Virāṭanagara-nivāsa-nirṇaya
Decision to Reside in Virāṭa’s City
सभास्तारो भविष्यामि तस्य राज्ञों महात्मन: । कड्को नाम द्विजो भूत्वा मताक्ष: प्रियदेवन:,मैं पासा खेलनेकी विद्या जानता हूँ और यह खेल मुझे प्रिय भी है, अतः मैं कंक- नामक ब्राह्मण बनकर महामना राजा विराटकी राजसभाका एक सदस्य हो जाऊँगा और वैदूर्यमणिके समान हरी, सुवर्णके समान पीली तथा हाथीदाँतकी बनी हुई काली और लाल रंगकी मनोहर गोटियोंको चमकीले बिन्दुओंसे युक्त पासोंके अनुसार चलाता रहूँगा
yudhiṣṭhira uvāca | sabhāstaro bhaviṣyāmi tasya rājño mahātmanaḥ | kaṅko nāma dvijo bhūtvā matākṣaḥ priyadevanaḥ ||
যুধিষ্ঠির বললেন— সেই মহাত্মা রাজা বিরাটের সভায় আমি সভাসদ হব। ‘কঙ্ক’ নামে এক ব্রাহ্মণের বেশ ধরে, পাশাখেলায় পারদর্শী ও সেই ক্রীড়ার অনুরাগী হয়ে আমি সেখানে রাজসভায় অবস্থান করব।
युधिछिर उवाच