
दमयन्त्याः अरण्यविहारः — Damayantī’s Passage through the Wilderness
Upa-parva: Nalopākhyāna (The Narrative of Nala and Damayantī)
Bṛhadaśva describes Damayantī after killing a hunter: she proceeds alone through a fearsome, empty forest filled with predators, thieves, and varied flora and terrain. Overwhelmed by separation, she laments and repeatedly addresses Nala by recalling his assurances and the ethical weight of truth. She petitions an approaching ‘lord of the forest’ (a fierce beast) for knowledge of Nala and then turns to a prominent mountain, offering reverent praise and self-identification (as Bhīma’s daughter and Nala’s wife) while asking whether Nala has been seen. She reaches an ascetic hermitage populated by disciplined sages; they initially wonder if she is a deity, and she clarifies her human identity and marital crisis. The sages, through ascetic insight, predict an auspicious outcome: she will soon see Nala restored and ruling. When the hermitage and sages vanish, she questions whether it was dreamlike or extraordinary providence. Continuing, she addresses an aśoka tree as a symbolic agent of grief-removal. Finally, she encounters a large merchant caravan crossing a river; her disheveled appearance provokes fear, ridicule, and pity. The caravan questions her identity (deity/yakṣī/rākṣasī), and she asserts her human royal status, seeking news of Nala. The caravan leader, Śuci, states he has not seen Nala and identifies their destination as the land of the Cedi king Subāhu, framing the next movement of the episode.
Chapter Arc: पुष्कर राज्य-हरण के बाद हँसते हुए नल को फिर द्यूत के लिए उकसाता है—और दाँव अब धन-धान्य नहीं, स्वयं दमयन्ती तक पहुँच जाता है। → नल पर कलि-प्रभाव और पराजय का बोझ बढ़ता जाता है; वन-प्रस्थान में दम्पति भूख, थकान और अपमान झेलते हैं। मार्ग में स्वर्ण-पंखों वाले पक्षी दिखते हैं; नल उन्हें पकड़कर भोजन की आशा करता है। → पक्षी ‘अक्ष’ (जुए के पासे) रूप धारण कर नल के वस्त्र छीन लेते हैं और कहते हैं कि वे उसके वस्त्र हरने आए थे—नल नग्न, दीन और पूर्णतः असहाय खड़ा रह जाता है। → दमयन्ती नल को धैर्य देती है और विदर्भ की ओर सुरक्षित मार्गों का संकेत करती है; नल भी उसे त्यागने की इच्छा न होने की बात कहकर आश्वस्त करता है, पर परिस्थितियाँ उन्हें अलगाव की ओर धकेलती हैं। → दमयन्ती को विदर्भ-मार्ग पर भेजने की योजना बनती है—पर क्या नल साथ रह पाएगा, या कलि-ग्रस्त विवेक उन्हें अलग कर देगा?
Verse 1
हम () हि २ 7 एकषेष्टितमो< ध्याय: नलका जूएमें हारकर दमयन्तीके साथ वनको जाना और पक्षियोंद्वारा आपदग्रस्त नलके वस्त्रका अपहरण बृहृदश्च उवाच ततस्तु याते वार्ष्णेये पुण्यश्लोकस्य दीव्यत: । पुष्करेण हतं राज्यं यच्चान्यद् वसु किंचन
বৃহদশ্ব বললেন—যুধিষ্ঠির! বার্ষ্ণেয় চলে গেলে, পাশাখেলায় নিমগ্ন পুণ্যশ্লোক রাজা নলের রাজ্য এবং অন্য যা কিছু ধনসম্পদ ছিল—সবই পুষ্কর জিতে নিয়ে নিল।
Verse 2
ह्ृतराज्यं नलं राजन् प्रहसन् पुष्करो<ब्रवीत् | द्यूत॑ं प्रवर्ततां भूय: प्रतिपाणो5स्ति कस्तव
বৃহদশ্ব বললেন—রাজ্যহারা নলকে দেখে পুষ্কর হাসতে হাসতে বলল—“আবার পাশা চলুক? হে রাজন, এখন তোমার পণ রাখার মতো কী আছে?”
