Mahabharata Adhyaya 3
Vana ParvaAdhyaya 387 Verses

Adhyaya 3

Sūrya-stava: Dhaumya’s Counsel and the Aṣṭaśata-nāma of Sūrya

Upa-parva: Sūrya-stava (Dhaumya-upadeśa) Episode

Vaiśaṃpāyana narrates that Yudhiṣṭhira, addressed in context by Śaunaka’s earlier prompting, consults the priest Dhaumya amid his brothers. Yudhiṣṭhira reports that Veda-versed Brahmins are following the exiled party, yet he lacks the capacity to protect and provide for them, nor can he abandon them; he requests a Dharmic course of action. Dhaumya reflects and answers by grounding sustenance in cosmic order: beings suffer hunger; Sūrya, like a father, cyclically draws and returns energies through uttarāyaṇa/dakṣiṇāyana, enabling the generation of medicinal plants and edible essences that sustain life. Dhaumya therefore directs Yudhiṣṭhira to take refuge in Sūrya and to uphold Brahmins through tapas. Exempla of earlier kings who rescued subjects through austere discipline are cited, and Yudhiṣṭhira undertakes solar worship with offerings, self-restraint, and prāṇāyāma at the Gaṅgā. Janamejaya asks how this worship was performed; Vaiśaṃpāyana introduces the prescribed eight-hundred sacred names of Sūrya, lists representative epithets, and concludes with a phalaśruti: recitation at sunrise grants prosperity, memory, intelligence, and relief from sorrow, presenting the hymn as a practical-ritual technology for ethical stewardship in exile.

Chapter Arc: वन-प्रस्थान के साथ ही युधिष्ठिर देखते हैं कि वेदपारंगत ब्राह्मण उनके पीछे-पीछे चले आ रहे हैं—और उनके पास उन्हें पोषित करने का साधन नहीं। → राजा का अंतःकरण दान-धर्म से बँधा है: वे ब्राह्मणों को त्याग नहीं सकते, पर दान-शक्ति भी नहीं। धौम्य से प्रश्न उठता है—ऐसी विपत्ति में राजधर्म कैसे निभे? → धौम्य के उपदेश पर युधिष्ठिर संयमित व्रत लेकर सूर्य की उपासना करते हैं; स्तुति में सूर्य के विश्वव्यापी तेज, ऋतु-रश्मियों और प्रलयकालीन संवर्तकाग्नि तक का विराट रूप उभरता है, और अंततः सूर्य प्रसन्न होकर अक्षय अन्न-दान का वर देते हैं। → सूर्य-प्रसाद से युधिष्ठिर तिथि-नक्षत्र-पर्वों पर पुरोहित के नेतृत्व में ब्राह्मणों सहित सबको इच्छित भोजन कराने में समर्थ हो जाते हैं; धौम्य स्वस्तिवाचन कराते हैं और पाण्डव ब्राह्मण-समुदाय सहित काम्यक वन की ओर प्रस्थान करते हैं। → वनवास की दीर्घ परीक्षा के बीच आश्वासन गूँजता है—चौदहवें वर्ष में राज्य पुनः मिलेगा; पर तब तक धर्म-रक्षा की राह और कितनी कठिन होगी?

Shlokas

Verse 1

हि मय न हुक है ० - धनके लोभसे मनुष्य धनके रक्षककी हत्या कर डालते हैं। तृतीयो<थध्याय: युधिष्ठिरके द्वारा अन्नके लिये भगवान्‌ सूर्यकी उपासना और उनसे अक्षयपात्रकी प्राप्ति वैशम्पायन उवाच शौनकेनैवमुक्तस्तु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । पुरोहितमुपागम्य भ्रातृमध्येडब्रवीदिदम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—শৌনক এভাবে বলার পর কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠির পুরোহিতের কাছে গিয়ে ভ্রাতৃমধ্যস্থ হয়ে এইরূপ বললেন।

Verse 2

प्रस्थितं मानुयान्तीमे ब्राह्मणा वेदपारगा: । न चास्मि पोषणे शक्तो बहुदुःखसमन्वितः

বৈশম্পায়ন বললেন—বেদের পারদর্শী এই ব্রাহ্মণগণ আমার প্রস্থানকালে আমার সঙ্গে অরণ্যে চলেছেন। কিন্তু তাঁদের ভরণ-পোষণ করতে আমি অক্ষম; এই ভারে আমি গভীর শোকে আচ্ছন্ন।

Verse 3

परित्यक्तुं न शक्तो5स्मि दानशक्तिश्च नास्ति मे । कथमत्र मया कार्य तद्‌ ब्रूहि भगवन्‌ मम

ভগবন্! আমি এঁদের ত্যাগ করতে পারি না; কিন্তু এই মুহূর্তে তাঁদের অন্নদানের সামর্থ্যও আমার নেই। এমন অবস্থায় আমার কী করা উচিত—কৃপা করে বলুন।

Verse 4

वैशम्पायन उवाच मुहूर्तमिव स ध्यात्वा धर्मेणान्विष्य तां गतिम्‌ । युधिष्ठिरमुवाचेदं धौम्यो धर्मभूतां वर:

বৈশম্পায়ন বললেন—ধর্মবানদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ধৌম্য মুনি ক্ষণকাল ধ্যান করলেন; তারপর ধর্মানুসারে উপায় অনুসন্ধান করে যুধিষ্ঠিরকে এই কথা বললেন।

Verse 5

धौग्य उवाच पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधया भृशम्‌ । ततो<नुकम्पया तेषां सविता स्वपिता यथा

ধৌম্য বললেন—রাজন! সৃষ্টির আদিকালে যখন সমস্ত প্রাণী ক্ষুধায় অত্যন্ত কষ্ট পাচ্ছিল, তখন পিতার মতো করুণায় সূর্যদেব তাদের প্রতি অনুকম্পা করলেন।

Verse 6

गत्वोत्तरायणं तेजो रसानुद्धृत्य रश्मिभि: । दक्षिणायनमावृत्तो महीं निविशते रवि:

ধৌম্য বললেন—রাজন! সূর্য উত্তরায়ণে গিয়ে রশ্মির দ্বারা পৃথিবীর রস—তার আর্দ্রতা—উত্তোলন করেন; তারপর দক্ষিণায়ণে ফিরে এসে সেই রসেই পৃথিবীকে পুনরায় সিঞ্চিত করে তাতে প্রতিষ্ঠিত হন।

Verse 7

क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपति: । दिवस्तेज: समुद्धृत्य जनयामास वारिणा

