
Draupadī’s Lament and Theodicy: Dharma, Dice, and Īśvara’s Governance (Āraṇyaka-parva 31)
Upa-parva: Draupadī–Yudhiṣṭhira Saṃvāda (Determinism, Dharma, and the Dice Catastrophe)
Draupadī addresses Yudhiṣṭhira with reverence to Dhātṛ and Vidhātṛ, asserting that his disposition toward ancestral conduct has been disrupted by delusion. She observes that prosperity often does not follow from dharma, non-cruelty, patience, or straightforwardness, and highlights the disproportion between Yudhiṣṭhira’s virtue and his suffering. She catalogues his continuous dharmic practices—service to brāhmaṇas and elders, offerings to gods and ancestors, hospitality, distribution of goods, and performance of sacrifices—arguing that even in forest exile his dharma has not diminished. The discourse then introduces a ‘purātana itihāsa’ thesis: the world stands under Īśvara’s control rather than its own; Dhātṛ apportions pleasure and pain, and beings move as if constrained, like objects set in motion. Multiple metaphors (puppet-like motion, threaded jewels, wind-driven grass) illustrate determinism and limited agency. Draupadī ends by criticizing the apparent asymmetry whereby the unrighteous prosper, questioning whether Īśvara is implicated if karma does not reach its agent, and expressing compassion for the weak when power determines outcomes.
Chapter Arc: वनवास की धूलि में भी राजसभा का प्रश्न उठता है: द्रौपदी (यज्ञसेनकुमारी) अपनी वाणी की विचित्र, मनोहर पदावली से युधिष्ठिर को धर्म और भाग्य के संबंध में टटोलती है—क्या निष्काम कर्म सचमुच सार्थक है? → युधिष्ठिर अपने आचरण का आधार स्पष्ट करते हैं—वे कर्मफल की लालसा से नहीं, ‘देय है इसलिए देता हूँ, यष्टव्य है इसलिए यज्ञ करता हूँ’ इस भाव से धर्म का अनुष्ठान करते हैं; द्रौपदी के भीतर उठती पीड़ा और संशय के सामने वे शिष्टाचार-परंपरा, ऋषि-प्रमाण और गृहस्थ-धर्म की मर्यादा का स्मरण कराते हैं। → युधिष्ठिर निर्णायक वचन कहते हैं: ‘धर्म निष्फल नहीं होता, अधर्म भी फल दिए बिना नहीं रहता’—विद्या और तपस्या के प्रत्यक्ष फल जैसे दिखते हैं, वैसे ही धर्म-अधर्म का फल भी अवश्य घटित होता है; साथ ही वे द्रौपदी को ईश्वर पर आक्षेप न करने, धाता/ईश्वर