Verse 3
शिष्टा ते दमयन्त्येका सर्वमन्यज्जितं मया । दमयन्त्या: पण: साधु वर्ततां यदि मन्यसे
বৃহদশ্ব বললেন—“তোমার কাছে কেবল দময়ন্তীই অবশিষ্ট; বাকি সব আমি জিতে নিয়েছি। তুমি যদি মানো, তবে দময়ন্তীকেই পণ করে আবার পাশা চলুক।”
Verse 4
पुष्करेणैवमुक्तस्य पुण्यश्लोकस्य मन्युना | व्यदीर्यतेव हृदयं न चैनं किंचिदब्रवीत्,पुष्करके ऐसा कहनेपर पुण्यश्लोक महाराज नलका हृदय शोकसे विदीर्ण-सा हो गया, परंतु उन्होंने उससे कुछ कहा नहीं
বৃহদশ্ব বললেন—পুষ্কর এমন কথা বলতেই, ক্রোধ ও শোকে পুণ্যশ্লোক নলের হৃদয় যেন বিদীর্ণ হয়ে গেল; তবু তিনি তাকে কিছুই বললেন না।
Verse 5
ततः पुष्करमालोक्य नलः परममन्युमान् | उत्सृज्य सर्वगात्रे भ्यो भूषणानि महायशा:
বৃহদশ্ব বললেন—তখন মহাযশস্বী নল পুষ্করের দিকে চেয়ে প্রবল ক্রোধে, নিজের সর্বাঙ্গের অলংকার খুলে ত্যাগ করলেন।
Verse 6
एकवासा हासंवीत: सुहृच्छोकविवर्धन: । निश्चक्राम ततो राजा त्यक्त्वा सुविपुलां श्रियम्
তখন মহাযশস্বী রাজা নল তাঁর বিপুল রাজঐশ্বর্য ত্যাগ করে, অলংকার খুলে কেবল একখানি বস্ত্র পরিধান করে, চাদরহীন অবস্থায়—বন্ধুজনের শোক বাড়াতে বাড়াতে রাজপ্রাসাদ থেকে বেরিয়ে গেলেন।
Verse 7
दमयन्त्येकवस्त्राथ गच्छन्तं पृष्ठतो5न्वगात् । स तया बाह्ुतः सार्थ त्रिरात्रं नैघधोडवसत्
তখন একবস্ত্রধারিণী দময়ন্তী চলতে থাকা রাজা নলের পেছনে পেছনে গেলেন। নিষধরাজ তাঁকে সঙ্গে নিয়ে নগরের বাইরে তিন রাত্রি অবস্থান করলেন।
Verse 8
पुष्करस्तु महाराज घोषयामास वै पुरे । नले य: सम्यगातिछेत् स गच्छेद् वध्यतां मम,महाराज! पुष्करने उस नगरमें यह घोषणा करा दी--डुग्गी पिटवा दी कि “जो नलके साथ अच्छा बर्ताव करेगा, वह मेरा वध्य होगा”
মহারাজ পুষ্কর নগরে ঘোষণা করালেন—“যে নলের সঙ্গে সদ্ব্যবহার করবে, সে আমার আদেশে মৃত্যুদণ্ডের যোগ্য হবে।”
Verse 9
पुष्करस्य तु वाक्येन तस्य विद्वेषणेन च | पौरा न तस्य सत्कारं कृतवन्तो युधिष्ठिर,युधिष्ठिर! पुष्करके उस वचनसे और नलके प्रति पुष्करका द्वेष होनेसे पुरवासियोंने राजा नलका कोई सत्कार नहीं किया
হে যুধিষ্ঠির, পুষ্করের সেই বাক্য এবং নলের প্রতি তার বিদ্বেষের কারণে নগরবাসীরা রাজা নলকে কোনো সম্মান-সত্কার করল না।
Verse 10
स तथा नगराभ्याशे सत्काराहों न सस्कृतः । त्रिरात्रमुषितो राजा जलमात्रेण वर्तयन्
এইভাবে সম্পূর্ণ সম্মান-সত্কারের যোগ্য হয়েও রাজা নল নগরের নিকটে তিন রাত্রি কেবল জলমাত্রে জীবনধারণ করে থাকলেন; তবু তাঁকে কোনো অভ্যর্থনা করা হল না।