এইভাবে সমগ্র পৃথিবী যখন ক্ষেত্ররূপে প্রস্তুত হল, তখন ঔষধিদের অধিপতি চন্দ্র আকাশমণ্ডলে মেঘরূপে পরিণত সূর্যতেজকে উদ্ভাসিত করে, সেই তেজের দ্বারা বর্ষিত জলে অন্ন ও নানা ঔষধি উৎপন্ন করলেন।

Verse 8

निषिक्तश्नन्द्रतेजोभि: स्वयोनौ निर्गते रवि: । ओषध्य: षड़सा मेध्यास्तदन्न॑ प्राणिनां भुवि

ধৌম্য বললেন—চন্দ্ররশ্মিতে অভিষিক্ত হয়ে সূর্য যখন নিজের স্বাভাবিক অবস্থানে স্থিত হন, তখন ছয় রসে সমন্বিত পবিত্র ঔষধি উৎপন্ন হয়; সেই ঔষধিই পৃথিবীতে প্রাণীদের অন্ন হয়ে ওঠে।

Verse 9

एवं भानुमयं हान्न॑ भूतानां प्राणधारणम्‌ | पितैष सर्वभूतानां तस्मात्‌ तं शरणं व्रज

ধৌম্য বললেন—এইভাবে সকল জীবের প্রাণধারণকারী অন্ন প্রকৃতপক্ষে সূর্যস্বভাব। অতএব ভগবান সূর্যই সর্বভূতের পিতা; সুতরাং তাঁরই শরণ গ্রহণ কর।

Verse 10

राजानो हि महात्मानो योनिकर्मविशोधिता: । उद्धरन्ति प्रजा: सर्वास्तप आस्थाय पुष्कलम्‌

যাঁরা জন্ম ও কর্ম—উভয় দিক থেকেই বিশুদ্ধ ও দীপ্তিমান, সেই মহাত্মা রাজারা প্রাচুর্য তপস্যার আশ্রয় নিয়ে সমগ্র প্রজাকে বিপদ থেকে উদ্ধার করেন।

Verse 11

भीमेन कार्तवीर्येण वैन्येन नहुषेण च । तपोयोगसमाधिस्थैरुद्धता ह्यापद: प्रजा:

ধৌম্য বললেন—ভীম, কার্তবীর্য, বৈন্য (বেণপুত্র পৃথু) এবং নহুষ প্রভৃতি নৃপতিরা তপ, যোগ ও সমাধিতে প্রতিষ্ঠিত থেকে প্রজাদের মহাবিপদ দূর করেছেন।

Verse 12

तथा त्वमपि धर्मात्मन्‌ कर्मणा च विशोधित: । तप आस्थाय धर्मेण द्विजातीन्‌ भर भारत,धर्मात्मा भारत! इसी प्रकार तुम भी सत्कर्मसे शुद्ध होकर तपस्याका आश्रय ले धर्मानुसार द्विजातियोंका भरण-पोषण करो

হে ধর্মাত্মা! তুমিও কর্মে শুদ্ধ হয়ে তপস্যার আশ্রয় গ্রহণ করো এবং ধর্মানুসারে দ্বিজদের ভরণ-পোষণ করো, হে ভারত।

Verse 13

जनमेजय उवाच कथर्थ॑ कुरूणामृषभ: स तु राजा युधिष्ठिर: । विप्रार्थमाराधितवान्‌ सूर्यमद्भुतदर्शनम्‌

জনমেজয় বললেন—ভগবন্! কুরুদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সেই রাজা যুধিষ্ঠির ব্রাহ্মণদের প্রয়োজন পূরণের জন্য, অদ্ভুত দর্শনীয় ভগবান সূর্যের আরাধনা কীভাবে করেছিলেন?

Verse 14

वैशम्पायन उवाच शृणुष्वावहितो राजन्‌ शुचिर्भूत्वा समाहित: । क्षणं च कुरु राजेन्द्र सम्प्रवक्ष्याम्यशेषत:

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! সতর্ক হয়ে, শুচি ও একাগ্রচিত্ত হয়ে শোনো। আর হে রাজেন্দ্র, ক্ষণমাত্র ধৈর্য ধরো; আমি সব কথা সম্পূর্ণভাবে বলছি।

Verse 15

धौम्येन तु यथा पूर्व पार्थाय सुमहात्मने । नामाष्टशतमाख्यातं तच्छुणुष्व महामते,महामते! धौम्यने जिस प्रकार महात्मा युधिष्ठिरको पहले भगवान्‌ सूर्यके एक सौ आठ नाम बताये थे, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो

হে মহামতে! ধৌম্য পূর্বে যেভাবে মহাত্মা পার্থকে ভগবান সূর্যের একশো আট নাম বলেছিলেন, তা আমি বর্ণনা করছি—শোনো।

Verse 16

धौम्य उवाच सूर्योडर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्क:ः सविता रवि: । गभस्तिमानज: कालो मृत्युर्धाता प्रभाकर:

ধৌম্য বললেন—সূর্য, আর্যমান, ভগ, ত্বষ্টা, পূষা, অর্ক, সবিতা, রবি, গভস্তিমান, অজ, কাল, মৃত্যু, ধাতা ও প্রভাকর—এগুলি ভগবান সূর্যের কীর্তনীয় নাম।

Verse 17

पृथिव्यापश्च तेजश्न खं वायुश्व॒ परायणम्‌ । सोमो बृहस्पति: शूक्रो बुधो5ज़ारक एव च

ধৌম্য বললেন—তিনি পৃথিবী ও জল, তেজ, আকাশ ও বায়ু—সকলের পরম আশ্রয়। তিনিই সোম (চন্দ্র), বৃহস্পতি, শুক্র, বুধ এবং অঙ্গারক (মঙ্গল)।

Verse 18

इन्द्रो विवस्वान्‌ दीप्तांशु: शुचि: शौरि: शनैश्वर: । ब्रह्मा विष्णुश्न रुद्रश्न स्कन्दो वै वरुणो यम:

ধৌম্য বললেন—তিনি ইন্দ্র, বিবস্বান, দীপ্তাংশু, শুচি, শৌরি ও শনৈশ্বর নামে স্তূত। তিনিই ব্রহ্মা, বিষ্ণু, রুদ্র, স্কন্দ, বরুণ ও যম।

Verse 19

वैद्युतो जाठरश्नाग्निरैन्धनस्तेजसां पति: । धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाड़ो वेदवाहन:

ধৌম্য বললেন—তিনি বৈদ্যুত অগ্নি, জাঠরাগ্নি ও ঐন্ধন (যজ্ঞ) অগ্নি; তিনি সকল তেজের অধিপতি। তিনি ধর্মধ্বজ, বেদকর্তা, বেদাঙ্গ ও বেদবাহন।

