Bhīma–Draupadī Saṃvāda on Restraint, Protection, and the Kīcaka Threat
Virāṭa-parva, Adhyāya 20
दत्त्वा याचन्ति पुरुषा हत्वा वध्यन्ति चापरे | पातयित्वा च पात्यन्ते परैरिति च मे श्रुतम्,मैंने सुना है, जो मनुष्य दान करते हैं, वे ही कभी याचनाके लिये विवश हो जाते हैं। दूसरे बहुत-से मनुष्य ऐसे हैं, जो दूसरोंको मारकर स्वयं भी दूसरोंके द्वारा मारे जाते हैं तथा जो दूसरोंको नीचे गिराते हैं, वे स्वयं भी दूसरे प्रतिपक्षियोंद्वारा नीचे गिराये जाते हैं
dattvā yācanti puruṣā hatvā vadhyanti cāpare | pātayitvā ca pātyante parair iti ca me śrutam ||
আমি শুনেছি—যারা দান করে, তারাই কখনও ভিক্ষা চাইতে বাধ্য হয়। অনেকে অন্যকে হত্যা করে শেষে নিজেরাও নিহত হয়; আর যারা অন্যকে পতিত করে, তারাও প্রতিপক্ষের হাতে পতিত হয়।
वैशम्पायन उवाच