को नमस्कार कर सीखने और देवताओं की गूढ़ माया तथा तपसा-शुद्ध दृष्टि की बात कहकर संशय की जड़ पर प्रहार करते हैं। → द्रौपदी के लिए धर्म को ‘प्लव’ (नाव) की उपमा देकर युधिष्ठिर आश्वस्त करते हैं—स्वर्ग/कल्याण की यात्रा में धर्म ही एकमात्र साधन है; शिष्टों द्वारा आचरित, ऋषियों द्वारा प्रतिपादित धर्म-पथ से विचलित न होने की शिक्षा देकर वे उसके मन को स्थिर करने का प्रयत्न करते हैं। → अंत में चेतावनी-स्वर उभरता है: जो आर्ष-प्रमाण को लाँघकर, धर्म का पालन न करे और शास्त्रातिग होकर मूढ़ बने, वह जन्म-जन्म में शांति नहीं पाता—यह संकेत अगले प्रसंगों में द्रौपदी के प्रश्नों और युधिष्ठिर की धर्म-व्याख्या को और तीखा बनाता है।
Verse 1
युधिष्ठिर बोले--यज्ञसेनकुमारी! तुमने जो बात कही है
যুধিষ্ঠির বললেন—যজ্ঞসেন-কন্যে! তুমি যা বলেছ, তা শ্রবণে মনোহর, বিচিত্র পদবিন্যাসে অলংকৃত ও অতিশয় সুন্দর। আমি একাগ্রচিত্তে তা শুনেছি; কিন্তু এই মুহূর্তে তুমি অজ্ঞতাবশত নাস্তিক মতই প্রচার করছ।
Verse 2
नाहं कर्मफलान्वेषी राजपुत्रि चराम्युत । ददामि देयमित्येव यजे यष्टव्यमित्युत
রাজকন্যে! আমি কর্মফলের অনুসন্ধানে লিপ্ত হয়ে কর্ম করি না। ‘দেওয়া কর্তব্য’—এই বোধে দান করি, আর ‘যজ্ঞ করা কর্তব্য’—এই বোধে যজ্ঞ সম্পাদন করি।
Verse 3
अस्तु वात्र फल॑ मा वा कर्तव्यं पुरुषेण यत् । गृहे वा वसता कृष्णे यथाशक्ति करोमि तत्
কৃষ্ণে! সেই কর্মের ফল হোক বা না হোক, গৃহস্থ অবস্থায় পুরুষের যে কর্তব্য, আমি তা যথাশক্তি কর্তব্যবুদ্ধিতে পালন করি।
Verse 4
धर्म चरामि सुश्रोणि न धर्मफलकारणात् | आगमाननतिक्रम्य सतां वृत्तमवेक्ष्य च
সুশ্রোণি! আমি ধর্মফলের লোভে ধর্মাচরণ করি না। শাস্ত্রের বিধি লঙ্ঘন না করে এবং সৎজনের আচরণ দেখে আমার মন স্বভাবতই ধর্মরক্ষণে প্রবৃত্ত হয়। যে ব্যক্তি কিছু পাওয়ার বাসনায় ধর্মকে বাণিজ্য করে, সে ধর্মনিষ্ঠদের দৃষ্টিতে নীচ ও নিন্দনীয়।
Verse 5
धर्म एव मन: कृष्णे स्वभावाच्चैव मे धृतम् । धर्मवाणिज्यको हीनो जघन्यो धर्मवादिनाम्
যুধিষ্ঠির বললেন—হে কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)! আমার মন স্বভাবতই ধর্মে স্থির। আমি ফললাভের লোভে ধর্মাচরণ করি না; বরং সাধুজনের আচরণ দেখে এবং শাস্ত্রের সীমা লঙ্ঘন না করে স্বভাবতই ধর্মনিষ্ঠ থাকি। কিন্তু যে কিছু পাওয়ার আশায় ধর্মকে বাণিজ্য করে, সে ধর্মবক্তাদের দৃষ্টিতে নীচ ও নিন্দনীয়।
Verse 6
न धर्मफलमाप्रोति यो धर्म दोग्धुमिच्छति । यश्चैनं शड़कते कृत्वा नास्तिक्यात् पापचेतन:
যুধিষ্ঠির বললেন—যে স্বার্থলাভের জন্য ধর্মকে ‘দোহন’ করতে চায়, সে ধর্মফল পায় না। আর যে নাস্তিকতার বশে ধর্মকর্ম করেও তার বিষয়ে সন্দেহ পোষে—পাপবুদ্ধিসম্পন্ন সে-ও ধর্মের সত্য ফল লাভ করে না।
Verse 7
अतिवादाद् वदाम्येष मा धर्ममभिशड्किथा: । धर्माभिशड्की पुरुषस्तिर्यग्गतिपरायण:
আমি দৃঢ়ভাবে বলছি—ধর্ম সম্বন্ধে সন্দেহ কোরো না; কারণ যে ব্যক্তি ধর্মে সন্দেহ পোষে, সে তির্যক্-গতি—পশু-পাখির যোনিতে—পতিত হয়।
Verse 8
धर्मो यस्याभिशड्क््य: स्यादार्ष वा दुर्बलात्मन: | वेदाच्छूद्र इवापेयात् स लोकादजरामरात्
যুধিষ্ঠির বললেন—যে দুর্বলচিত্ত ব্যক্তি ধর্মে সন্দেহ করে, কিংবা ঋষিদের উপদেশেও সংশয় পোষে, যে বেদ ও শাস্ত্রে অবিশ্বাস করে—সে জরা-মৃত্যুহীন সেই পরম লোক থেকে তেমনি বঞ্চিত হয়, যেমন শূদ্র বেদাধ্যয়ন থেকে বঞ্চিত থাকে।
Verse 9
वेदाध्यायी धर्मपर: कुले जातो मनस्विनि । स्थविरेषु स योक्तव्यो राजर्षिर्धर्मचारिभि:
যুধিষ্ঠির বললেন—হে মনস্বিনী! যে বেদাধ্যায়ী, ধর্মপরায়ণ এবং সুকুলজাত—এমন রাজর্ষিকে ধর্মাচারী লোকদের উচিত বয়োজ্যেষ্ঠদের মধ্যে গণ্য করা। বয়সে কম হলেও তাকে বৃদ্ধের ন্যায় সম্মান দিতে হবে।
Verse 10
पापीयान् स हि शूद्रेभ्यस्तस्करेभ्यो विशिष्यते । शास्त्रातिगो मन्दबुद्धियों धर्ममभिशड्गकते
যুধিষ্ঠির বললেন—যে মন্দবুদ্ধি ব্যক্তি শাস্ত্রের সীমা লঙ্ঘন করে ধর্ম সম্বন্ধে সন্দেহ পোষণ করে, সে শূদ্র ও চোরের চেয়েও অধিক পাপী; কারণ প্রামাণ্য শিক্ষাকে অতিক্রম করে সে নীতিধর্মের ভিত্তিকেই নড়বড়ে করে।
Verse 11
प्रत्यक्ष हि त्वया दृष्ट ऋषिर्गच्छन् महातपा: । मार्कण्डेयोडप्रमेयात्मा धर्मेण चिरजीविता
যুধিষ্ঠির বললেন—তুমি নিজ চোখে দেখেছ, মহাতপস্বী ঋষি মার্কণ্ডেয়কে এখান থেকে প্রস্থান করতে—যাঁর অন্তঃসত্তা অপরিমেয়। ধর্মের অবিচল পালনেই তিনি দীর্ঘজীবন লাভ করেছেন।
Verse 12
व्यासो वसिष्ठो मैत्रेयो नारदो लोमश: शुक: । अन्ये च ऋषय: सर्वे धर्मेणैव सुचेतस:,व्यास, वसिष्ठ, मैत्रेय, नारद, लोमश, शुक तथा अन्य सब महर्षि धर्मके पालनसे ही शुद्ध हृदयवाले हुए हैं
যুধিষ্ঠির বললেন—ব্যাস, বসিষ্ঠ, মৈত্রেয়, নারদ, লোমশ, শুক—এবং অন্যান্য সকল ঋষি—ধর্মের অনুশীলনেই নির্মল ও সুপ্রসন্নচিত্ত হয়েছেন।
Verse 13
प्रत्यक्ष पश्यसि होतान् दिव्ययोगसमन्वितान् । शापानुग्रहणे शक्तान् देवेभ्योडपि गरीयस:
যুধিষ্ঠির বললেন—তুমি এই হোতৃদের নিজ চোখে প্রত্যক্ষ দেখছ। এরা দিব্য যোগশক্তিতে সমন্বিত, শাপ ও অনুগ্রহ দানে সক্ষম, এবং দেবতাদের থেকেও অধিক গৌরবশালী।