Verse 20

कृतं त्रेता द्वापरश्न कलि: सर्वमलाश्रय: । कला काष्टठा मुहूर्ताश्च क्षपा यामस्तथा क्षण:

ধৌম্য বললেন—তিনি কৃত, ত্রেতা, দ্বাপর ও কলি—এই যুগসমূহ; আর কলি সর্ব মলিনতার আশ্রয়। তিনিই সময়ের পরিমাপ—কলা, কাষ্ঠা, মুহূর্ত; এবং ক্ষপা (রাত্রি), যাম ও ক্ষণ।

Verse 21

संवत्सरकरोडश्वत्थ: कालचक्रो विभावसु: । पुरुष: शाश्व॒तो योगी व्यक्ताव्यक्त: सनातन:

ধৌম্য বললেন—তিনি বর্ষের নির্মাতা; তিনি পবিত্র অশ্বত্থ; তিনি কালের চক্র; তিনি বিভাবসু (দীপ্তিমান অগ্নি)। তিনি শাশ্বত পুরুষ, যোগী—ব্যক্ত ও অব্যক্ত—সনাতন।

Verse 22

कालाध्यक्ष: प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुद: । वरुण: सागरों5शुश्व जीमूतो जीवनोडरिहा

ধৌম্য বললেন—তিনি কালের অধিপতি, প্রজাদের অধিপতি; বিশ্বকর্মা, অন্ধকার-নাশক; বরুণ; সাগর; রশ্মি; মেঘ; জীবনদাতা এবং শত্রুনাশক।

Verse 23

भूताश्रयो भूतपति: सर्वतलोकनमस्कृत: । स्रष्टा संवर्तको वह्नि: सर्वस्यादिरलोलुप:

ধৌম্য বললেন—তিনি সকল জীবের আশ্রয় ও জীবদের অধিপতি, সর্বলোকের দ্বারা নমস্কৃত। তিনি স্রষ্টা, প্রলয়ে সংবর্তক; তিনি পবিত্র অগ্নি; সর্বের আদিস্বরূপ এবং লোভশূন্য।

Verse 24

अनन्त: कपिलो भानु: कामद: सर्वतोमुख: । जयो विशालो वरद: सर्वधातुनिषेचिता

ধৌম্য বললেন—তিনি অনন্ত, কপিল, ভানু; কামদ, সর্বতো-মুখ। তিনি জয়, বিশাল, বরদাতা এবং সকল ধাতুকে পরিপক্ব ও পুষ্ট করেন।

Verse 25

मनःसुपर्णो भूतादि: शीघ्रग: प्राणधारक: । धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवो $दिते: सुत:

ধৌম্য বললেন—তিনি মনঃসুপর্ণ, ভূতাদিস্বরূপ; শীঘ্রগ, প্রাণধারক। তিনি ধন্বন্তরি, ধূমকেতু; আদিদেব এবং অদিতির পুত্র।

Verse 26

द्वादशात्मारविन्दाक्ष: पिता माता पितामह: । स्वर्गद्धारं प्रजद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्‌

ধৌম্য বললেন—তিনি দ্বাদশাত্মা, পদ্মনয়ন; পিতা, মাতা ও পিতামহ। তিনি স্বর্গের দ্বার, প্রজার দ্বার এবং মোক্ষের দ্বার—স্বয়ং ত্রিবিষ্টপ।

Verse 27

देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुख: । चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेय: करुणान्वित:

ধৌম্য বললেন—তিনি দেহধারীদের স্রষ্টা, অন্তরে প্রশান্ত; সমগ্র বিশ্ব의 আত্মা, সর্বদিকে মুখাবিষ্ট; চল ও অচলের অন্তরাত্মা; সূক্ষ্মস্বরূপ; মৈত্রীময়, উপকারী ও করুণায় পরিপূর্ণ। এই অধ্যায়ে এই উপাধিগুলি সূর্যদেবের নামকীর্তনের অঙ্গ—চিত্ত স্থির করতে, কৃতজ্ঞতা জাগাতে এবং দুঃসময়ে রক্ষাকারী, জীবনধারিণী ঋত-ব্যবস্থাকে আহ্বান করতে।

Verse 28

एतद्‌ वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यामिततेजस: । नामाष्टशतकं चेदं प्रोक्तमेतत्‌ स्वयंभुवा

ধৌম্য বললেন—এগুলোই অমিততেজস্বী, কীর্তনযোগ্য সূর্যদেবের নাম। এই একশো আট নামের স্তব স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মা নিজে উচ্চারণ করেছিলেন।

Verse 29

सुरगणपितृयक्षसेवितं हासुरनिशाचरसिद्धवन्दितम्‌ । वरकनकहुताशनप्रभं प्रणिपतितो5स्मि हिताय भास्करम्‌

ধৌম্য বললেন—যাঁকে দেবগণ, পিতৃগণ ও যক্ষেরা সেবা করে; যাঁকে অসুর, নিশাচর রাক্ষস ও সিদ্ধেরা বন্দনা করে; যিনি উৎকৃষ্ট স্বর্ণ ও প্রজ্বলিত অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান—সেই ভাস্করকে আমি আমার মঙ্গলের জন্য প্রণাম করি।

Verse 30

सूर्योदये यः सुसमाहित: पठेत्‌ स पुत्रदारान्‌ धनरत्नसंचयान्‌ । लभेत जातिस्मरतां नर: सदा धृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान्‌

ধৌম্য বললেন—যে ব্যক্তি সূর্যোদয়ের সময় সুসংযত ও একাগ্রচিত্তে এই নামগুলি পাঠ করে, সে স্ত্রী-পুত্র, ধন ও রত্নসঞ্চয় লাভ করে। সে সর্বদা পূর্বজন্মস্মৃতি, ধৈর্য এবং প্রখর বুদ্ধিও অর্জন করে।

Verse 31

इमं स्तवं देववरस्य यो नर: प्रकीर्तयेच्छुचिसुमना: समाहित: । विमुच्यते शोकदवाग्निसागरा- ल्‍लभेत कामान्‌ मनसा यथेप्सितान्‌

ধৌম্য বললেন—যে ব্যক্তি স্নানাদি আচার দ্বারা পবিত্র হয়ে, নির্মলচিত্ত ও একাগ্র হয়ে, দেবশ্রেষ্ঠ প্রভু সূর্যের এই নামময় স্তব কীর্তন করে, সে শোকরূপ দাবানলে দগ্ধ এই দুরতিক্রম সংসারসাগর থেকে মুক্ত হয় এবং মনে যাহা কামনা করে তাহাই লাভ করে।