Verse 11
पीड्यमान: क्षुधा तत्र फलमूलानि कर्षयन् | प्रातिष्ठत ततो राजा दमयन्ती तमन्वगात्,वहाँ भूखसे पीड़ित हो फल-मूल आदि जुटाते हुए राजा नल वहाँसे अन्यत्र चले गये। केवल दमयन्ती उनके पीछे-पीछे गयी
সেখানে ক্ষুধায় কাতর হয়ে ফল-মূল সংগ্রহ করতে করতে রাজা নল সেই স্থান ত্যাগ করে এগিয়ে গেলেন। একমাত্র দময়ন্তীই দুঃখের মধ্যেও অটল আনুগত্যে তাঁর পিছু নিলেন।
Verse 12
क्षुधया पीड्यमानस्तु नलो बहुतिथेडहनि । अपश्यच्छकुनान् कांश्रिद्धिरण्यसदृशच्छदान्,इसी प्रकार नल बहुत दिनोंतक क्षुधासे पीड़ित रहे। एक दिन उन्होंने कुछ ऐसे पक्षी देखे, जिनकी पाँखें सोनेकी-सी थीं
এভাবেই নল বহুদিন ক্ষুধায় কাতর হয়ে ঘুরে বেড়ালেন। একদিন তিনি কয়েকটি পাখি দেখলেন, যাদের ডানা সোনার মতো ঝলমল করছিল।
Verse 13
स चिन्तयामास तदा निषधाधिपतिर्बली । अस्ति भक्ष्यो ममाद्यायं वसु चेदं भविष्यति
তাদের দেখে বলবান্ নিষধাধিপতির মনে ভাব জাগল—“আজ এ পাখিরাই আমার আহার হতে পারে, আর এদের পালক আমার ধন হয়ে উঠবে।”
Verse 14
ततस्तान् परिधानेन वाससा स समावृणोत् | तस्य तद् वस्त्रमादाय सर्वे जम्मुर्विहायसा,तदनन्तर उन्होंने अपने अधोवस्त्रसे उन पक्षियोंको ढँक दिया। किंतु वे सब पक्षी उनका वह वस्त्र लेकर आकाशमें उड़ गये
তারপর তিনি নিজের পরিধেয় বস্ত্র দিয়ে সেই পাখিগুলিকে ঢেকে দিলেন; কিন্তু সব পাখি সেই বস্ত্র কেড়ে নিয়ে আকাশে উড়ে গেল।
Verse 15
उत्पतन्तः खगा वाक्यमेतदाहुस्ततो नलम् | दृष्टवा दिग्वाससं भूमौ स्थितं दीनमधोमुखम्
উড়ে যেতে যেতে সেই পাখিরা তখন নলকে এই কথা বলল—মাটিতে দিগম্বর, দীন ও নত-মুখ হয়ে দাঁড়িয়ে থাকতে দেখে।
Verse 16
उड़ते हुए उन पक्षियोंने राजा नलको दीनभावसे नीचे मुँह किये धरतीपर नग्न खड़ा देख उनसे कहा-- ।।
বৃহদশ্ব বললেন— “হে দুর্বুদ্ধি রাজা! আমরা পাখি নই—আমরা পাশা। তোমার বস্ত্র হরণ করবার অভিপ্রায়েই এখানে এসেছি। তুমি যখন বস্ত্র পরেই সেখান থেকে চলে গেলে, তখন আমাদের আনন্দ হয়নি।”
Verse 17
तान् समीपगतानक्षानात्मानं च विवाससम् | पुण्यश्लोकस्तदा राजन् दमयन्तीमथाब्रवीत्
হে রাজন, পাশাগুলোকে কাছে আসতে দেখে এবং নিজেকে বস্ত্রহীন পেয়ে খ্যাতিমান নল তখন দময়ন্তীকে বললেন— “সাধ্বী, ভীরু! যাদের ক্রোধে আমার রাজ্যশ্রী লুপ্ত হয়েছে, আমি ক্ষুধা ও দুঃখে কাতর হয়ে প্রাণধারণের জন্য অন্নও পাই না। যাদের কারণে নিষধের প্রজারা আর আমাকে সম্মান করে না—সেই পাশাগুলোই এখন পাখির রূপ ধরে আমার বস্ত্র নিয়ে যাচ্ছে।”