Verse 14
एते हि धर्ममेवादौ वर्णयन्ति सदानघे । कर्तव्यममरप्रख्या: प्रत्यक्षागमबुद्धय:
যুধিষ্ঠির বললেন—হে অনঘে! এই মহর্ষিরা সর্বদা প্রথমেই ধর্মের কথা বলেন। যাঁরা অমরসম খ্যাত, এবং যাঁদের বুদ্ধি প্রত্যক্ষ ও আগম—উভয়ের উপর প্রতিষ্ঠিত, তাঁরা বলেন—আচরণে সর্বাগ্রে স্থাপনীয় ধর্মই।
Verse 15
अतो नाहसि कल्याणि धातारं धर्ममेव च | राज्ञि मूढेन मनसा क्षेप्तुं शड्कितुमेव च,अतः कल्याणमयी महारानी द्रौपदी! तुम्हें मूर्खतायुक्त मनके द्वारा ईश्वर और धर्मपर आक्षेप एवं आशंका नहीं करनी चाहिये
অতএব, কল্যাণী! মোহগ্রস্ত মনে তুমি বিধাতা (ঈশ্বর) ও ধর্মকে দোষারোপ করো না, তাদের সম্বন্ধে সন্দেহও পোষণ করো না।
Verse 16
उन्मत्तान् मन्यते बाल: सर्वानागतनिश्चयान् | धर्माभिशड्को नान्यस्मात् प्रमाणमधिगच्छति
ধর্ম বিষয়ে সন্দেহ পোষণকারী শিশুবুদ্ধি মানুষ, যাঁরা তার তত্ত্বে দৃঢ় সিদ্ধান্তে পৌঁছেছেন সেই সকল জ্ঞানীদের উন্মত্ত মনে করে; তাই সে ধর্ম সম্বন্ধে অন্য কারও কাছ থেকে কোনো প্রমাণ গ্রহণ করে না।
Verse 17
आत्मप्रमाण उन्नद्ध: श्रेयसो हवमन्यक: । इन्द्रियप्रीतिसम्बद्धं यदिदं लोकसाक्षिकम् । एतावन्मन्यते बालो मोहमन्यत्र गच्छति
যে কেবল নিজের বুদ্ধিকেই প্রমাণ মানে, সে উদ্ধত হয়ে কল্যাণকর পথ ও উত্তম ধর্মকে তুচ্ছ করে; ইন্দ্রিয়সুখে আবদ্ধ হয়ে সে এই লোকের প্রত্যক্ষ দৃশ্যকেই সত্য বলে মানে। শিশুবুদ্ধি এতটুকুকেই অস্তিত্ব মনে করে; যা অদৃশ্য, তার বিষয়ে তার বোধ মোহে বিচ্যুত হয়।
Verse 18
प्रायक्षित्तं न तस्यास्ति यो धर्ममभिशड्कते । ध्यायन् स कृपण: पापो न लोकानू् प्रतिपद्यते
যে ধর্মের প্রতি সন্দেহ পোষণ করে, তার শুদ্ধির জন্য কোনো প্রায়শ্চিত্ত নেই। ধর্মবিরোধী চিন্তায় নিমগ্ন সেই কৃপণ পাপী উচ্চলোক লাভ করে না; অধোগতিতে পতিত হয়।
Verse 19
प्रमाणाद्धि निवृत्तो हि वेदशास्त्रार्थनिन्दक: । कामलोभातिगो मूढो नरकं प्रतिपद्यते
যে প্রমাণ থেকে মুখ ফিরিয়ে বেদ-শাস্ত্রের তত্ত্বের নিন্দা করে এবং কাম-লোভে অতিশয় আসক্ত হয়ে মোহগ্রস্ত হয়, সে নরকে পতিত হয়।
Verse 20
यस्तु नित्यं कृतमतिर्धर्ममेवाभिपद्यते । अशड्कमान: कल्याणि सोअमुत्रानन्त्यमश्लुते
হে কল্যাণী! যে ব্যক্তি প্রতিদিন অটল সংকল্পে কেবল ধর্মেরই আশ্রয় গ্রহণ করে এবং সকল সংশয় ও ভয় পরিত্যাগ করে, সে পরলোকে অবিনশ্বর, অনন্ত মঙ্গল লাভ করে—পরম শ্রেয় প্রাপ্ত হয়।
Verse 21