Verse 32

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु धौम्येन तत्कालसदृशं वच: । विप्रत्यागसमाधिस्थ: संयतात्मा दृढव्रत:

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! ধৌম্য মুনির সময়োচিত বাক্য শুনে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির ব্রাহ্মণদের দানের জন্য অন্নলাভের সংকল্পে স্থির হলেন। সংযতচিত্ত, দৃঢ়ব্রত ও নিয়মানুবর্তিতায় তিনি উত্তম তপস্যার অনুশীলনে প্রবৃত্ত হলেন।

Verse 33

धर्मराजो विशुद्धात्मा तप आतिष्ठदुत्तमम्‌ | पुष्पोपहारैर्बलिभिरर्चयित्वा दिवाकरम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—বিশুদ্ধচিত্ত ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির উত্তম তপস্যা অবলম্বন করলেন। পুষ্প-উপহার ও নৈবেদ্য-অর্ঘ্য প্রভৃতিতে দিবাকরকে পূজা করে তিনি তাঁর সম্মুখে স্থির হয়ে দাঁড়ালেন।

Verse 34

सो<वगाहा जलं राजा देवस्याभिमुखो5 भवत्‌ । योगमास्थाय धर्मात्मा वायुभक्षो जितेन्द्रिय:

রাজা জলে অবগাহন করে দেবতার অভিমুখে দাঁড়ালেন। ধর্মাত্মা যুধিষ্ঠির যোগে স্থিত হয়ে, ইন্দ্রিয়জয়ী হয়ে, কেবল বায়ু-আহারেই জীবন ধারণ করতে লাগলেন।

Verse 35

गाड़ेयं वार्युपस्पृश्य प्राणायामेन तस्थिवान्‌ । शुचि: प्रयतवाग भूत्वा स्तोत्रमारब्धवांस्तत:

গঙ্গাজল আচমন করে তিনি পবিত্র হলেন। প্রণায়ামের শৃঙ্খলায় স্থিত থেকে, বাক্‌সংযম করে, তারপর তিনি স্তোত্রপাঠ আরম্ভ করলেন।

Verse 36

युधिछिर उवाच त्वं भानो जगतत्नक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम्‌ । त्वं योनि: सर्वभूतानां त्वमाचार: क्रियावताम्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—হে ভানো! আপনি সমগ্র জগতের নয়ন; আপনি সকল দেহধারীর অন্তরাত্মা। আপনি সকল জীবের উৎপত্তিস্থান, আর ধর্মকর্মে প্রবৃত্তদের জন্য আপনি-ই সদাচারের মানদণ্ড।

Verse 37

त्वं गति: सर्वसांख्यानां योगिनां त्वं परायणम्‌ । अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम्‌

সমস্ত সাংখ্যযোগীদের পরম গতি আপনি; যোগীদেরও আপনি পরায়ণ। মোক্ষের অবারিত দ্বার আপনি—মুমুক্ষুদেরও আপনি একমাত্র আশ্রয় ও গতি।

Verse 38

त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोक: प्रकाश्यते । त्वया पवित्रीक्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया

আপনিই এই জগৎ ধারণ করেন; আপনার দ্বারাই জগৎ প্রকাশিত ও দীপ্তিমান হয়। আপনার দ্বারাই তা পবিত্র হয়, এবং কোনো ছলনা বা স্বার্থ ছাড়াই আপনার দ্বারাই তা রক্ষিত হয়।

Verse 39

त्वामुपस्थाय काले तु ब्राह्मणा वेदपारगा: । स्वशाखाविहितैर्मन्त्रैरर्चन्त्यषिगणार्चितम्‌

আপনি ঋষিগণের দ্বারা পূজিত। বেদে পারদর্শী ব্রাহ্মণেরা যথাসময়ে উপাসনা করে, নিজ নিজ বেদশাখায় বিধৃত মন্ত্রে আপনার অর্চনা করেন।

Verse 40

तव दिव्यं रथं यान्तमनुयान्ति वरार्थिन: । सिद्धचारणगन्धर्वा यक्षगुह्मुकपन्नगा:,सिद्ध, चारण, गन्धर्व, यक्ष, गुह्क और नाग आपसे वर पानेकी अभिलाषासे आपके गतिशील दिव्य रथके पीछे-पीछे चलते हैं

আপনার দিব্য রথ যখন অগ্রসর হয়, তখন বরপ্রার্থী সিদ্ধ, চারণ, গন্ধর্ব, যক্ষ, গুহ্যক ও নাগগণ আপনার পশ্চাতে পশ্চাতে অনুসরণ করে।

Verse 41

त्रयस्त्रिंशच्च वै देवास्तथा वैमानिका गणा: । सोपेन्द्रा: समहेन्द्राश्न॒ त्वामिष्टवा सिद्धिमागता:

ত্রয়স্ত্রিংশৎ দেবতা এবং বিমানচারী গণসমূহও—উপেন্দ্র ও মহেন্দ্রসহ—আপনার আরাধনা করে সিদ্ধি লাভ করেছেন।

Verse 42

उपयान्त्यर्चयित्वा तु त्वां वै प्राप्तमनोरथा: । दिव्यमन्दारमालाभि स्तूर्ण विद्याधरोत्तमा:

যুধিষ্ঠির বললেন—হে ভগবান্! তোমার আরাধনা করে, মনোরথ সিদ্ধ করে, শ্রেষ্ঠ বিদ্যাধরগণ দিব্য মন্দার-পুষ্পের মালা ধারণ করে দ্রুত তোমার সন্নিকটে উপস্থিত হয়। তদ্রূপ গুহ্যকগণ, পিতৃদের সাত শ্রেণি—দৈব হোক বা মানব—এবং দিব্য মুনিগণও কেবল তোমার পূজার দ্বারাই উৎকৃষ্ট পদ লাভ করে। বসুগণ, মরুতগণ, রুদ্রগণ, সাধ্যগণ এবং তোমার কিরণ পানকারী বালখিল্যাদি সিদ্ধ ঋষিরাও তোমারই উপাসনায় সর্বপ্রাণীর মধ্যে শ্রেষ্ঠত্ব অর্জন করেছেন।

Verse 43

गुहाया: पितृगणा: सप्त ये दिव्या ये च मानुषा: । ते पूजयित्वा त्वामेव गच्छन्त्याशु प्रधानताम्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—গুহ্যকগণ এবং পিতৃদের সাত শ্রেণি—দৈব হোক বা মানব—তাঁরা সকলেই কেবল তোমাকেই পূজা করে, এবং সেই পূজার ফলেই দ্রুত প্রাধান্য লাভ করেন। এইভাবে যাঁরা পূজনীয় সকল সম্প্রদায় তোমার আরাধনায় নিবিষ্ট, তাঁরা তোমার প্রসাদে পরম স্থান অর্জন করেন।