Verse 18
येषां प्रकोपादैश्वर्यात् प्रच्युतो5हमनिन्दिते । प्राणयात्रां न विन्देयं दु:खित: क्षुधयान्वित:
“হে অনিন্দিতা! যাদের ক্রোধে আমি রাজঐশ্বর্য থেকে পতিত হয়েছি। দুঃখে জর্জরিত ও ক্ষুধায় কাতর হয়ে প্রাণধারণের জন্য অন্নও পাই না।”
Verse 19
येषां कृते न सत्कारमकुर्वन् मयि नैषधा: । इमे ते शकुना भूत्वा वासो भीरु हरन्ति मे
“যাদের কারণে নিষধের লোকেরা আমাকে আর সম্মান করে না—সেই পাশাগুলোই এখন পাখি হয়ে, হে ভীরু, আমার বস্ত্র হরণ করছে।”
Verse 20
वैषम्यं परम॑ प्राप्तो द:खितो गतचेतन: । भर्ता ते5हं निबोधेदं वचन हितमात्मन:
“আমি চরম বিপদে পড়েছি; দুঃখে আমার চেতনা যেন লুপ্তপ্রায়। আমি তোমার স্বামী—অতএব নিজের মঙ্গলের জন্য এই কথা বোঝো; আমার বাক্য শোনো।”
Verse 21
एते गच्छन्ति बहव: पन्थानो दक्षिणापथम् | अवन्तीमृक्षवन्तं च समतिक्रम्य पर्वतम्,'ये बहुत-से मार्ग हैं, जो दक्षिण दिशाकी ओर जाते हैं। यह मार्ग ऋक्षवान् पर्वतको लाँघकर अवन्ती-देशको जाता है
বৃহদশ্ব বললেন—দক্ষিণাপথের দিকে যাওয়ার বহু পথ আছে। ঋক্ষবৎ পর্বত অতিক্রম করে তারা অবন্তী-দেশে পৌঁছে।
Verse 22
एष विन्ध्यो महाशैल: पयोष्णी च समुद्रगा । आश्रमाश्च महर्षीणां बहुमूलफलान्विता:
বৃহদশ্ব বললেন—এই দেখো মহাশৈল বিন্ধ্য, আর এই পয়োষ্ণী নদী সমুদ্রাভিমুখে প্রবাহিত। এখানে মহর্ষিদের আশ্রমও আছে, যেখানে ফল-মূলের প্রাচুর্য।
Verse 23
एष पन्था विदर्भाणामसौ गच्छति कोसलान् | अतः परं च देशो<यं दक्षिणे दक्षिणापथ:
বৃহদশ্ব বললেন—এটি বিদর্ভের পথ; ওটি কোসলের দিকে যায়। এর পর দক্ষিণে যে দেশ, তা ‘দক্ষিণাপথ’ নামে পরিচিত।
Verse 24
एतद् वाक््यं नलो राजा दमयन्तीं समाहित: । उवाचासकृदार्तो हि भैमीमुद्दिश्य भारत,भारत! राजा नलने एकाग्रचित्त होकर बड़ी आतुरताके साथ दमयन्तीसे उपर्युक्त बातें बार-बार कहीं
হে ভারত! তখন রাজা নল মন সংযত করে দময়ন্তীকে এই কথা বললেন; আর অন্তরে ব্যথিত হয়ে ভৈমীকে উদ্দেশ করে বারংবার উচ্চারণ করলেন।
Verse 25
ततः सा बाष्पकलया वाचा दु:खेन कर्शिता । उवाच दमयन्ती तं नैषधं करुणं वच:,तब दमयन्ती अत्यन्त दुःखसे दुर्बल हो नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई गद्गद वाणीमें राजा नलसे यह करुण वचन बोली--
তখন দময়ন্তী দুঃখে ক্লিষ্ট হয়ে, অশ্রুসিক্ত কণ্ঠে, নিষধরাজ নলকে করুণ বাক্য বললেন।