जो मूढ़ मानव आर्ष-पग्रन्थोंके प्रमाणकी अवहेलना करके समस्त शास्त्रोंक विपरीत आचरण करते हुए धर्मका पालन नहीं करता, वह जन्म-जन्मान्तरोंमें भी कभी कल्याणका भागी नहीं होता
যে মূঢ় মানুষ ঋষিপ্রণীত গ্রন্থের প্রমাণকে তুচ্ছ করে, সকল শাস্ত্রের বিরুদ্ধ আচরণ করে ধর্ম পালন করে না—সে জন্মে জন্মান্তরেও কখনো সত্য কল্যাণের ভাগী হয় না।
Verse 22
यस्य नार्ष प्रमाणं स्याच्छिष्टाचारक्ष भाविनि । न वै तस्य परो लोको नायमस्तीति निश्चय:
হে ভদ্রে! যার কাছে ঋষিদের বচন ও শিষ্টজনের আচরণ প্রমাণ নয়, তার জন্য না এই লোক আছে, না পরলোক—তত্ত্বদর্শী মহাপুরুষদের এটাই স্থির সিদ্ধান্ত।
Verse 23
शिष्टैराचरितं धर्म कृष्णे मा स्माभिशड्किथा: । पुराणमृषिश्रि: प्रोक्त सर्वज्ञै: सर्वदर्शिभि:
হে কৃষ্ণে! শিষ্টজনের আচরিত এই ধর্মে সন্দেহ কোরো না। এ প্রাচীন ধর্ম সর্বজ্ঞ, সর্বদর্শী মহর্ষিদের দ্বারা উপদিষ্ট।
Verse 24
धर्म एव प्लवो नान्य: स्वर्ग द्रौपदि गच्छताम् । सैव नौ: सागरस्येव वणिज: पारमिच्छत:
হে দ্রৌপদী! স্বর্গে গমনেচ্ছুদের জন্য ধর্মই একমাত্র ভেলা—অন্য কিছু নয়। যেমন সমুদ্র পার হতে ইচ্ছুক বণিকের জন্য জাহাজ অপরিহার্য, তেমনি স্বর্গলক্ষ্যীদের জন্য ধর্মাচরণই একমাত্র নৌকা।
Verse 25
अफलो यदि धर्म: स्याच्चरितो धर्मचारिभि: | अप्रतिष्ठे तमस्येतज्जगन्मज्जेदनिन्दिते,साध्वी द्रौपदी! यदि धर्मपरायण पुरुषोंद्वारा पालित धर्म निष्फल होता तो सम्पूर्ण जगत् असीम अन्धकारमें निमग्न हो जाता
যুধিষ্ঠির বললেন— “হে নির্দোষা, সাধ্বী দ্রৌপদী! ধর্মপরায়ণদের দ্বারা আচরিত ধর্ম যদি সত্যিই নিষ্ফল হতো, তবে এই সমগ্র জগৎ—যার কোনো আশ্রয় থাকত না—অন্তহীন অন্ধকারে নিমজ্জিত হয়ে যেত।”
Verse 26
निर्वाणं नाधिगच्छेयुर्जीवेयु: पशुजीविकाम् | विद्यां ते नैव युज्येयुर्न चार्थ केचिदाप्रुयु:
যুধিষ্ঠির বললেন— “ধর্ম যদি নিষ্ফল হতো, তবে ধার্মিকেরা মোক্ষ লাভ করত না; মানুষ বিদ্যাচর্চায় মন দিত না; কোনো উদ্দেশ্যসিদ্ধির জন্য কেউ চেষ্টা করত না; আর সকলেই পশুর মতো জীবন যাপন করত।”
Verse 27
तपकश्न ब्रह्मचर्य च यज्ञ: स्वाध्याय एव च | दानमार्जवमेतानि यदि स्युरफलानि वै
যুধিষ্ঠির বললেন— “তপস্যা, ক্ষমা, ব্রহ্মচর্য, যজ্ঞ, স্বাধ্যায়, দান ও সরলতা—এ সব যদি সত্যিই নিষ্ফল হতো, তবে প্রাচীন কালের শ্রেষ্ঠ ও শ্রেষ্ঠতর মহাপুরুষেরা ধর্মাচরণ করতেন না। আর যদি ধর্মকর্মের কোনো ফল না থাকত—যদি তা কেবল প্রতারণা হতো—তবে ঋষি, দেবতা, গন্ধর্ব, অসুর ও রাক্ষস—যাঁরা নিজ নিজ শক্তিতে প্রভাবশালী—কোন কারণে শ্রদ্ধাভরে ধর্ম পালন করতেন?”