Verse 44

वसवो मरुतो रुद्रा ये च साध्या मरीचिपा: । वालखिल्यादय: सिद्धा: श्रेष्ठत्वं प्राणिनां गता:

যুধিষ্ঠির বললেন—বসুগণ, মরুতগণ, রুদ্রগণ এবং সাধ্যগণ; আর কিরণভোজী বালখিল্যাদি সিদ্ধগণ—এঁরা সকলেই প্রাণীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠত্ব লাভ করেছেন।

Verse 45

सब्रद्यकेषु लोकेषु सप्तस्वप्यखिलेषु च । न तद्धूतमहं मनन्‍्ये यदर्कादतिरिच्यते

যুধিষ্ঠির বললেন—ব্রহ্মলোকসহ সাতটি লোক এবং অন্যান্য সকল লোকেও আমার মনে হয় না যে সূর্যদেবের চেয়ে শ্রেষ্ঠ কোনো সত্তা আছে। হে পূজ্য! জগতে আরও বহু মহৎ ও শক্তিমান সত্তা আছে, কিন্তু তাদের দীপ্তি ও প্রভাব তোমার সমান নয়। সকল জ্যোতির্ময় পদার্থ তোমার মধ্যেই অন্তর্ভুক্ত; তুমিই সকল আলোর অধিপতি। সত্য, সত্ত্ব এবং সমস্ত সাত্ত্বিক ভাব তোমার মধ্যেই প্রতিষ্ঠিত। আর যে সুদর্শন চক্র দ্বারা শার্ঙ্গধারী ভগবান বিষ্ণু দানবদের অহংকার চূর্ণ করেছিলেন, সেই চক্র বিশ্বকর্মা তোমারই তেজ থেকে নির্মাণ করেছিলেন।

Verse 46

सन्ति चान्यानि सत्त्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च । न तु तेषां तथा दीप्ति: प्रभावो वा यथा तव

যুধিষ্ঠির বললেন—জগতে আরও বহু মহৎ ও শক্তিমান সত্তা আছে; কিন্তু তাদের দীপ্তি বা প্রভাব তোমার মতো নয়।

Verse 47

ज्योतींषि त्वयि सर्वाणि त्वं सर्वज्योतिषां पति: । त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वे भावाश्व॒ साच्चिका:

যুধিষ্ঠির বললেন— সকল জ্যোতি আপনার মধ্যেই প্রতিষ্ঠিত; আপনি সকল জ্যোতির অধিপতি। সত্য, সত্ত্ব এবং সমস্ত সাত্ত্বিক ভাব আপনার মধ্যেই স্থিত। অতএব আপনার দীপ্তি ও প্রভাবের তুলনা অন্য কোনো মহাশক্তিমান সত্তারও নেই।

Verse 48

त्वत्तेजसा कृतं॑ चक्र सुनाभं विश्वकर्मणा । देवारीणां मदो येन नाशित: शार्ज्र्धन्चना

যুধিষ্ঠির বললেন— আপনার তেজ থেকেই বিশ্বকর্মা সু-নাভিযুক্ত চক্র নির্মাণ করেছিলেন। সেই সুদর্শন দ্বারা শার্ঙ্গধনু-ধারী ভগবান বিষ্ণু দেবশত্রুদের অহংকার চূর্ণ করেছিলেন। অতএব ধর্ম-ব্যবস্থাকে রক্ষাকারী দিব্য অস্ত্রের অন্তর্নিহিত উৎসও আপনারই দীপ্তি।

Verse 49

त्वमादायांशुभिस्तेजो निदाघे सर्वदेहिनाम्‌ । सर्वोौषधिरसानां च पुनर्वर्षासु मुडचसि

যুধিষ্ঠির বললেন— গ্রীষ্মে আপনি আপনার কিরণ দ্বারা সকল দেহধারীর তেজ এবং সমস্ত ঔষধির রসের সার টেনে নেন; পরে বর্ষায় তা আবার জীবনদায়ী বৃষ্টিরূপে ফিরিয়ে দেন। এভাবে আপনি সংযমে গ্রহণ করে যথাকালে পুনর্দান করে জগতকে ধারণ করেন।

Verse 50

तपन्त्यन्ये दहन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये तथा घना: । विद्योतन्ते प्रवर्षन्ति तव प्रावृषि रश्मय:

যুধিষ্ঠির বললেন— বর্ষাকালে আপনার কিরণ নানা রূপ ধারণ করে— কিছু তাপ দেয়, কিছু দহন করে; কিছু মেঘ হয়ে গর্জে ওঠে, কিছু বিদ্যুৎ হয়ে ঝলকে ওঠে, আর কিছু বৃষ্টি হয়ে ঝরে পড়ে।

Verse 51

न तथा सुखयत्यग्निर्न प्रावारा न कम्बला: | शीतवातार्दितं लोक॑ यथा तव मरीचय:,शीतकालकी वायुसे पीड़ित जगत्‌को अग्नि, कम्बल और वस्त्र भी उतना सुख नहीं देते जितना आपकी किरणें देती हैं

যুধিষ্ঠির বললেন— শীতল বায়ুতে কাতর জগতকে আপনার কিরণ যতটা সান্ত্বনা দেয়, ততটা আগুনও দেয় না, উলের আবরণও দেয় না, কম্বলও দেয় না।

Verse 52

त्रयोदशद्वीपवर्ती गोभिर्भासयसे महीम्‌ । त्रयाणामपि लोकानां हितायैक: प्रवर्तसे

ত্রয়োদশ দ্বীপের মধ্যে অবস্থান করে আপনি আপনার কিরণে সমগ্র পৃথিবীকে আলোকিত করেন; এবং একাই তিন লোকের মঙ্গলের জন্য নিরন্তর প্রবৃত্ত থাকেন।

Verse 53

तव यद्युदयो न स्यादन्ध॑ जगदिदं भवेत्‌ | न च धर्मार्थकामेषु प्रवर्तेरनू मनीषिण:,यदि आपका उदय न हो तो यह सारा जगत्‌ अंधा हो जाय और मनीषी पुरुष धर्म, अर्थ एवं कामसम्बन्धी क्मोंमें प्रवृत्त ही न हों

যদি আপনার উদয় না হতো, তবে এই সমগ্র জগৎ অন্ধকারে নিমজ্জিত হতো; আর মনীষীরা ধর্ম, অর্থ ও কাম—এই পুরুষার্থে প্রবৃত্তই হতেন না।