Verse 26
उद्वेजते मे हृदयं सीदन्त्यड्रानि सर्वश:ः । तव पार्थिव संकल्पं चिन्तयन्त्या: पुन: पुन:
আমার হৃদয় ভয়ে কেঁপে ওঠে, আর আমার সর্বাঙ্গ অবশ হয়ে আসে। হে রাজন, আপনার সংকল্পের কথা বারবার ভাবতে ভাবতে আমি গভীর উদ্বেগে আচ্ছন্ন হই।
Verse 27
ह्ृतराज्यं ह्ृतद्रव्यं विवस्त्र क्षुच्छूमान्वितम् । कथमुत्सृज्य गच्छेयमहं त्वां निर्जने वने
আপনার রাজ্য হরণ হয়েছে, ধনও লুপ্ত হয়েছে; আপনি বস্ত্রহীন, ক্ষুধা ও ক্লেশে কাতর। এই নির্জন বনে আপনাকে একা ফেলে আমি কীভাবে আপনাকে ত্যাগ করে চলে যাব?
Verse 28
“महाराज! आपका मानसिक संकल्प क्या है
মহারাজ! আপনার মনে যে সংকল্প জাগছে, তা আমি বারবার ভাবলেই আমার হৃদয় ব্যাকুল হয়ে ওঠে এবং আমার সর্বাঙ্গ শিথিল হয়ে যায়। আপনার রাজ্য হরণ হয়েছে, ধন নষ্ট হয়েছে; আপনার দেহে বস্ত্র পর্যন্ত নেই, আর আপনি ক্ষুধা ও পরিশ্রমে কাতর। এমন অবস্থায় এই নির্জন বনে আপনাকে অসহায় রেখে আমি কীভাবে চলে যেতে পারি? হে মহারাজ, যখন আপনি এই ভয়ংকর অরণ্যে ঘুরে বেড়াবেন—ক্ষুধায় জর্জরিত, ক্লান্ত—এবং পূর্বসুখ স্মরণ করে শোকে ভেঙে পড়বেন, তখন আমি সান্ত্বনা দিয়ে আপনার ক্লান্তি ও দুঃখ প্রশমিত করব।
Verse 29
न च भार्यासमं किंचिद् विद्यते भिषजां मतम् | औषध॑ सर्वदु:खेषु सत्यमेतद् ब्रवीमि ते,“चिकित्सकोंका मत है कि समस्त दु:ःखोंकी शान्तिके लिये पत्नीके समान दूसरी कोई औषध नहीं है; यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ”
চিকিৎসকদের বিচারে স্ত্রীর তুল্য আর কিছু নেই। সকল দুঃখের জন্য সে-ই ঔষধ—এ সত্য আমি আপনাকে বলছি।
Verse 30
नल उवाच एवमेतद् यथा55त्थ त्वं दमयन्ति सुमध्यमे । नास्ति भार्यासमं मित्र नरस्यार्तस्य भेषजम्
নল বললেন—সুমধ্যমা দময়ন্তী, তুমি যেমন বলেছ, তেমনই সত্য। বিপন্ন মানুষের জন্য স্ত্রীর সমান না কোনো বন্ধু আছে, না কোনো ঔষধ।
Verse 31
न चाहं त्यक्तकामस्त्वां किमलं भीरु शड्कसे । त्यजेयमहमात्मानं न चैव त्वामनिन्दिते
ভীরু! আমি তোমাকে ত্যাগ করতে চাই না—তবে কেন এত সন্দেহ করছ? অনিন্দিতে! আমি নিজের প্রাণ ত্যাগ করতে পারি, কিন্তু তোমাকে কখনও পরিত্যাগ করতে পারি না।
Verse 32
दमयन्त्युवाच यदि मां त्वं महाराज न विहातुमिहेच्छसि । तत् किमर्थ विदर्भाणां पन्था: समुपदिश्यते,दमयन्तीने कहा--महाराज! यदि आप मुझे त्यागना नहीं चाहते तो विदर्भदेशका मार्ग क्यों बता रहे हैं?
