण हैं (अर्थात् इनमें नीचे काठका डंडा नहीं लगा है)
uttara uvāca | vipāṭhāḥ pṛthavaḥ kasya gārdhrapatrāḥ śilāśitāḥ | hāridravarṇāḥ sumukhāḥ pītāḥ sarvāyasāḥ śarāḥ ||
উত্তরা বলল—এই প্রশস্ত, স্থূল দণ্ডবিশিষ্ট বিপাঠ বাণ কার, যেগুলিতে গৃধ্রের পালক লাগানো এবং পাথরে ঘষে ধার দেওয়া? এগুলি হলুদ-হলুদের মতো বর্ণের, সুন্দর অগ্রভাগযুক্ত, এবং সবই লোহার শর—এগুলি কার ব্যবহারের জন্য?
उत्तर उवाच