Verse 54

आधानपशुबन्‍न्धेष्टिमन्त्रयज्ञतपःक्रिया: । त्वत्प्रसादादवाप्यन्ते ब्रह्म॒क्षत्रविशां गणै:

গর্ভাধান, অগ্নি-প্রতিষ্ঠা, পশুবন্ধ, ইষ্টি, মন্ত্রজপ, যজ্ঞকর্ম ও তপস্যা—এই সকল ক্রিয়া আপনার অনুগ্রহেই ব্রাহ্মণ, ক্ষত্রিয় ও বৈশ্যগণের দ্বারা সম্পন্ন হয়।

Verse 55

यदहर्ब्रह्मण: प्रोक्ते सहस्रयुगसम्मितम्‌ । तस्य त्वमादिरन्तश्ष॒ कालज्ञै: परिकीर्तित:,ब्रद्माजीका जो एक सहस्र युगोंका दिन बताया गया है, कालमानके जाननेवाले विद्वानोंने उसका आदि और अन्त आपको ही बताया है

ব্রহ্মার যে ‘এক দিন’ সহস্র যুগসম বলে ঘোষিত—সেই মহাকালের আদিও অন্তও, কালজ্ঞ পণ্ডিতেরা আপনাকেই বলেছেন।

Verse 56

मनूनां मनुपुत्राणां जगतो5मानवस्य च । मन्वन्तराणां सर्वेषामी श्वराणां त्वमी श्वर:

মনু ও মনুপুত্রদের, সমগ্র জগতের, এবং ব্রহ্মলোক-প্রাপ্তি দানকারী সেই অমানব পুরুষেরও প্রভু আপনি; আর সকল মন্বন্তরে ‘ঈশ্বর’ নামে খ্যাত দেবগণেরও ঈশ্বর আপনি-ই।

Verse 57

संहारकाले सम्प्राप्ते तव क्रोधविनि:सृत: । संवर्तकाग्निस्त्रैलोक्यं भस्मीकृत्यावतिष्ठते,प्रलयकाल आनेपर आपके ही क्रोधसे प्रकट हुई संवर्तक नामक अग्नि तीनों लोकोंको भस्म करके फिर आपमें ही स्थित हो जाती है

প্রলয়কাল উপস্থিত হলে আপনারই ক্রোধ থেকে উদ্ভূত সংবর্তক অগ্নি ত্রিলোককে ভস্ম করে দিয়ে শেষে আবার আপনার মধ্যেই স্থিত হয়।

Verse 58

त्वद्वीधितिसमुत्पन्ना नानावर्णा महाघना: । सैरावता: साशनय: कुर्वन्त्याभूतसम्प्लवम्‌,आपकी ही किरणोंसे उत्पन्न हुए रंग-बिरंगे ऐरावत आदि महामेघ और बिजलियाँ सम्पूर्ण भूतोंका संहार करती हैं

আপনারই কিরণ থেকে উৎপন্ন, ঐরাবত-শ্রেণির ন্যায় নানা বর্ণের মহামেঘ বজ্রসহ গর্জে উঠে এমন এক প্লাবন ঘটায়, যা সকল প্রাণীকে আচ্ছন্ন করে ফেলে।

Verse 59

कृत्वा द्वादशधा55त्मानं द्वादशादित्यतां गत: । संहृत्यैकार्णवं सर्व त्वं शोषयसि रश्मिभि:

তারপর আপনি নিজেকে দ্বাদশ রূপে বিভক্ত করে দ্বাদশ আদিত্যরূপে উদিত হন; সমস্ত কিছুকে এক মহাসাগরে সংহৃত করে, আপনার কিরণ দ্বারা তার সমস্ত জল শুষে নেন—এভাবেই ত্রিলোকের প্রলয় সাধিত হয়।

Verse 60

त्वामिन्द्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापति: । त्वमग्निस्त्वं मन: सूक्ष्मं प्रभुस्त्वं ब्रह्म शाश्वतम्‌

আপনাকেই ইন্দ্র বলা হয়; আপনিই রুদ্র, আপনিই বিষ্ণু, আপনিই প্রজাপতি। আপনিই অগ্নি, আপনিই সূক্ষ্ম মন, আপনিই প্রভু, এবং আপনিই শাশ্বত ব্রহ্ম।

Verse 61

त्वं हंस: सविता भानुरंशुमाली वृषाकपि: । विवस्वान्‌ मिहिर: पूषा मित्रो धर्मस्तथैव च

আপনিই হংস, আপনিই সবিতা, ভানু, অংশুমালী ও বৃষাকপি; আপনিই বিবস্বান, মিহির, পূষা, মিত্র এবং তদ্রূপ ধর্ম।

Verse 62

सहस्नरश्मिरादित्यस्तपनस्त्वं गवाम्पति: । मार्तण्डो<र्को रवि: सूर्य: शरण्यो दिनकृत्‌ तथा

যুধিষ্ঠির বললেন—আপনি সহস্ররশ্মি আদিত্য, তাপনকারী তপন এবং রশ্মিদের অধিপতি গবাম্পতি। আপনি মার্তণ্ড, অর্ক, রবি, সূর্য—শরণাগতদের রক্ষক—এবং দিনের স্রষ্টা।

Verse 63

दिवाकर: सप्तसप्तिर्धामकेशी विरोचन: । आशुगामी तमोष्नश्न हरिताश्वश्न कीर्त्यसे

যুধিষ্ঠির বললেন—আপনি দিবাকর, সপ্তসপ্তি, ধামকেশী, বিরোচন, আশুগামী, তমোঘ্ন এবং হরিতাশ্ব—এই বহু নামে কীর্তিত হন।

Verse 64

सप्तम्यामथवा षष्ठ्यां भक्‍्त्या पूजां करोति यः । अनिर्विण्णो5नहंकारी त॑ लक्ष्मीर्भजते नरम्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—যে ব্যক্তি ষষ্ঠী বা সপ্তমীতে ভক্তিসহকারে, বিষণ্ণতামুক্ত ও অহংকারহীন হয়ে আপনার পূজা করে, লক্ষ্মী সেই মানুষকে অনুগ্রহ করেন।

Verse 65

न तेषामापद: सन्ति नाधयो व्याधयस्तथा । ये तवानन्यमनस: कुर्वन्त्यर्चनवन्दनम्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—হে ভগবান! যারা একাগ্রচিত্তে আপনার অর্চনা ও বন্দনা করে, তাদের কোনো বিপদ আসে না; তারা না মানসিক উদ্বেগে, না রোগব্যাধিতে আক্রান্ত হয়।