দময়ন্তী বলল—মহারাজ! যদি আপনি এখানে আমাকে ত্যাগ করতে না চান, তবে বিদর্ভের পথ কেন দেখিয়ে দিচ্ছেন?
Verse 33
अवैमि चाहं नृपते न तु मां त्यक्तुमहसि । चेतसा त्वपकृष्टेन मां त्यजेथा महीपते
হে নৃপতি! আমি জানি, আপনি আমাকে ত্যাগ করার যোগ্য নন; কিন্তু হে পৃথিবীপতি, এই ভয়ংকর বিপদে আপনার মন টেনে নেওয়া হয়েছে—তাই আপনি আমাকেও পরিত্যাগ করতে পারেন।
Verse 34
पन्थानं हि ममाभीक्ष्णमाख्यासि च नरोत्तम । अतो निमित्तं शोकं मे वर्धयस्यमरोपम,नरश्रेष्ट! आप बार-बार जो मुझे विदर्भदेशका मार्ग बता रहे हैं। देवोपम आर्यपुत्र! इसके कारण आप मेरा शोक ही बढ़ा रहे हैं
নরশ্রেষ্ঠ! আপনি বারবার আমাকে বিদর্ভের পথ বলছেন; দেবোপম আর্যপুত্র! সেই কারণেই আপনি আমার শোকই বাড়িয়ে দিচ্ছেন।
Verse 35
यदि चायमभिप्रायस्तव ज्ञातीन् व्रजेदिति । सहितावेव गच्छावो विदर्भान् यदि मन्यसे
যদি আপনার অভিপ্রায় এই হয় যে দময়ন্তী তার স্বজনদের কাছে যাবে, তবে আপনি সম্মত হলে আমরা দুজনেই একসঙ্গে বিদর্ভে যাই।
Verse 36
विदर्भराजत्तत्र त्वां पूजयिष्यति मानद । तेन त्वं पूजितो राजन् सुखं वत्स्यसि नो गृहे,मानद! वहाँ विदर्भनरेश आपका पूरा आदर-सत्कार करेंगे। राजन्! उनसे पूजित होकर आप हमारे घरमें सुखपूर्वक निवास कीजियेगा
নল বললেন—মানদ! সেখানে বিদর্ভরাজ আপনাকে যথোচিত সম্মান-সত্কার করবেন। রাজন! তাঁর দ্বারা পূজিত হয়ে আপনি আমাদের গৃহে সুখে বাস করবেন॥
Verse 61
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकी वनयात्राविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত নলোপাখ্যানপর্বে নলের বনযাত্রা-বিষয়ক একষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল॥
Verse 63
इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलवनयात्रायामेकषष्टितमो< ध्याय:
ইতি শ্রীমহাভারতের বনপর্বে নলোপাখ্যানপর্বের অন্তর্গত নলের বনযাত্রায় একষট্টিতম অধ্যায়॥
The chapter stages a conflict between despair and dharma: whether Damayantī should relinquish life amid abandonment and danger, or persist in truthful, disciplined searching grounded in marital commitment and ethical endurance.
Ethical agency is maintained through satya and dhṛti even when social protections fail; respectful speech, self-identification, and seeking lawful aid become practical instruments for survival and meaning.
No explicit phalaśruti is stated here; the closest meta-level signal is the ascetics’ predictive assurance, functioning as narrative validation that endurance aligned with dharma leads toward restoration within the larger exemplum.
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