Verse 28
नाचरिष्यन् परे धर्म परे परतरे च ये । विप्रलम्भो5यमत्यन्तं यदि स्युरफला: क्रिया:
যুধিষ্ঠির বললেন— “যদি পর, পরতর ও পরতরতম—এই সর্বোচ্চ ধর্মও নিষ্প্রভাব হতো, তবে পূর্বকালের মহাপুরুষেরা তা আচরণ করতেন না। ধর্মীয় ক্রিয়াকলাপ যদি সম্পূর্ণ নিষ্ফল—শুধু প্রতারণা—হতো, তবে তা নিছক মহা-প্রবঞ্চনাই হতো।”
Verse 29
ऋषयश्नैव देवाश्न गन्धर्वासुरराक्षसा: | ईश्वरा: कस्य हेतोस्ते चरेयुर्धर्ममादृता:
যুধিষ্ঠির বললেন— “ঋষি, দেবতা এবং গন্ধর্ব, অসুর ও রাক্ষস—যাঁরা নিজ নিজ শক্তিতে সক্ষম—কোন কারণে শ্রদ্ধাভরে ধর্ম পালন করেন? যদি তপস্যা, ব্রহ্মচর্য, যজ্ঞ, স্বাধ্যায়, দান ও সরলতা নিষ্ফল—শুধু প্রতারণা—হতো, তবে প্রাচীন শ্রেষ্ঠ পুরুষেরা ধর্ম মানতেন না, আর এই শক্তিমান সত্তারাও তাকে সম্মান করতেন না।”
Verse 30
फलदं चल्विह विज्ञाय धातारं श्रेयसि ध्रुवम् धर्म ते व्यचरन् कृष्णे तद्धि श्रेय: सनातनम्
হে কৃষ্ণে! এখানে কর্মফলদাতা বিধাতা যে নিশ্চয়ই আছেন—বিশেষত শ্রেয়ের বিষয়ে তিনি অচল ফলদাতা—এ কথা জেনেই ঋষি ও বয়োজ্যেষ্ঠগণ ধর্মাচরণ করেছেন। কারণ ধর্মই চিরন্তন কল্যাণ।
Verse 31
स नायमफलो धर्मो नाधर्मोडफलवानपि । दृश्यन्तेडपि हि विद्यानां फलानि तपसां तथा
যুধিষ্ঠির বললেন—ধর্ম কখনও নিষ্ফল হয় না; অধর্মও ফল না দিয়ে থাকে না। বিদ্যা ও তপস্যার ফলও প্রত্যক্ষ দেখা যায়।
Verse 32
त्वमात्मनो विजानीहि जन्म कृष्णे यथा श्रुतम् वेत्थ चापि यथा जातो धृष्टद्युम्न: प्रतापवान्
হে কৃষ্ণে! যেমন তুমি শুনে এসেছ, তেমনি নিজের জন্মবৃত্তান্ত স্মরণ করো; আর তুমি জানোই—তোমার প্রতাপশালী ভ্রাতা ধৃষ্টদ্যুম্ন কীভাবে জন্মেছিলেন।
Verse 33
एतावदेव पर्याप्तमुपमानं शुचिस्मिते । कर्मणां फलमाप्रोति धीरोडल्पेनापि तुष्यति
যুধিষ্ঠির বললেন—হে শুচিস্মিতে দ্রৌপদী! এতটুকু দৃষ্টান্তই যথেষ্ট। ধীর পুরুষ কর্মের ফল লাভ করে এবং অল্প লাভেও তুষ্ট থাকে।
Verse 34
बहुनापि हााविद्वांसो नैव तुष्यन्त्यबुद्धय: । तेषां न धर्मजं किंचित् प्रेत्य शर्मास्ति वा पुन:
যুধিষ্ঠির বললেন—অনেক কিছু পেলেও বুদ্ধিহীন, অশিক্ষিত লোক তুষ্ট হয় না। তাদের জন্য মৃত্যুর পরে ধর্মজাত সামান্য সুখও নেই—শান্তি তো আরও নয়।
Verse 35
कर्मणां श्रुतपुण्यानां पापानां च फलोदय: । प्रभवश्वात्ययश्चैव देवगुह्दानि भाविनि
যুধিষ্ঠির বললেন— বেদে প্রশংসিত পুণ্যকর্ম ও পাপকর্মের ফলের উদয়, এবং তাদের উৎপত্তি ও লয়—হে সুন্দরী, এ সবই দেবগুপ্ত রহস্য।
Verse 36
नैतानि वेद यः कश्रिन्मुहान्ते5त्र प्रजा इमा: | अपि कल्पसहस्रेण न स श्रेयोडधिगच्छति
যুধিষ্ঠির বললেন— যে ব্যক্তি এ বিষয়গুলি যথার্থভাবে জানে না, সে এক মুহূর্তেও তা উপলব্ধি করতে পারে না; আর সহস্র কল্প পেরিয়েও প্রকৃত কল্যাণ লাভ করে না। এই দেবগুপ্ত ক্ষেত্রে সাধারণ লোক মোহিত হয়।
Verse 37
रक्ष्याण्येतानि देवानां गूढमाया हि देवता: । कृताशाश्च व्रताशाश्व॒ तपसा दग्धकिल्बिषा: | प्रसादैर्मानसैर्युक्ता: पश्यन्त्येतानि वै द्विजा:
যুধিষ্ঠির বললেন— এ বিষয়গুলি দেবতারা রক্ষা করে গোপন রাখেন, কারণ দেবতাদের মায়া গভীর ও দুর্বোধ্য। যারা আশা-আকাঙ্ক্ষা ত্যাগ করে শুদ্ধ ও কল্যাণকর ব্রতাচার পালন করে, যাদের পাপ তপস্যায় দগ্ধ হয়েছে, এবং যারা অন্তঃপ্রসন্নতায় যুক্ত—এমন দ্বিজ ঋষিরাই এই দেবগুপ্ত সত্য দর্শন করতে পারেন।
Verse 38
न फलादर्शनाद् धर्म: शड्कितव्यो न देवता: । यष्टव्यं च प्रयत्नेन दातव्यं चानसूयता
যুধিষ্ঠির বললেন— ফল তৎক্ষণাৎ দেখা না গেলেও ধর্ম বা দেবতাদের সন্দেহ করা উচিত নয়। দোষদৃষ্টি ও অসূয়া ত্যাগ করে, যত্নসহকারে যজ্ঞ করতে এবং দান করতে থাকা উচিত।
Verse 39
कर्मणां फलमस्तीह तथैतद् धर्मशासनम् | ब्रह्मा प्रोवाच पुत्राणां यदृषिर्वेद कश्यप:
যুধিষ্ঠির বললেন— এই লোকেই কর্মের ফল অবশ্যই প্রাপ্ত হয়; এটাই ধর্মশাসনের বিধান। এই সত্য ব্রহ্মা তাঁর পুত্রদের বলেছিলেন, এবং ঋষি কশ্যপ তা জানেন।
Verse 40
तस्मात् ते संशय: कृष्णे नीहार इव नश्यतु । व्यवस्य सर्वमस्तीति नास्तिक्यं भावमुत्सूज
অতএব, হে কৃষ্ণ! ধর্ম সম্বন্ধে তোমার সংশয় কুয়াশার মতো লুপ্ত হোক। ‘সবই সত্যরূপে বিদ্যমান’—এই দৃঢ় নিশ্চয় স্থির করো এবং নাস্তিকতার ভাব ত্যাগ করো।
Verse 41
ईश्वरं चापि भूतानां धातारं मा च वै क्षिप । शिक्षस्वैनं नमस्वैनं मा ते5भूद् बुद्धिरीदूृशी
আর সকল প্রাণীর ধারক-পোষক ঈশ্বরের প্রতি কোনো দোষারোপ কোরো না। শাস্ত্র ও গুরুজনের উপদেশ অনুসারে তাঁকে বুঝতে চেষ্টা করো এবং তাঁকে প্রণাম করো। তোমার বুদ্ধি যেন আজকের মতো না থাকে।
Verse 42
यस्य प्रसादात् तद्धक्तो मर्त्यों गच्छत्यमर्त्यताम् | उत्तमां देवतां कृष्णे मावमंस्था: कथंचन
হে কৃষ্ণ! যাঁর কৃপায় তাঁর ভক্ত মর্ত্য হয়েও অমরত্ব লাভ করে, সেই পরম দেবতাকে তুমি কোনোভাবেই অবজ্ঞা কোরো না।
Verse 231
आर्ष प्रमाणमुत्क्रम्य धर्म न प्रतिपालयन् । सर्वशास्त्रातिगो मूढ: शं जन्मसु न विन्दति
যে ঋষিদের প্রমাণ-মানদণ্ড অতিক্রম করে ধর্ম পালন করে না—এবং ‘আমি সব শাস্ত্রের ঊর্ধ্বে’ বলে নিজেকে মানে—সে মোহগ্রস্তই থাকে; জন্মে জন্মে কল্যাণ লাভ করে না।
The chapter confronts the mismatch between virtue and outcome: how Yudhiṣṭhira, exemplary in generosity and ritual duty, could fall into catastrophic loss—raising the dilemma of whether dharma is sufficient for worldly welfare or whether fate/divine allocation overrides it.
A dual emphasis emerges: (1) an experiential critique that worldly prosperity does not reliably track ethical conduct, and (2) a traditional determinist explanation that beings operate under Īśvara/Dhātṛ’s dispensation, with human agency portrayed as constrained within larger causal governance.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-function is interpretive—positioning the exile as a test-case for dharma and providing a doctrinal frame (karma, īśvara, power asymmetry) for understanding suffering within the epic’s broader soteriological and ethical architecture.
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