Verse 66

सर्वरोगैर्विरहिता: सर्वपापविवर्जिता: । त्वद्धावभक्ता: सुखिनो भवन्ति चिरजीविन:,जो प्रेमपूर्वक आपके प्रति भक्ति रखते हैं वे समस्त रोगों तथा सम्पूर्ण पापोंसे रहित हो चिरंजीवी एवं सुखी होते हैं

যুধিষ্ঠির বললেন—যারা প্রেমভরে আপনার প্রতি ভক্তি ধারণ করে, তারা সকল রোগ থেকে মুক্ত ও সকল পাপ থেকে বিমুক্ত হয়ে দীর্ঘজীবী এবং সুখী হয়।

Verse 67

त्वं ममापन्नकामस्य सर्वातिथ्यं चिकीर्षत: । अन्नमन्नपते दातुमभित: श्रद्धयाहसि,अन्नपते! मैं श्रद्धापूर्वक सबका आतिथ्य करनेकी इच्छासे अन्न प्राप्त करना चाहता हूँ। आप मुझे अन्न देनेकी कृपा करें

হে অন্নপতি! আমি বিপন্ন অবস্থায়ও শ্রদ্ধাসহ সকল অতিথির যথোচিত আতিথ্য করতে চাই; তাই অন্নলাভের অভিপ্রায়ে আপনার শরণ নিয়েছি। অনুগ্রহ করে আমাকে অন্ন দান করুন।

Verse 68

ये च ते$नुचरा: सर्वे पादोपान्तं समाश्रिता: । माठरारुणदण्डद्यास्तांस्तान्‌ वन्देडशनिक्षुभान्‌

আর আপনার পদতলে নিকটবর্তী যে সকল অনুচর—মাঠর, অরুণ ও দণ্ড প্রভৃতি—যাঁদের বিদ্যুৎ প্রবাহিত করার প্রবর্তক বলা হয়, তাঁদের প্রত্যেককে আমি প্রণাম করি।

Verse 69

क्षुभया सहिता मैत्री याश्वान्या भूतमातर: । ताश्न सर्वा नमस्यामि पान्तु मां शरणागतम्‌

ক্ষুভার সহচরী মৈত্রীদেবী এবং গৌরী, পদ্মা প্রভৃতি অন্যান্য সকল ভূতমাতাকে আমি প্রণাম করি। শরণাগত আমাকে তাঁরা সকলেই রক্ষা করুন।

Verse 70

वैशमग्पायन उवाच एवं स्तुतो महाराज भास्करो लोकभावन: । ततो दिवाकर: प्रीतो दर्शयामास पाण्डवम्‌ | दीप्यमान: स्ववपुषा ज्वलन्निव हुताशन:

বৈশম্পায়ন বললেন—হে মহারাজ! এভাবে লোকপালক ভাস্কর স্তূত হলে দিবাকর প্রসন্ন হয়ে পাণ্ডবকে দর্শন দিলেন। তখন তাঁর নিজ দেহ জ্বলন্ত অগ্নির ন্যায় দীপ্তিতে উদ্ভাসিত ছিল।

Verse 71

विवस्वानुवाच यत्‌ तेडभिलषितं किंचित्‌ तत्‌ त्वं सर्वमवाप्स्यसि | अहमन्न प्रदास्यामि सप्त पठच च ते समा:

ভগবান বিবস্বান বললেন—হে ধর্মরাজ! তুমি যা কিছুই কামনা করেছ, তা সবই তুমি লাভ করবে। আমি তোমাকে বারো বছর ধরে অন্ন প্রদান করব।

Verse 72

:६3 कौरवोंद्वारा विराटकी गायोंका हरण गृह्नीष्व पिठरं ताम्र॑ं मया दत्त नराधिप । यावद्‌ वर्त्स्यति पाञ्चाली पात्रेणानेन सुव्रत

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন, আমার প্রদত্ত এই তাম্রপাত্র গ্রহণ করুন। যতক্ষণ সুব্রতা পাঞ্চালী (দ্রৌপদী) নিজে আহার না করে অন্যদের পরিবেশন করে যাবে, ততক্ষণ আপনার রান্নাঘরে এই পাত্রে প্রস্তুত চার প্রকার আহার—ফল, মূল, অন্যান্য ভোজ্য প্রস্তুতি ও শাক-সবজি—অক্ষয় থাকবে। নরাধিপ, আমার এই তাম্রপাত্র গ্রহণ করুন।

Verse 73

फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे । चतुर्विधं तदन्नाद्यमक्षय्यं ते भविष्यति

আপনার রান্নাঘরে যে ফল, মূল, মাংস ও শাক প্রস্তুত হবে—এই চার প্রকার খাদ্য আপনার জন্য অক্ষয় থাকবে। যতক্ষণ দ্রৌপদী নিজে আহার না করে পরিবেশন করে যাবে, ততক্ষণ তা নিঃশেষ হবে না, হে রাজন।

Verse 74

वैशम्पायन उवाच एवमुकक्‍्त्वा तु भगवांस्तत्रैवान्‍न्तरधीयत,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! इतना कहकर भगवान्‌ सूर्य वहीं अन्तर्धान हो गये

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন, এ কথা বলে ভগবান সূর্য সেখানেই অন্তর্ধান করলেন।

Verse 75

इमं स्तवं प्रयतमना: समाधिना पठेदिहान्यो5पि वरं समर्थयन्‌ | तत्‌ तस्य दद्याच्च रविर्मनीषितं तदाप्रुयाद्‌ यद्यपि तत्‌ सुदुर्लभम्‌

আর যে কোনো ব্যক্তি সংযতচিত্তে ও ধ্যানসমাধিতে এই স্তব পাঠ করে, সে যদি অতি দুর্লভ কোনো বরও প্রার্থনা করে, তবে রবি তার মনঃকামিত বস্তু দান করতে পারেন; এবং সে তা লাভ করে, যদিও তা অত্যন্ত দুর্লভ।

Verse 76

यश्चेदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद्‌ वाप्यभीक्षणश: । पुत्रार्थी लभते पुत्र धनार्थी लभते धनम्‌ । विद्यार्थी लभते विद्यां पुरुषो5प्यथवा स्त्रिय:

যে প্রতিদিন এই স্তোত্র ধারণ করে বা বারবার শ্রবণ করে, সে ইচ্ছিত ফল লাভ করে—পুত্রার্থী পুত্র পায়, ধনার্থী ধন পায়, বিদ্যার্থী বিদ্যা পায়; তদ্রূপ পুরুষ হোক বা নারী, যার যে কামনা, তা সাধ্য হয়।

Verse 77

उभे संध्ये पठेन्नित्यं नारी वा पुरुषो यदि । आप प्राप्य मुच्येत बद्धों मुच्येत बन्धनात्‌

নারী হোক বা পুরুষ—যে ব্যক্তি নিত্য প্রাতঃসন্ধ্যা ও সায়ংসন্ধ্যায় এই স্তোত্র পাঠ করে, সে বিপদে পড়লেও তা থেকে মুক্ত হয়; আর যে বাঁধনে আবদ্ধ, সে বাঁধন থেকে মুক্তি লাভ করে।

Verse 78

एतद्‌ ब्रह्मा ददौ पूर्व शक्राय सुमहात्मने । शक्राच्च नारद: प्राप्तो धौम्यस्तु तदनन्तरम्‌ | धौम्याद्‌ युधिष्ठिर: प्राप्प सर्वान्‌ कामानवाप्तवान्‌

এই স্তব প্রথমে ব্রহ্মা মহাত্মা শক্র (ইন্দ্র)-কে দান করেছিলেন। শক্রের কাছ থেকে নারদ তা লাভ করেন, এবং পরে ধৌম্য তা গ্রহণ করেন। ধৌম্যের উপদেশ পেয়ে যুধিষ্ঠির রাজা তাঁর সকল ধর্মসম্মত কামনা পূর্ণ করেছিলেন।

Verse 79

संग्रामे च जयेन्नित्यं विपुलं चाप्रुयाद्‌ वसु । मुच्यते सर्वपापेभ्य: सूर्यलोक॑ स गच्छति

যে এই অনুষ্ঠান করে, সে সর্বদা যুদ্ধে বিজয়ী হয়, প্রচুর ধন লাভ করে, সকল পাপ থেকে মুক্ত হয় এবং শেষে সূর্যলোকে গমন করে।

Verse 80

वैशम्पायन उवाच लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो जलादुत्तीर्य धर्मवित्‌ । जग्राह पादौ धौम्यस्य भ्रातृश्च॒ परिषस्वजे

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! বর লাভ করে ধর্মজ্ঞ কুন্তীনন্দন যুধিষ্ঠির জল থেকে উঠে এলেন। তিনি ভক্তিভরে ধৌম্যের চরণ ধারণ করলেন এবং ভ্রাতৃগণকে হৃদয় দিয়ে আলিঙ্গন করলেন।

Verse 81

द्रौपद्या सह संगम्य वन्द्यमानस्तया प्रभु: । महानसे तदानीं तु साधयामास पाण्डव:

দ্রৌপদী তাঁকে প্রণাম করল, আর তিনি স্নেহভরে তার সঙ্গে মিলিত হলেন। তারপর সেই সময়েই পাণ্ডব যুধিষ্ঠির রান্নাঘরের কাজ শুরু করালেন—চুলোর ওপর হাঁড়ি বসাতে বললেন।

Verse 82

संस्कृतं प्रसवं याति स्वल्पमन्नं चतुर्विधम्‌ | अक्षय्यं वर्धते चान्नं तेन भोजयते द्विजान्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—চার প্রকারে প্রস্তুত অল্প অন্নও সেই পাত্রের প্রভাবে বৃদ্ধি পেয়ে অক্ষয় হয়ে উঠত। সেই অবিনাশী ভাণ্ডারেই তারা দ্বিজদের (ব্রাহ্মণদের) ভোজন করাতে লাগল—আতিথ্যধর্ম পালন করে দানের দ্বারা ধর্মকে স্থিত রাখল।

Verse 83

भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोजयित्वानुजानपि । शेषं विघससंतज्ञं तु पश्चाद्‌ भुड्धक्ते युधिष्ठिर:

ব্রাহ্মণরা ভোজন সম্পন্ন করলে এবং অনুজদেরও ভোজন করিয়ে দিলে, ‘বিঘস’ নামে পরিচিত অবশিষ্ট অন্ন যুধিষ্ঠির পরে ভক্ষণ করতেন।

Verse 84

युधिष्ठिरं भोजयित्वा शेषमश्नाति पार्षती । द्रौपद्यां भुज्यमानायां तदन्न॑ क्षयमेति च । एवं दिवाकरात्‌ प्राप्प दिवाकरसमप्रभ:

যুধিষ্ঠিরকে ভোজন করিয়ে পার্ষতী (দ্রৌপদী) অবশিষ্ট অন্ন নিজে খেতেন। আর দ্রৌপদী খেতে শুরু করলেই সেই পাত্রের অন্ন নিঃশেষ হয়ে যেত।

Verse 85

कामान्‌ मनो5भिलषितान्‌ बाह्नाणेभ्योडददात्‌ प्रभु: | पुरोहितपुरोगाश्च तिथिनक्षत्रपर्वसु । यज्ञियार्था: प्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणत:

প্রভু রাজা (যুধিষ্ঠির) ব্রাহ্মণদের মনঃকামিত বস্তু দান করতে লাগলেন। পুরোহিতদের অগ্রে রেখে শুভ তিথি, নক্ষত্র ও পর্বে বিধি ও মন্ত্র-প্রমাণ অনুসারে যজ্ঞসংক্রান্ত কর্ম প্রবৃত্ত হতে লাগল।

Verse 86

ततः कृतस्वस्त्ययना धौम्येन सह पाण्डवा: । द्विजसड्घै: परिवृता: प्रययु: काम्यकं वनम्‌,तदनन्तर स्वस्तिवाचन कराकर ब्राह्मणसमुदायसे घिरे हुए पाण्डव धौम्यजीके साथ काम्यकवनको चले गये

তারপর ধৌম্যকে সঙ্গে নিয়ে পাণ্ডবেরা স্বস্তিবাচন প্রভৃতি মঙ্গলকর্ম সম্পন্ন করিয়ে, ব্রাহ্মণসমূহে পরিবৃত হয়ে, কাম্যক বনের দিকে যাত্রা করল।

Verse 733

इतश्नतुर्दशे वर्षे भूयो राज्यमवाप्स्यसि | आजसे चौदहवें वर्षमें तुम अपना राज्य पुन: प्राप्त कर लोगे

এই চৌদ্দ বছর অতিক্রান্ত হলে তুমি পুনরায় তোমার রাজ্য লাভ করবে।

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira must sustain and protect learned Brahmins accompanying him despite exile-induced scarcity, lacking both the power to provide and the ethical permission to abandon dependents.

When institutional power is unavailable, ethical leadership can be maintained through self-discipline and lawful practice; the chapter frames tapas and ordered ritual as instruments to uphold social duty without violating Dharma.

Yes. The text states that reciting the Sūrya-stava with concentration at sunrise yields benefits such as prosperity, acquisitions, heightened memory and intellect, and release from grief—positioning the hymn as both devotional and pragmatic.

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